संस्करण: 30 दिसम्बर -2013

संदर्भ : किशनगंगा पनबिजली परियोजना पर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत का फैसला

मध्यस्थता अदालत ने भी की, भारत के रुख की पुष्टि

? जाहिद खान

        हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत में हाल ही में भारत को एक बड़ी कामयाबी मिली है। अदालत ने भारत-पाकिस्तान मध्यस्थता मामले में भारत को राहत प्रदान करते हुए पाकिस्तान की उन आपत्तिायों को पूरी तरह से खारिज कर दिया, जिसमें उसने भारत पर किशनगंगा नदी के बहाव को मोड़ने और दोनों देशों के बीच हुई सिंधु जल संधि 1960 के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए किशनगंगा पनबिजली परियोजना पर स्थगन की मांग की थी। अदालत ने अपने महत्त्वपूर्ण फैसले में कहा कि किशनगंगा पनबिजली परियोजना के लिए किशनगंगा नदी का जलमार्ग बदलने का भारत को अधिकार है और उसने अपनी इस परियोजना के लिए सिन्धु जल समझौते के सभी प्रावधानों का पालन किया है। लिहाजा भारत विद्युत उत्पादन के लिए किशनगंगा-नीलम नदी से पानी के प्रवाह की दिशा मोड़ सकता है। अलबत्ता भारत को किशनगंगा जल विद्युत परियोजना के नीचे से 'हर वक्त' किशनगंगा-नीलम नदी में कम से कम नौ क्यूमेक्स (घन मीटर प्रति सेकेंड) पानी पाकिस्तान को जारी करना होगा। हालांकि पाकिस्तान सौ क्यूमेक्स प्रवाह चाहता था, जिससे यह काफी कम है। यानी अदालत ने निर्बाधा पानी के प्रवाह के पाकिस्तान की मांग को आंषिक तौर पर स्वीकार किया है। अंतिम फैसला दोनों देशों के लिए बाध्यकारी होगा और इस पर कोई अपील नहीं की जा सकेगी।

               गौरतलब है कि किशनगंगा, झेलम की एक सहायक नदी है। पाकिस्तान में प्रवेश करने के बाद यह नदी, नीलम के नाम से जानी जाती है। मई, 2010 में पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय में एक याचिका दायर की थी, जिसमें उसने भारत पर आरोप लगाए थे कि वह पाकिस्तान के 949 मेगावाट की नीलम-झेलम जल विद्युत परियोजना (एनजेएचईपी) को नुकसान पहुंचाने के लिए किषनगंगा नदी जल को मोड़ने का प्रयास कर रहा है। बहरहाल मध्यस्थता अदालत ने जून, 2011 में किशनगंगा परियोजना स्थल और आसपास के इलाकों का दौरा किया और सारी स्थितियों को अच्छी तरह से जानने-समझने के बाद ही अपना फैसला दिया। अदालत ने अपने अंतिम फैसले में कहा कि चूंकि भारत ने किशनगंगा जल विद्युत परियोजना (केएचईपी) की पाकिस्तान के एनजेएचईपी परियोजना से पहले कार्ययोजना बनाई थी। लिहाजा केएचईपी को प्राथमिकता मिलना वाजिब है। यदि इसके बाद भी दोनों पक्ष संतुश्ठ नहीं हैं, तो किशनगंगा नदी से जल प्रवाह की दिशा प्रथम बार मोड़ने के सात साल बाद दोनों देष स्थायी सिंधु आयोग और सिंधु जल समझौते की रूपरेखा के मुताबिक निर्णय पर 'पुनर्विचार' कर सकते हैं।

              इससे पहले इस साल फरवरी में दिए गए आंशिक फैसले में किषनगंगा नदी के न्यूनतम प्रवाह का मुद्दा अनसुलझा ही रह गया था। आंशिक फैसले में अदालत ने सर्वसम्मति से निर्णय किया था कि जम्मू कश्मीर में 330 मेगावाट की परियोजना में सिंधु जल समझौते की परिभाषा के तहत नदी का प्रवाह बाधित नहीं होना चाहिए। सिंधु जल समझौता अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिस पर भारत और पाकिस्तान ने साल 1960 में दस्तखत किए थे और यह समझौता 1 अप्रैल 1960 से अमल में आ गया था। समझौते में दोनों देशों के बीच सिंधु नदी के जल के इस्तेमाल को लेकर साफ-साफ दिशा निर्देश हैं। समझौते के तहत भारत पश्चिमी नदियों मसलन सिंधु, झेलम और चिनाब और उनकी सहायक नदियों के पानी का उपयोग घरेलू, विशेषी.त .षि कार्य और पनबिजली परियोजना हेतु कर सकता है और बाकी बचे पानी को पाकिस्तान के लिए छोड़ेगा। जाहिर है कि भारत ने पनबिजली परियोजना पर अपना जो भी काम आगे बढ़ाया, वह सिंधु जल समझौते के मुताबिक ही है।

               किशनगंगा नदी पर बन रही किशनगंगा पनबिजली परियोजना भारत की महत्त्वाकांक्षी परियोजना है। परियोजना उत्तरी कश्मीर में बांदीपुरा के निकट गुरेज घाटी में स्थित है। नेशनल पावर कारपोरेशन द्वारा इस परियोजना का कार्य वर्ष 1992 में प्रारम्भ किया गया था। 330 मेगावॉट की इस परियोजना की लागत कोई 3 हजार 6 सौ करोड़ रुपए है। परियोजना पूरे होने के बाद जहां उत्तरी कश्मीर के लोगों की बिजली की जरूरतें पूरी होंगी, वहीं किसानों को खेती के लिए पानी भी मुहैया होगा। केएचईपी की रूपरेखा ऐसे तैयार की गई है, जिसके तहत किशनगंगा नदी में बांधा से जल का प्रवाह मोड़कर झेलम की सहायक नदी बोनार नाला में लाया जाना है। भारत ने जब इस परियोजना पर काम षुरू किया, तो पाकिस्तान को इस पर कोई एतराज नहीं था, लेकिन जैसे ही परियोजना आकार लेने लगी, उसने अपना रुख बदल लिया और इसका विरोध करने लगा। पाकिस्तान का कहना था कि भारत की इस परियोजना की वजह से किषनगंगा नदी जल में उसका करीब 15 फीसद हिस्सा गायब हो जाएगा। पाकिस्तान के इस अचानक एतराज की वजह, दरअसल उसकी नीलम-झेलम जल विद्युत परियोजना है। जो उसने भारत की किशनगंगा जल विद्युत परियोजना के बाद षुरू की थी। पाकिस्तान को लगने लगा है कि भारत द्वारा किशनगंगा नदी के बहाव को मोड़ने से उसकी नीलम-झेलम जल विद्युत परियोजना को नुकसान पहुंचेगा। यही वजह है कि पाकिस्तान अब हर मंच पर किशनगंगा पनबिजली परियोजना का विरोध कर रहा है।

               कुल मिलाकर अंतरराष्ट्रीय पंचाट न्यायालय के हालिया फैसले ने किशनगंगा पनबिजली परियोजना के संबंधा में पानी का रुख मोड़ने की अनुमति देकर भारत के रुख की वैधाता की आज दोबारा पुष्टि की है। अदालत का यह फैसला एक बार फिर रेखांकित करता है कि भारत, सिंधु जल समझौते का पालन करता रहा है। अपनी परियोजना के लिए उसने कभी सिन्धु जल समझौते के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं किया। पाकिस्तान ने अंतरराश्ट्रीय अदालत में भारत के खिलाफ जो भी आरोप लगाए थे, वे पूरी तरह से बेबुनियाद थे। पाकिस्तान का कश्मीर में किशनगंगा नदी पर पनबिजली परियोजना के निर्माण का विरोध दुर्भावनापूर्ण था। यही वजह है कि आखिर में जाकर उसे हार मिली और भारत को जीत।

? जाहिद खान