संस्करण: 30 दिसम्बर -2013

भागवत कथा-

आडवाणी बनाम मोदी

? विवेकानंद

               हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक कहानी सुनाकर लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी न छोड़ने की अपील की। भागवत की कहानी के मुताबिक, एक गांव में एक महिला गलती से हवन कुंड में थूक देती है लेकिन हवन कुंड की पवित्रता उसके थूक को सोने में तब्दील कर देती है। महिला का पति उस महिला को ये बात किसी को न बताने की नसीहत देता है लेकिन महिला ये बात सहेलियों को बता देती है और पूरे गांव में ये बात फैल जाती है। धीरे-धीरे उस गांव में सारे लोग अमीर होते जाते हैं लेकिन महिला और उसक पति गरीब ही रहते हैं। उन्हें ताने मिलते हैं जिससे परेशान होकर दोनों गांव छोड़ देते हैं लेकिन जैसे ही वे गांव से बाहर निकलते हैं, गांव में आग लग जाती है। तब महिला का पति उससे कहता है कि पूरे गांव के हर परिवार में पाप होता था (हवनकुंड में थूकने का) और सबको सोना मिलता था लेकिन हमारी वजह से गांव बचा हुआ था क्योंकि हम ये नहीं करते थे। हमारे बाहर निकलते ही गांव बर्बाद हो गया। इस कहानी का गूढार्थ केवल इतना ही नहीं कि भागवत ने आडवाणी को पार्टी में रुकने के लिए कहा। बल्कि एक तरह से उन्होंने शेष बीजेपी नेताओं को हवनकुंड में थूकने का पाप करने वाला भी करार दिया। आडवाणी और बीजेपी पर यदि इस कहानी को परखें तो आडवाणी ने लोकतंत्र के हवन कुंड में एक गलत आंदोलन चलाया। लेकिन लोकतंत्र की पवित्रता से उन्हें सत्ता रूपी सोना मिला। अटल बिहारी वाजपेयी चाहते थे कि और कोई लोकतंत्र की पवित्रता दूषित न करे, इसलिए उन्होंने गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं को हटाना चाहा, लेकिन आडवाणी ने उनको बचा लिया। परिणाम यह हुआ कि लोकतंत्र का अपमान करने वाले अमीर होते गए, मोदी आज पीएम इन वेटिंग हैं जबकि आडवाणी गरीब होते चले गए, आज मोदी के सामने उनकी कोई सुनता नहीं है। उन्हें पार्टी के ही नेता ताने मारते हैं, इसलिए आडवाणी ने राजनीति छोड़ने का मन बना लिया था। अब संघ को सिर्फ इतनी चिंता है कि आडवाणी गांव छोड़कर न जाएं, वरना यहां आग लग जाएगी क्योंकि संघ यह भी समझता है कि जिस लोकप्रियता के बूते मोदी इतना उछल रहे हैं, वह वास्तविक नहीं काल्पनिक है, खरीदी हुई है।

              इसका एक और पहलू भी है, जिसे शायद नरेंद्र मोदी के मीडिया मैनेजमेंट के कारण हवा नहीं दी गई और वह यह है कि जिस कथित लोकप्रियता पर मोदी इतना सीना फुलाकर घूमते हैं, संघ जानता है कि एक वक्त पर आडवाणी की लोकप्रियता इससे कई गुना ऊंची थीं। राम रथयात्रा के वक्त आडवाणी की एक झलक पाने के लिए लोग आपस में जूझ जाते थे। आडवाणी का रक्त से तिलक होता था। उस लोकप्रियता के सामने मोदी कहीं नहीं टिकते। मोदी अपने अहंकार में भले ही यह बात भूल गए हों लेकिन आरएसएस आडवाणी के उस दौर को कभी नहीं भूल सकता। शायद इसीलिए मोहन भागवत ने आडवाणी से पार्टी न छोड़ने की अपील खुद सार्वजनिक मंच से कही है। दूसरी बात इसी कहानी में संघ प्रमुख ने यह भी संकेतों में साफ कर दिया कि बीजेपी में अब जो लोग हैं, वे केवल सत्ता सुख भोगना चाहते हैं। अमीर होने के लिए हवनकुंड में थूक रहे हैं। लेकिन सत्ता का सुख आरएसएस भी भोगना चाहता है, इसलिए वह चाहता है कि आडवाणी पार्टी में बने रहें ताकि जो पाप हो रहे हैं उन पर पर्दा पड़ा रहे। यानी गांव न जले।

               बीजेपी को सत्ता दिलाने के लिए एक ओर संघ एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है तो दूसरी ओर नरेंद्र मोदी अपने झूठ का पिटारा लेकर घूम रहे हैं। पहले अपने इतिहास ज्ञान पर किरकिरी करा चुके मोदी ने अपनी आदत नहीं बदली और महाराष्ट्र में भी किरकिरी करा ली। लेकिन उनका मीडिया मैनेजमेंट गजब का है। मीडिया ने उनके झूठ का सिरा तक नहीं पकड़ा। मुंबई में महागर्जना करने पहुंचे मोदी झूठ का हथियार पहले से ही साथ ले गए थे, लिहाजा उन्होंने बिना लाग-लपेट के कह दिया कि 1960 के बाद महाराष्ट्र में 26 मुख्यमंत्री हुए। यह लाइन जाहिर है कांग्रेस को कोसने के लिए बोली गई थी सो उन्होंने वही किया। मजेदार बात यह है कि मोदी को सुनने आए लोगों ने ताली भी पीट दी। मोदी के ऐसे ही झूठ पर आजकल तालियां बज रही हैं, और तालियां पीटने वाले बीजेपी के कार्यकर्ता हैं, जिन्हें वह आम जनता कह-कहकर मोदी की लोकप्रियता का ढिंढोरा पीटती है। लेकिन इन तालियां पीटने वालों को पता नहीं है कि जिस तरह मोदी ने महाराष्ट्र में 26 मुख्यमंत्री गिनाए उस तरह तो गुजरात में 27 मंत्री हुए हैं और उसी अवधि में जिसमें उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्रियों का जिक्र किया। यानि 1960 के बाद महाराष्ट्र में 17 मुख्यमंत्री हुए हैं। इन लोगों ने बतौर मुख्यमंत्री 26 बार पद की शपथ ली। इसी तरह गुजरात में भी इसी अवधि में 14 मुख्यमंत्री हुए और उन्होंने 27 बार सीएम पद की शपथ ली। ऐसा झूठ मोदी कई बार बोल चुके हैं।

                हार-जीत अपनी जगह है, दो प्रतिद्वंद्वियों में से एक ही जीतता है, लेकिन जीतने के लिए बेईमानी करना सियासी गेम का मोदी फंडा बनकर उबर रहा है। मोदी न केवल झूठ बोलने में माहिर हैं बल्कि खुद को कभी स्वामी विवेकानंद, कभी सरदार पटेल तो कभी इब्राहिम लिंकन और बराक ओबामा साबित करने पर जुट जाते हैं। मुंबई में मोदी ने यही किया। उन्होंने चाय वालों को सियासी स्वार्थ की खातिर सम्मान दिया। फिर भी यह अच्छी बात है, इसके बाद उन्होंने कहा कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा आइसक्रीम बेच सकते हैं, अब्राहम लिंकन लकड़ी काटने का काम कर सकते हैं और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम अखबार बेच सकते हैं, तो मेरे चाय बेचने से दिक्कत क्या है? मेरे लिए देश का हर नागरिक अहम है। मोदी की इस दलील में कोई खोट नहीं है। खोट है तो सिर्फ मोदी की खुद की झूठी तारीफ में। मोदी ने जिन अमेरिका के महान राष्ट्रपति इब्राहिम लिंकन का जिक्र करके खुद को उनके मुकाबले खड़ा करने की कोशिश की, सही मायनों में मोदी उनके पासंग भी नहीं हैं। एक ओर इब्राहिम लिंकन हैं जिन्होंने बेहद गरीबी से अपना जीवन शुरू किया और सत्ता के शिखर पर पहुंचने के बाद उनमें लेश मात्र भी अहंकार नहीं आया। नाली में पड़े एक सुअर को निकालने के लिए वह व्यक्ति अपने ओहदे की परवाह किए बिना नाली में उतर गया। दूसरी ओर नरेंद्र मोदी हैं जो इंसान की तुलना कार के नीचे आए कुत्ते के पिल्ले से करते हैं। ऐसा अहंकारी आदमी यदि अपनी तुलना इब्राहिम लिंकन से करे तो समझ में नहीं आता कि इसकी व्याख्या कैसे करें। इसी तरह मोदी ने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का नाम लिया। अब्दुल कलाम की अमेरिका में तलाशी ली गई थी। इसके बाद उनके जवाब थे कि संबंधित देश ने अपने कानून के मुताबिक काम किया, मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है। दूसरी ओर नरेंद्र मोदी हैं, जिनके कारनामों की जांच की चर्चा भी होती है तो राशन-पानी लेकर सरकार के ऊपर पिल पड़ते हैं... सीबीआई का दुरुपयोग हो रहा है...सीबीआई कांग्रेस ब्यूरो है.. आदि-आदि। इसलिए साफ शब्दों में कहा जाए तो मोदी की इन महान लोगों के सामने वैचारिक और व्यवहारिक किसी भी स्तर पर कोई तुलना नहीं हो सकती। आडवाणी से भी नहीं...?

? विवेकानंद