संस्करण: 30मार्च-2009

आर्थिक बदहाली
की ओर मध्यप्रदेश

 

 

 

महेश बागी

धयप्रदेश आर्थिक बदहाली की ओर बढ़ रहा है। राज्य का राजस्व कर संग्रहण, जो 17 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गया था, उसमें दस साल दो हज़ार करोड़ की कमी आने के आसार हैं। राजस्व में आई कमी के कारण सरकार को राज्य की वार्षिक योजना में दो हज़ार करोड़ रुपयों की कटौती करने को मज़बूर होना पड़ रहा है। राज्य का सरकारी ख़जाना तो ख़ाली है, ही उस पर 70 हजार करोड़ रुपयों का ओव्हर ड्राफ्ट भी है। वित्तीय साधान जुटाने के लिए सरकार जितना कर्ज ले सकती थी, उतना ले चुकी है। हालत यह है कि अब कर्ज़ मिलने की संभावना भी धूमिल हो गई हैं। ऐसी स्थिति में सरकार को अपनी भी धूमिल हो गई हैं। ऐसी स्थिति में सरकार को अपनी प्रतिभूतियां बेचना पड़ रही हैं। इसी के साथ ख़र्च बढ़ाने की गरज से विभिन्न विभागों के बजट में कटौती करना पड़ रही है। औसतन 30 से 40 फीसदी बजट कम किया जा रहा है। वित्तीय संकट के कारण राज्य सरकार की योजनाओं के लिए खरीदी पर भी प्रतिबंधा लगा दिया गया है। सिर्फ़ विदेशी सहायता और केंद्रीय योजनाओं के लिए ही धान मिल पा रहा है।

मधयप्रदेश के संसदीय इतिहास में ऐसी आर्थिक बदहाली पहले कभी नहीं आई। हालांकि सरकार इस संकट से उबरने के प्रयास करने में जुटी है, किंतु सवाल यह है कि यह बदहाली क्यों आई। शिवराज सरकार के पहले कार्यकाल में लोक लुभावन कार्यक्रमों के लिए पानी की तरह पैसा बहाया गया। पांच-पांच इन्वेस्टर्स मीट और विभिन्न वर्गों की पंचायतों-महापंचायतों में दोनों हाथों से ख़जाना लुटाया गया। यद्यपि इन तमाम नौटंकियों से भाजपा की सत्ता में वापसी तो गई, परंतु राज्य आर्थिक बदहाली के दलदल में धांसता चला गया। शिवराज सिंह चौहान अपने पहले कार्यकाल में जब कागज़ी कार्यक्रमों पर भारी राशि खर्च कर रहे थे, तब उनके मंत्री भी उनसे पीछे नहीं थे। हवाई यात्राओं और बंगालें की साज-सज्जा के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया गया। कुछेक मंत्री तो सरकारी खर्च पर विमान यात्राओं में अयाशी के कारण भी चर्चा में रहे। इन पर न मुख्यमंत्री का कोई अंकुश था और न ही वित्तमंत्री राघव जी का। नतीजा सामने है। अपनी दूसरी पारी में शिवराज सरकार को अर्थव्यवस्था सुधाारने के लिए नाकों चने चबाना पड़ रहे हैं।

अब वित्तमंत्री को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है तो वे नए कर लगाने की ओर बढ़ रहे हैं। यह वहीं भाजपा सरकार है, जिसने पहली बार सत्ता में आने के पूर्व यह वादा किया था कि उनकी सरकार बनी तो वोट कर समाप्त कर दिया जाएगा। पूरे पांच साल तक सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा ने अपना यह वादा पूरा नहीं किया और अब दूसरी पारी में नए करारोपण की कवायद की जा रही है। लाड़ली लक्ष्मी योजना और कन्यादान योजना का श्रेय लेते समय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने आपको कभी भाई तो कभी मामा कह कर गाल बजाते रहे हैं और उन्हीं की सरकार गृहिणियां की रसोई पर भार बनी बैठी है। शिवराज सरकार ने रसोई गैस पर से प्रवेश कर आज तक नहीं हटाया है। केंद्र सरकार द्वारा रसोई गैस के दाम करने के बाद पूरे देश में रसोई गैस सिलेंडर की कीमत पौने तीन सौ रुपए है, जबकि मधयप्रदेश में यहीं सिलेंडर साढ़े तीन सौ रुपए में लेना पड़ रहा है।

वित्तीय संकट से जूझ रही सरकार को कुछ सूझ नहीं रहा है। कभी वेट कर समाप्त करने की घोषणा करने वाली शिवराज सरकार अब वेट कर में वृध्दि का भी रास्ता ढूंढ रही है। अभी लोकसभा चुनाव के कारण सरकार ने इसमें वृध्दि नहीं की है और नया कर भी नहीं लगाया है। चुनाव बाद प्रदेश की जनता को ये दोनों भार झेलना पड़ेंगे। सत्ता में वापसी के लिए शिवराज सरकार ने राज्य के सरकारी कर्मचारियों को छठे वेतनमान का लाभ देने की घोषणा की थी, जिसे पूरा करने के लिए राज्य सरकार को सालाना 25 सौ करोड़ रुपयों की ज़रूरत होगी। इसी प्रकार किसानों को तीन प्रतिशत ब्याज दर पर कर्ज़ उपलब्धा करवाने के लिए सरकारी ख़जाने पर पांच हज़ार करोड़ रुपयों का भार पड़ना तय है। इसके अलावा शिवराज सिंह ने जो लोक लुभावनी घोषणाएं की हैं, उनके क्रियान्वयन के लिए कम से कम बीस हज़ार करोड़ रुपयों की ज़रूरत होगी। इतनी बड़ी रकम कहां से जुटाई जाएगी, इसका जवाब सरकार को कहीं से नहीं मिल रहा है।
शिवराज सरकार प्रगति और विकास के दावे करती है, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। नागरिकों की खुशहाली के लिए पड़ोसी राज्य दुकानें बंद करवा दीं। इसके ठीक विपरीत शिवराज सरकार ने डेढ़ सौ नई शराब दुकानों के ठेके दे दिए हैं। राज्य के कई प्रमुख मार्गों का विकास और रखरखाव बीओटी के तहत हो रहा है। इसी क्रम में शिवराज सरकार अब स्टेट हाई वे और नेशनल हाईवे भी निजी हाथों में सौंपने जा रही है। अब इन मार्गों से गुज़रने के लिए भी लोगों को जेब ख़ाली करना होगी। सरकार द्वारा विभिन्न विभागों के बजट में की गई कटौती के कारण राज्य की विकास योजनाओं पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। उधार नए करारोपण के बाद महंगाई से जूझ रहे आम आदमी का जीवन और दूभर हो जाएगा। ख़ास बात यह है कि इतना भीषण आर्थिक संकट होने के बावजूद मंत्री-अफसर अपने ख़र्च में कटौती करने को तैयार नहीं हैं। कहीं वे साज-सज्जा पर लाखों-करोड़ों रुपए फूंके जा रहे हैं।

बिजली मुद्दे पर तो भाजपा पूरी तरह नाकाम रही है। सौ दिन में बिजली संकट दूर करने का दावा करने वाली भाजपा सरकार पूरे पांच साल में बिजली संकट का समाधाान नहीं कर पाए है। इसके विपरीत स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। ग्रामीण अंचलों में तो दो-चार घंटे भी बिजली नहीं मिल पा रही है। अपनी नाकामी को छुपाने के लिए मुख्यमंत्री न्याय यात्रा की नौटंकी कर रहे हैं। अगर केंद्र सरकार के प्रति उनके आरोपों में ज़रा भी दम है तो भाजपा के सांसद यह मुद्दा लोकसभा में क्यों नहीं उठा पाए ? ऐसा न करने से ज़ाहिर है कि शिवराज सरकार जनता में भ्रम फैलाने के लिए थोथी नौटंकी कर रही है। राज्य की आर्थिक बदहाली के ज़िम्मेदार यह सरकार शोशेबाज़ी कर रही है। लेकिन काठ की हांडी एक बार ही चूल्हे पर चढ़ती है, यह बात यह सरकार क्यों भूल जाती है। लोकसभा के चुनाव परिणाम इस सरकार के कामकाज पर अपनी मुहर लगा देंगे।




 

महेश बागी