संस्करण: 30 दिसम्बर -2013

मधुमेह की दवा से ही फैलती है

मधुमेह की बीमारी

? डॉ. महेश परिमल

         हाल ही में एक अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि मधुमेह की बीमारी के इलाज के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा जो दवाएं दी जाती हैं, उन्हीं दवाओं यह बीमारी और तेजी से फैलती है। यह डॉक्टरों द्वारा बताई गई बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दवाओं का लगातार सेवन किया जाए,तो शरीर में शक्कर को हजम करने वाले इंसुलिन बनाने की जो प्राकृतिक क्षमता है,दवाओं से उसका नाश हो जाता है। इसके विपरीत यदि मरीज एलोपैथिक दवाओं को लेना बंद कर दे,तो धीरे-धीरे उसका शरीर मधुमेह की बीमारी से हमेशा के लिए मुक्त हो सकता है।निश्चित रूप से यह चौंकाने वाली बात है।

                 अमेरिका का 'न्यू साइंटिस्ट' नामक मैगजीन चिकित्सकीय क्षेत्र में प्रतिष्ठित मानी जाती है। इस मैगजीन के एक लेख में यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराड़ा के वैज्ञानिक डॉ.जार्ज एयजनबार्थे ने एक चौंकाने वाली घोषणा की है। वे कहते हैं कि मधुमेह बढ़ाने में इंसुलिन की ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यूरोपियन स्टेम सेल नेटवर्क के डॉ. बिमात सोरिया कहते हैं कि मानव के रक्त में ही ऐसे तत्व हैं, जो मधुमेह से लड़ने का काम करते हैं। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डॉ.डेविड हाफलर इस मैगजीन में लिखते हैं कि जब मधुमेह का मरीज इलाज के लिए इंसुलिन का इजेक्जेशन लेता है, तब उसके शरीर में जो रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति है, वह इंसुलिन से लड़ने में ही खत्म हो जाती है। इससे मरीज बहुत ही जल्द हृदय रोग का शिकार हो जाता है। 'न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसीन'नामक मैगजीन पहले ऐलोपेभी दवाओं के प्रचार का काम करती थी। किंतु अब वही मैगजीन बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भांडा फोड़ने का काम करती है। इस मैगजीन के संपादक कहते हैं कि हमारी मैगजीन में कई डॉक्टर दवाओं में होने वाले संशोधन ओर शोघ पर लेख लिखते थे। इन डॉक्टरों को तमाम बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां रिश्वत आदि देकर अपनी ओर मिला लेती थीं। ऐसे डॉक्टर दवा कंपनियों से राशि ऐंठने के बाद अमुक दवाओं से किसी प्रकार का साइड इफेक्ट नहीं होने का दावा करने लगते हैं। इस आशय का प्रमाण पत्र देने में भी वे संकोच नहीं करते।

               अमेरिका के कितने ही विश्वविद्यालयों में दवाओं पर शोध का जो नाटक चलता है, वह भी दवा कंपनियों के दान से होता है। इन शोधों में दवाओं की प्रशंसा ही लिखी जाती है। ये दवा कंपनियों के हितों के लिए ही काम करते हैं। इनकी दवाओं से होने वाले साइड इफेक्ट की बातों को छिपा लिया जाता है। टोरंटो की एक महिला वैज्ञानिक एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सलाहकार के रूप में नियुक्त हुई। उन्हें भारी-भरकम वेतन दिया जाता था। इस महिला की अंतरात्मा जाग्रत थी, इसलिए उसने घोषणा की कि इस कंपनी द्वारा तैयार दवाओं के गंभीर साइड इफेक्ट हैं। इससे हुआ यह कि उस महिला को तुरंत ही कंपनी के सलाहकार पद से हटा दिया गया। इस वैज्ञानिक ने यह भी सिध्द कर दिखाया कि इस कंपनी द्वारा एड्स के इलाज के लिए बनाई जाने वाली दवा पूरी तरह से नाकाम है, यही नहीं, यह दवा कई तरह के साइट इफेक्ट पैदा करती है। इस पर दवा बनाने वाली कंपनी ने उस महिला पर एक करोड़ डॉलर का दावा ठोक दिया।

                हमारे देश में धंधा करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी डॉक्टरों को नियमित रूप से विदेशों की मुफ्त में सैर करवाती हैं। वहां उनका भरपूर मनोरंजन किया जाता है। इससे प्रभावित होकर डॉक्टर मरीजों के लिए उपकृत करने वाली कंपनियों की दवाओं को लेने का आग्रह मरीजों से करते हैं। उक्त कंपनियां उनके लिए ईश्वर से कम नहीं होती। इसलिए वे उनकी हानिकारक दवाओं का समर्थन करते हैं। भले ही इसके सेवन से मरीज को और भी कई बीमारियां हो जाए। एक तरह से ये डॉक्टर अपने मरीजों को धोखा देने का ही काम करते हैं। अमेरिका की नॉल फार्मास्यूटिकल कंपनी थाइराइड के इलाज के लिए दवा बनाती थी। इस कंपनी के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में यह पाया कि इस कंपनी की दवाओं के खतरनाक साइड इफेक्ट हैं। इस बात को कंपनी से पूरे 7 साल तक दबाए रखा। इस दौरान वे हानिकारक दवाएं बाजारों में बिकती रहीं। अब अमेरिका के जागरूक उपभोक्ताओं ने कंपनी को अदालत में घसीटा है। अमेरिका की अदालत ने इस कंपनी को ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए पांच करोड़ का मुआवजा देने का आदेश दिया है।

                अमेरिका के डॉक्टर अब विशेष रूप से डिप्रेशन को दूर करने के लिए और महिलाओं में मोनापॉज के इलाज के लिए इस्तेमाल में लाई जा रही हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी जैसी दवाओं के प्रिस्किप्शन लिखने में घबरा रहे हैं। क्योंकि इन दवाओं के सेवन को चुनौती दी गई है। इन डॉक्टरों को अब यह डर सता रहा है कि उनकी लिखी दवाओं के सेवन के बाद यदि किसी मरीज की मौत हो जाती है, तो उन्हें 5 करोड़ रुपए का मुआवजा देने के लिए तैयार रहना होगा। इस कारण अब कुछ डॉक्टर्स जानी-पहचानी और प्रख्यात ब्रांड की दवा के कारण मूल स्वरूप की जिनेरिक दवाओं के प्रिस्किप्शन ही अधिक मात्रा में लिखने लगे हैं। अमेरिका के मरीज भी अब जागरूक होने लगे हैं। वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा प्रचार-पसार के लिए की जा रही आक्रामक मार्केटिंग का विरोध कर रहे हैं। उसका कारण यह है कि अब मरीजों का विश्वास डॉक्टरों और दवा कंपनियों से उठ गया है। इसलिए अब दवा कंपनियों को प्रचार-पसार करने में काफी परेशानी हा ेरही है। एजेंटों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

               बीसवीं सदी में एलोपेथी पध्दति ने पूरे विश्व पर अपना कब्जा जमा लिया था। अब इक्कीसवीं सदी में एलोपेथी दवाओं की बिक्री लगातार कम हो रही है। एक तरह से इन दवाओं के सेवन से लोग डरने लगे हैं। इस तारतम्य में मर्क कंपनी पर किया गया दावा और अमेरिकी अदालत द्वारा दिया गया फैसला युग परिवर्तनकारी घटना है। आर्थराइटिस के लिए दवा के बाद अब मधुमेह के इलाज की दवाएं भी संदेह के घेरे में आ गई है। इसके लिए प्रयुक्त दवाओं से हृदयाघात होता है। ऐसा कहा जाने लगा है। दवा कंपनियां के स्थापित हित ऐसे समाचारों को मरीजों तक न पहुंचे, इसका पूरा खयाल रख रहे हैं। फिर भी सत्य कहीं न कहीं से बाहर आ ही जाता है। कहा भी सही गया है कि सत्य के सूरज को लाख कोशिशों के बाद भी छिपाया नहीं जा सकता।

 

? डॉ. महेश परिमल