संस्करण: 30मार्च-2009

अनावश्यक खर्चों के चक्रव्यूह में
फँसता मध्यम वर्ग



डॉ. महेश परिमल

ज हमारे देश में हर समस्या के समाधान के लिए कंसल्टेंट की व्यवस्था है। घरेलू झगड़े, व्यापारिक झगड़े, आदि के लिए आपको कंसल्टेंट मिल जाएँगे। पर क्या आप जानते हैं हमारे देश में कंसल्टेंट की सबसे अधिक आवश्यकता मधयमवर्गीय परिवारों को है, जिससे वे यह समझ सकें कि पैसों को किस तरह से खर्च किया जाए। यह सच है कि पैसा हाथ में आता है, उससे पहले ही उसके खर्च करने का रास्ता तैयार हो जाता है, लेकिन यदि अनावश्यक रूप से पैसों को खर्च किया जाए, तो इसे स्टेटस मेंटेन ही कहा जा सकता है। स्टेटस मेंटेन की सबसे अधिक आवश्यकता मधयमवर्गीय परिवारों को ही होती है, क्योंकि वे दोहरी मानसिकता के साथ जीते हैं। एक तो अपने बराबर के स्तर के लोगों से ऊपर उठने की स्पर्धा और दूसरी अपने से निम्न वर्ग को नीचा दिखाने की लालसा। इस मानसिकता के चलते स्टेटस मेंटेन करना आवश्यक हो जाता है और यही आवश्यकता तनाव को जन्म देती है। लिहाजा बात घूम-फिर कर वहीं आ जाती है- तनाव मुक्ति के लिए कंसल्टेंट की मदद लेना।

मंदी की पीड़ा भोग रहे मधयम वर्ग के लोग जब यह कहते हैं कि आजकल खर्च बहुत अधिक बढ़ गया है और घर चलाना मुश्किल हो रहा है, तो इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं लगाया जाना चाहिए कि अनाज और सब्जियों के भाव आसमान छू रहे हैं, इसलिए उन्हें आर्थिक परेशानी से जूझना पड़ रहा है। ऐसा केवल शहरी लोगों में ही देखा जा रहा है। गाँव वाले आज भी अपनी कमाई का काफी बड़ा हिस्सा अपने भोजन पर खर्च करते हैं। शहरी लोग आजकल अनाज पर होने वाले खर्च को कम करके अन्य सुविधाओं पर अधिक खर्च कर रहे हैं। मसलन घर में आने वाले गेहूँ, चावल, दाल, घी-तेल एवं सब्जी पर खर्च कम कर मोबाइल एवं अन्य इलेक्ट्रानिक सामानों पर खर्च कर रहे हैं।

यह जानकारी हाल ही में साल्मोन एसोसिएटस की तरफ से केएसए टेक्नोपेक कंज्यूमर आउटलुक सर्वे में सामने आई। इस सर्वेक्षण में देश भर के 20 शहरों करीब 60 हजार उपभोक्ताओं को लिया गया। इसमें यह बात खुलकर सामने आई कि शहरी लोग अपने अनाज और किराना सामान में लगातार कटौती कर रहे हैं और सेलफोन, घर के नौकर जैसे स्टेटस सिंबॉल के पीछे काफी खर्च कर रहे हैं। इस तरह से आज की पीढ़ी अभी से कुपोषण को आमंत्रित करने में लगी है। इस कंपनी के सीनियर कंसल्टेंट अक्षय चतुर्वेदी का कहना है कि पिछले दो वर्षों में मधयम वर्ग के किराना के बिल में 6 प्रतिशत की कमी आई है, दूसरी ओर मोबाइल फोन, इंटरनेट के खर्च में 200 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। मधयम वर्ग आज शुध्द घी के बजाए वनस्पति से काम चलाने लगा है। भोजन में दाल, सब्जी और फलों की मात्रा कम होने लगी है। गाँव के किसान आज भी अपनी आवक का 90 प्रतिशत भोजनादि पर खर्च करते हैं, जबकि शहर मधयम वर्ग आहार पर मात्र 28 प्रतिशत ही खर्च कर रहे हैं। इस वर्ग का फैशन और लाइफस्टाइल पर अधिक से अधिक खर्च हो रहा है।

अभी दस वर्ष पहले तक शहरी जो भी कमाते थे, उसका एक निश्चित हिस्सा बचा लेते थे। बचत की यह प्रवृत्ति अब कमी आने लगी है। इस सर्वेक्षण के अनुसार सन् 2002-2003 में शहरीजनों ने अपनी आवक का लगभग 3.7 प्रतिशत बचत करते थे। एक साल के भीतर ही इस बचत में 24.3 प्रतिशत की कमी आ गई। इस वर्ष उनके खर्च में थिएटर जाकर फिल्में देखने का खर्च बढ़ गया। इस तरह से मनोरंजन पर कुल आवक का 2.7 प्रतिशत खर्च होने लगा। इसके ठीक एक साल बाद यह खर्च 3.1 प्रतिशत बढ़ गया।

नीतिशास्त्र यह कहता है कि इंसान को अपनी आवक का 50 प्रतिशत भाग घर खर्च पर लगाना चाहिए। 25 प्रतिशत दान-धार्म पर और शेष 25 प्रतिशत राशि बचत करनी चाहिए। हमारे देश के शहरीजन इसे नकारते हुए आवक का 25 प्रतिशत बचाने के बजाए अब मात्र 2.8 प्रतिशत बचा पा रहा है। इसके अलावा कई ऐसे परिवार है, जो आवक से अधिक खर्च कर अपनी नींदें ही उड़ा रहा है। अब काफी चीजें किस्तों में मिलने लगी हैं, इसलिए वह कर्ज लेकर भी इन चीजों को खरीद लेता है। वह यह भूल जाता है इन चीजों पर वह जितना खर्च कर रहा है, उसका मूल ब्याज समेत कई गुना बढ़ जाता है। शहरीजन एक से अधिक क्रेडिट कार्ड यह सोचते हैं कि हमने अपना खर्च बचा लिया। यहाँ भी उनकी मूर्खता सामने आती है, क्रेडिट कार्ड पर कितना अधिक ब्याज देना होता है, यह तो तभी पता चलता है, जब उनके सामने खर्च का ब्यौरा आता है।

आज अधिकांश हाथों पर मोबाइल देखा जा रहा है। अब यह आवश्यकता से अधिक फैशन बनता जा रहा है। एक घर में यदि 5 सदस्य हैं, तो हर सदस्य का अपना मोबाइल होता है। इस दृष्टि से मोबाइल पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है। 5-6 वर्ष पहले मोबाइल पर आवक का एक प्रतिशत ही खर्च होता था, अब यह खर्च 70 प्रतिशत बढ़ गया है। इन सबके पीछे देखा-देखी की भावना ही है, जिसके कारण इंसान लगातार खर्च को प्रोत्साहन देता रहता है। इसके लिए टीवी और अखबारों पर आने वाले विज्ञापन भी कम दोषी नहीं हैं, जो व्यक्ति को उत्पाद को खरीदने के लिए लगातार प्रेरित करते रहते हैं।

स्टेटस मेंटेन एक मृग-मरीचिका की तरह है। इसके पीछे दौड़ने का कोई अर्थ नहीं है। पड़ोसी के पास बाइक देखकर हम अपनी साइकिल बेचकर जब तक बाइक खरीदते हैं, तब तक पड़ोसी एक कार खरीद लेता है। जब हम कार तक पहुँचते हैं, तब तक पड़ोसी एक और महँगी कार खरीद लेता है। हमारा लैट कितना भी आलीशान और पॉश कालोनी में हो, पर पड़ोसी जब बंगला खरीदेगा, तो उसके सामने हमारा लैट फीका ही लगेगा। हमारे हाथ में सादा मोबाइल होगा, तो उसके हाथ में कैमरे और ब्ल्यू टूथ वाला कैमरा होगा। इस तरह से यदि हम पड़ोसी से अपनी तुलना करेंगे, तो पीछे ही रह जाएँगे, यह तय है।

आज मधयम वर्ग के सामने सबसे बड़ी समस्या घर के सदस्यों का स्वास्थ्य और बच्चों की पढ़ाई है। शिक्षा के क्षेत्र में भी आज प्रतिष्ठित शाला या कॉलेज, ऍंगरेजी माधयम, टयूशन, कंप्यूटर आदि मामलों में गलत मापदंडों के कारण बेकार के खर्च खूब बढ़ रहे हैं। 5 लोगों के परिवार में यदि 3 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं, तो उस घर की 33 प्रतिशत आय शिक्षा पर ही खर्च होती है। इतना खर्च करने के बाद भी यह गारंटी नहीं है कि बच्चा बेहतर से बेहतर शिक्षा प्राप्त कर रहा है और उसका भविष्य उवल है। यही हाल है स्वास्थ्य का। आज एलोपेथी प्रणाली को देखें, तो यह प्रणाली मरीज का बेसब्री से इंतजार करती पाई जाती है। मरीज डॉक्टर के द्वार पर पहुँचा नहीं कि केमिस्ट, पैथालॉजी, अस्पताल, डॉक्टर आदि की फौज खड़ी हुई होती है। मरीज तो लुट जाने के बाद अच्छा होता है, यह जानने की हिम्मत खुद मरीज को भी नहीं होती। इन सबके बीच दान-धर्म की बात करना ही बेकार है। इसलिए यही कहा जा रहा है कि आज मधयम वर्ग किस तरह से अपना खर्च कम से कम करके सुखी रह सके, यह बताने के लिए अनेक कंसल्टेंट की आवश्यकता है। क्या आपकी जानकारी में है ऐसा कोई कंसल्टेंट?

 


डॉ. महेश परिमल