संस्करण: 30मार्च-2009

फैशन शैली बदलकर मतदाताओं को रिझायेंगा राजनेता
ब्रांड इमेज निखारने के लिए
विज्ञापन एजेंसियों को ठेका
राजेंद्र जोशी

भारतीय राजनीति में अब वह दौर आ गया है जिसमें मतदाताओं को प्रभावित करने और अपने रूप में निखार लाकर उन्हें रिझाने की राजनेताओं में प्रतिस्पधाएं जोर पकड़ती जा रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति के एकदम बाद हमारे देश में प्रजातंत्रीय प्रणाली का उदय हुआ। उस समय के रहनुमाओं में आम जनता की भावनाओं को जीतने के लिए निश्छल जनसेवा जो जज्बा था, वह जज्बा आजादी के सातवे दशक के आते-आते शनै:शनै: विलोपित होता जा रहा है। प्रारंभिक दौर में जनभावना को प्रभावित करने और जनता का दिल जीतने के लिए राजनेताओं में बड़ी लाइन खींचकर सेवाधार्म प्रदर्शित करने की प्रतिस्पधा चलती थी। लेकिन आज के दौर में सेवा के क्षेत्र में इस बात की प्रतिस्पधाएं हो रही है कि किस तरह से एक-दूसरे की लाइन को कतर कर अपनी लाइन से छोटा किया जाय। लाइन को छोटी करने के प्रयास इसलिए भी किए जाते हैं क्योंकि राजनेताओं में स्वयं में इतनी कुव्वत नहीं होती कि वे किसी स्थापित एक रेखा से के आगे अपने कर्तव्यों और व्यक्तित्व के दम पर बड़ी रेखा खींच सके।

सेवा और जनकल्याण के क्षेत्र में उतरे नेताओं के व्यक्तित्व में आती जा रही गिरावटों के इस दौर में जब राजनैतिक पार्टियों और उनके नेताओं को सत्ता प्राप्ति के लिए आयोजित परीक्षा अर्थात निर्वाचन के मैदान में दो-दो हाथ करने के लिए उतरना पड़ता है, तो उन्हें कई तरह की फितरतों और हथकंडों का सहारा लेना लाजिमी हो गया है। नेतागण वोट मांगने के प्रशिक्षण में उत्तीर्ण होना चाहते हैं। अब वोट मांगने के लिए मैदान में उतरने वाले नेता को अपना रूप निखारकर मतदाताओं को अपनी ओर खींचने का चस्का लग गया है। वे शायद यह मानने लगे हैं कि सेवा भावनाओं, विकास और जनकल्याण के कार्यों के संकल्पों के प्रदर्शन से वोट नहीं मिलेंगे, बल्कि उनके निखरे हुए स्वरूप, उनकी वेशभूषा, हेयर स्टाइल और ब्यूटी-पार्लर की डिजाइन किए गये नाक पर मिलेंगे।

इन दिनों यह हकीकत सामने आई है कि चुनावी मौसम में नेतागण अपनी फैशन शैली बदलने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। नेताओं में फैशन शैली का यह चस्का इस बार के निर्वाचन काल में कुछ ज्यादा ही दिखाई दे रहा है। पोस्टरों, होर्डिंग्स, पम्पलेट्स और प्रचार में लगे लाउडस्पीकरों की तो बहुत मार्केटिंग हो चुकी है। अब मार्केटिंग हो रही है वेशभुषा को लेकर, हेयर स्टाइल को लेकर, चेहरे-मोहरे पर नक्काशी को लेकर और यहाँ तक कि चाल ढाल की स्टाइल बदलने को लेकर। इस वक्त विज्ञापन एजेंसियों का बाज़ार बड़े जोरों पर गर्म हैं और इन एजेंसियों को बड़ी-बड़ी पूंजी के क्रय-विक्रय आदेश मिल रहे हैं। फैशन विशेषज्ञ दिन रात अपना स्टूडियो खोलकर बैठे है। इनकी कंपनियों के मार्फत नेतागण सीख रहे हैं जनता के बीच पहुँचने के लिए किस तरह की चाल होना चाहिए। कब कहाँ-कहाँ कितनी दूरी पर कदमों को किस गति से आगे बढ़ाना होगा तथा कब-कब कमर और गर्दन को झटके के साथ इधार-उधार घुमाना होगा।नेतागण सीख रहे हैं आंखे कैसे मटकाई जाय, भौहों, मूछों, और दाढ़ी को किस स्टाइल में बनाई जाय ताकि प्रचार के लिए उतरा नेता किसी सुपर स्टार से कम नहीं लगे। कुछ छुटभैये नेतागण अपनी ही पार्टी के किसी सुपरस्टार की वेशभूषा और उसके भाषण देने की शैली की नकल कर रहे हैं। भाषण में किस शब्द पर और किस वाक्य पर तालियां पिटवाई जा सकती है इस ओर भी धयान देना सिखाया जा रहा है।

नेतागण चाह रहे हैं कि पहनावे से लेकर चाल-ढाल तक का उनका पैनापन चुनावी मौसम में किसी तरह से ढीला नहीं पड़ जाय। इस दिशा में विज्ञापन विशेषज्ञों और फैशन विशेषज्ञों से सलाह-मशविरा किया जा रहा है। कुछ फैशन डिजाइनर और एक्सपर्ट्स अनेक नेताओं के बारे में मानते हैं कि राजनीति में कूदने के समय उनका जो पहनावा था या चाल ढाल थी, उसे ही बरकरार रखा जाना चाहिए। कुछ विशेषज्ञ नेताओं को परामर्श दे रहे हैं कि उन्हें ऐसी नहीं वैसी धाोती बांधाना चाहिए, पजामा नहीं पेंट पहनना चाहिए। चूड़ीदार पजामें पर किस नेता को अचकन जमेंगी, किस नेता के व्यक्तित्व निखार में टाई अच्छी फबेगी या किस महिला नेत्री को कब-कब और किस-किस रंग की साड़ी पहननी चाहिए या किस रंग का सलवार सूट किन किन क्षेत्रों में पहनना चाहिए। जूड़ा कैसा बांधा जाना चाहिए, चोटियां कैसी निकलना चाहिए तथा किस तरह के लेवेन्डर्स इस्तेमाल करना चाहिए। जनता से बात करते वक्त या मंच पर भाषण देते वक्त चेहरे की अदायें कैसे हो, यह भी चुनाव प्रचार में दी जा रही सलाह का विषय माना जा रहा है। कई बड़े नेताओं और नेत्रियों की वेशभूषा और उनकी भाषणशैली इतनी अधिक आकर्षक होती है कि फैशन विशेषज्ञ उनकी तरह अन्य नेताओं और नेत्रियों को मैदान में उतरने का परामर्श दे रहे हैं। बूढ़े नेताओं में भी नौजवान दिखने का चस्का चढ़ गया है। ऐसे नेतागण फैशन विशेषज्ञों की सेवाऐं ले रहे हैं। ये विशेषज्ञ उन्हें क्षेत्र, समय और जनभावना के अनुरूप वस्त्र धाारण करने की सलाह दे रहे हैं। युवा दिखने के लिए धोती-अचकन या पायजामा के बजाय धोती धारी नेताओं को सफारी सूट या टी-शर्ट पहनकर मतदाताओं के बीच जाने का शौक चर्रा रहा है। सफेद बालों को काले रंग से पोतकर पोपले मुँह में नकली डेंचर लगाकर भी नौजवान बनकर मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए नेतागण मैदान में उतर रहे हैं।

राजनीति के बदलते रंग-ढंग में मतदाताओं के बीच जाने के लिए अपना रूप-कौशल लेकर आज जिस तरह मारामारी चल रही है वह पूर्व के महान नेताओं में कभी भी देखने को नहीं मिली। पहले सेवा भावना, देशभक्ति की भावना, जनकल्याण और जनता के हित में कुछ कर दिखाने के मुद्दे प्रमुख हुआ करते थे, ड्रेस डिजाइन, चेहरा मोहरा की सजावट, चाल ढाल और बोलचाल की अदायें सीखने के प्रति नेताओं का धयान नहीं रहता था क्योंकि वे केवल सेवा के लिए समर्पित थे और उसमें ही व्यस्त रहते थे। यदि वेशभूषा, हेयर स्टाइल और चाल ढाल की अदाओं को जनता को लुभाने के लिए ज्यादा महत्व दिया जाता तो आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तस्वीर इस रूप में नहीं होती।
 


 

राजेंद्र जोशी