संस्करण: 30मार्च-2009

चुनावी काले धन के
जन कल्याण

 

 

 


प्रमोद भार्गव

         कालेधान के सरोकार भी जन कल्याण से जुड़े हों यह विचित्र विरोधाभास भारत में ही देखने को मिलता है। कालाधान वैश्विक आर्थिक मंदी से प्रभावित देश की अर्थव्यवस्था को उबारने का काम करेगा यह विसंगति भी यहीं हैं। एक अनुमान के मुताबिक पच्चीस करोड़ के काले धान की पूंजी लोकसभा चुनाव में खर्च होने जा रही है, जो मंदी की आंच झेल रहे लोगो के चेहरों पर बहार लाने का काम करेगी। इस राशि के अलावा वैधानिक स्त्रोतों से भी करीब चालीस हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। बहरहाल काले धान का यह चुनावी तड़का भारतीय अर्थव्यवस्था को राहत पहुंचाने जा रहा है।

     लूट के वैश्वीकरण के चलते चौपट अर्थव्यवस्था स्थायी तौर से तो नहीं लेकिन कुछ समय के लिए पटरी पर आकर लोगों की आर्थिक कमजोरी को मजबूत करेगी। लूट का केन्द्रीयकरण नेता, अधिकारी और उद्योगपतियों के गठजोड़ ने किस बेशरमी से किस हद तक किया है यह स्विस बैंक एसोसिएशन द्वारा जारी 2006 की रिपोर्ट से साबित हुआ हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत के लोगों का 1456 अरब डॉलर कालाधान स्विस बैंक में जमा है। यह राशि रुस, ब्रिटेन, यूक्रेन और चीन की सम्मिलित कालेधान की राशि से कहीं अधिक है। लूट के इसी तंत्र के बूते देश में अरब-खरबपतियों की संख्या बढ़ रही है। दिल्ली में चार साल पहले चार खरबपति थे अब उन्नीस हैं।

      लूट के ऐसे ही स्त्रोतों से धान दो-ढाई माह के भीतर बाहर आकर लोगों के चेहरों पर रौनक लाएगा। एक अच्छी बात इस धान की यह भी है कि यह नकदी के रुप में आता है, इसलिए इस राशि का चक्रीकरण तुरंत शुरु होकर आमजन को लाभ पहुंचाने लग जाता है।

       चुनाव विशेषज्ञों द्वारा लगाए अनुमानों के मुताबिक इस पन्द्रहवें लोकसभा चुनाव में करीब साढ़े पांच हजार प्रत्याशी मैदान में होंगे। इन प्रत्याशियों को चुनाव आयोग द्वारा 25 लाख रुपए प्रति प्रत्याशी खर्च करने की वैधानिक छूट है। यदि इस राशि को ही जोड़ लगा लिया जाए तो यही राशि 1350 करोड़ बैठती है। भाजपा और कांग्रेस अकेली दो पार्टियां ही चुनाव में 1500 करोड़ रुपए खर्चने जा रही हैं। बसपा और पूरे देश में कुकुरमुत्तों की तरह राजनीति की उर्वरा भूमि पर उभरे 220 क्षेत्रीय दल भी करीब 2000 करोड़ की धान राशि खर्चने को तत्पर हैं। प्रदेश सरकारें भी करीब 700 करोड़ रुपए खर्च करेंगी। स्वयं निर्वाचन आयोग का बजट भी 1300 करोड़ रुपए है।

   चुनाव की सबसे अच्छी बात यह है कि यह राशि निकलती तो पूंजीपतियों की तिजोरी से है लेकिन जाती मधय और आमजन के हाथों में है इस कारण यह बाजार में तेजी से फैलती है। अनुमानों के मुताबिक परिवहन, उड्डयन, कागज, रंग-रोगन, धवनि विस्तारक यंत्र, मुद्रण और प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया के खाते में ही करीब 10 हजार करोड़ रुपए जाने की उम्मीद है।

    राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दलों के पास इफरात पैसा बढ़ने के साथ जमीनी दावा व सुधार की तथाकथित बातें करने वाले इनके नेताओं में वैभव प्रदर्शन का भाव बढ़ा है। इसलिए भीड़ में आर्कषण का केन्द्र बनने के लिए ये नेता हेलिकॉप्टर्स और चार्टड विमानों का इस्तेमाल करेंगे। इनके किराये खर्च पर ही 250 करोड़ रुपए खर्च होने की उम्मीद है।

         लोकसभा की 543 सीटों पर चुनाव कराने के लिए एक साथ करीब 13 लाख इलेक्टानिक वोटिंग मशीनों की की जरुरत होती है। ये सभी मशीनें हर चुनाव में खरीदने की जरुरत तो नहीं होती, लेकिन कुछ मशीनें खराब हो जाती हैं, कुछ पिछली चुनाव प्रक्रिया के दौरान मतदान केन्द्र कब्जाने के दौरान तोड़ दी जाती हैं और कुछ निर्वाचन प्रक्रिया पर अदालत से स्थगन मिल जाने के कारण फैंसला न होने तक सील रहती हैं। इनकी पूर्ति के लिए नई मशीने खरीदनी होती हैं इसके अलावा इवीएम की बैंटरियां बदलने में भी करीब 650 करोड़ रूपये खर्च होते हैं।

      मतदान प्रक्रिया संपन्न कराने के लिए सभी लोकसभा क्षेत्रों में करीब 8 लाख मतदान केन्द्र बनाये जाते हैं। मतदान कर्मियों के बैठने हेतु टेबिल कुर्सी, मतदान की गोपनीयता बनाये रखने के लिए केबिन व सामियाने के इंतजाम करने में करीब 7 करोड़ रूपये खर्च हो जाते हैं।

     मतदान संपन्न कराने में तकरीबन 40 लाख सरकारी कर्मचारी, अधिकारियों की जरूरत पड़ती है। करीब तीन दिन इस अमले को कर्तव्य पालन करना होता है। इन्हीं के साथ मतदान केन्द्रों की सुरक्षा मुहैया कराने के लिए करीब 21 लाख सुरक्षा कर्मी तैनात किये जाते हैं। इन सब कर्मचारियों को तीन दिन का जो भत्ता दिया जाता है। वह करीब 3000 करोड़ रुपए बैठता है। 

     चुनाव बेरोजगारों को रोजगार देने का काम भी करता है। दीवारों पर बैनर, पोस्टर, झण्डे लगाने वालों को बड़ी संख्या में काम मिलता हैं। वाहन चालकों से लेकर, ऑटो रिक्शा, सायकल रिक्शा व चुनावी रथ पर प्रचार के विशेषज्ञों की भी दो माह पूछ बड़ जाती है। प्रचार के लिए फिल्मी गीतों के आधार पर पैरोडी लिखने व उसका नाटय रुपांतरण करने वाले कलाकारों की भी बन आती हैं। लोक कलाकारों को अच्छा पैसा इन कामों के लिए मिल जाता हैं। इन गीतों व नाटकों की सीडी व टेप बनाने वाली कंपनियों की भी पौ-बारह हो जाती है।

        चुनाव में नुक्कड़ नाटक खेलने, स्वांग रचने व विरोधी उम्मीदवार अथवा प्रतिपक्ष की कमजोरी व करतूतों पर चुटीला भाषण देने वाले मर्मज्ञों की भी खूब पूछ बड़ जाती है। सड़कों पर चप्पल चटकाने वाले इन कला-मर्मज्ञों को चुनाव के दौरान लग्जरी गाड़ी, पौष्टिक आहार और मनोवांछित मानदेय उपलब्धा कराने की व्यवस्था पार्टी और उम्मीदवारों द्वारा कराई जाती है।

              चुनाव में छायाचित्रकारों व वीडियों ग्राफरों की मांग तो हमेशा ही रही है, लेकिन चुनाव आयोग द्वारा पंजीकृत राष्टीय व क्षेत्रीय दलों के उम्मीदवारों के भाषणों पर नजर रखने के लिए इनका उपयोग किए जाने की वजह से भी इनकी मांग बढ़ जाती है और मनचाहा पैसा मिलता है।

            चाय-कॉफी, पूड़ी-सब्जी बनाकर बेचने वालों का भी कारोबार फलता-फूलता है। क्योंकि आजकल कार्यकर्ता आहार के अच्छे इंतजामों के बिना गांव की धाूल फांकने को तैयार नहीं होते। यही नहीं चुनाव में देशी-विदेशी मदिरा की बिक्री भी अपने चरम पर होती है। अब तो प्रत्याशी झुग्गी व गरीब बस्तियों में मतदाता को लुभाने के लिए धाड़ल्ले से शराब बांटते हैं। वस्त्र बांटने का भी खूब प्रचलन है। शायद इसीलिए अर्थशास्त्रियों का अनुमान है नए वित्तीय साल की पहली तिमाही जीडीपी दर उभार पर होगी और चुनाव मुहिम में लगने वाला कालाधान जनकल्याण का काम करेगा

 

 

प्रमोद भार्गव