संस्करण: 30मार्च-2009

घृणा फैलाने वाले नेताओं की जय हो !
 

 


एल.एस.हरदेनिया

    पिछले कुछ दिनों में देश व प्रदेश के राजनीतिक मंच पर कुछ ऐसी घटनाएँ घटी हैं जिनके घटने पर आने वाली पीढ़ियां सहसा विश्वास नहीं करेंगी। चुनाव के ठीक पहिले घट रही इन घटनाओं से एक बात बहुत साफ हो गई है कि राजनीतिक नेता सत्ता की राजनीति के लिए कितने अवसरवादी और कितने अस्थिर विचार वाले हो सकते हैं। इसका तरोताजा उदाहरण उमा भारती का यह निर्णय है कि वे लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रचार करेंगी और वे लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित देखना चाहती हैं। चौंकाने वाली इन्हीं घटनाओं की कड़ी में प्रहलाद पटेल की भाजपा में वापिसी भी है।

एक राजनीतिज्ञ चुनाव के समय में विजय हासिल करने के लिए किस हद तक की भड़काने वाली साम्प्रदायिक भाषा का प्रयोग अपने भाषणों में कर सकता है उसे देखते हुए यह मांग करना अनुचित नहीं होगा कि वे अपने नाम के साथ ''गांधी'' सरनेम का उपयोग न करें।

यहां यह स्मरण दिलाना आवश्यक है कि उमा भारतीय के साथ आडवाणी द्वारा उनके साथ किए गए दर्ुव्यवहार के बाद से ही उनका भाजपा से नाराजगी का सिलसिला चल रहा था। शायद उनके मन में यह आक्रोश रहा होगा कि आडवाणीने ही षडयंत्र करके मुख्मयंत्री के पद से उन्हें हटवाया था। धीरे-धीरे यह नाराजगी बढ़ती गई और अंतत: उन्होंने भारतीय जनता पार्टी से अपना नाता तोड़ लिया। उसके बाद उन्होंने भाजपा के विरूध्द जबरदस्त प्रचार करना प्रारंभ किया। उन्होंने अनेक अवसरों पर भाजपा को अवसरवादी नेताओं का जमावड़ा बताया। राजनीतिक भाषा में जितनी गालियां दी जा सकती हैं, उन्होंने भाजपा व उसके नेताओं का जमावड़ा बताया।राजनीतिक भाषा में जितनी गालियां दी जा सकती हैं, उन्होने भाजपा व उसके नेतृत्व को दीं। यहाँ तक कि उन्होंने भाजपा को राष्ट्रहितों को हानि पहुंचाने वाली पार्टी बताया।

भाजपा ने जब आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने का फैसला किया तो उमा भारती ने बार-बार कहा कि वे कभी प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। अब उमा भारती बार-बार यह घोषणा कर रही हैं कि वे आडवाणी को प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचाने का हर संभव प्रयास करेंगी। यदि इस तरह की पलटी कोई साधारण व्यक्ति खाएगा तो उसके बारे में कहा जाएगा कि उसने थूककर चाट लिया हैं समझ में नहीं आता कि उमा भारती के इस शीर्षासन को क्या कहा जाए ?

जितना अवसरवादी फैसला उमा भारती का है, उतना ही अवसरवादी फैसला प्रहलाद पटेल का भी है। उन्होंने भी भारतीय जनता पार्टी पर लगातार हमले किए और भाजपा को घटिया दर्जे की पार्टी बताया था। इस तरह के राजनीतिक नेताओं का शीर्षासन अवसरवादी तो ळै ही वह निंदा के लायक भी है। वहीं उन राजनीतिक पार्टियों के बारे में क्या कहा जाए तो ऐसे लोगों को पुन: अपनी बिरादरी में शामिल कर लेते हैं जिन्होंने उन्हें सार्वजनिक रूप से गालियां दी हों। इसका अर्थ एकदम स्पष्ट है। राजनीति में सिध्दान्तों, आदर्शों, मूल्यों आदि का कुछ भी महत्व नहीं है।

बहुसंख्यक राजनीतिक दल चुनाव लड़ने के प्लेटफार्म हो गए हैं। जो प्लेटफार्म के टिकिट की कीमत चुका दे वह उस प्लेटफार्म का उपयोग चुनाव लड़ने के लिए कर सकता है। इस तरह की स्थिति भयावह है और स्वस्थ प्रजातंत्र के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा है।

एक ओर इस तरह की अवसरवादिता और दूसरी ओर चुनाव के दरम्यान ऐसी भाषा का उपयोग करना जिससे समाज में विषाक्त वातावरण बने और मतदाता धार्म और जाति के नाम पर विभाजित हो जाएं। ऐसी ही हरकत वरूण गांधी ने की है। वरूण गांधी संजय और मेनका गांधी के पुत्र हैं। आपातकाल के दौरान भारतीय जनता पार्टी का तत्कालीन स्वरूप (जनसंघ) संजय गांधी का जबरदस्त आलोचक था। आपातकाल के दौरान जो भी ज्यादतियां हुई थीं, जनसंघ संजय गांधी को उनके लिए उत्तरदायी मानता था। उन्हीं संजय गांधी की पत्नि मेनका गांधी को भाजपा ने स्वीकारा, उन्हें सांसद बनने में मदद की और मंत्रिपरिषद में भी शामिल किया। मेनका गांधी के साथ-साथ उनके पुत्र वरूण्ा गांधी को भी अपने दल में स्थान दिया और दुनिया को यह बताने का प्रयास किया कि यदि कांग्रेस के पास नेहरू-गांधी परिवार है तो उसी परिवार का एक हिस्सा हमारे पास भी है।

वरूण गांधी ने भारतीय जनता पार्टी में अपना दबदबा बढ़ाने के इरादे से उसी भाषा में बोलना प्रारंभ किया जिसमें भाजपा बोलती है। भाजपा की भाषा में अल्पसंख्यकों (मुस्लिमों और ईसाईयों) को देश का दुश्मन बताया जाता है। भाजपा के असली मुखिया राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की यह विचारधारा रही है कि मुसलमान इस देश का नागरिक बनकर रह तो सकते है पर दूसरे दर्जें के नागरिक की हैसियत से। वरूण गांधी के भाषण के अंश जब सार्वजनिक हुए और उसके विरोधा में चारों तरफ से आवाज उठी तो भाजपा ने कहा कि हम उनके विचारों से सहमत नहीं हैं और उन्हें अनुचित मानते हैं। चुनाव आयोग ने भाजपा को सलाह दी है कि वे वरूण गांधी को लोकसभा का उम्मीदवार न बनाए परंतु भाजपा ने साफ कर दिया है कि उसे चुनाव आयोग का यह सुझाव मंजूर नहीं है। भाजपा का यह रवैया विरोधाभासी है। एक ओर आप उनके विचारों को अनुचित बता रहे हैं और दूसरी ओर ऐसी अनुचित बातें कहने वाले व्यक्ति को अपनी पार्टी का उम्मीदवार बना रहे हैं। भाजपा ने कम से कम वरूण गांधी के विचारों को सिध्दांत में गलत बताया है परंतु भाजपा के सहयोगी दल शिवसेना ने वरूण्ा गांधी की पीठ थपथपाई है। ऐसी स्थिति में क्या भाजपा को शिवसेना से अपने संबंधो पर पुर्नविचार नहीं करना चाहिए। वरूण गांधी की ओछी हरकत के संदर्भ में एक और प्रश्न पर विचार आवश्यक है। वह यह की इस तरह की ऊल-जुलूल बातों के विरूध्द कार्यवाही उसी समय होगी जब चुनाव आयोग आपत्ति करेगा। क्या साधारण परिस्थिति में इस तरह की आपत्तिजनक बातें करने की इजाजत दी जा सकती है ? क्या प्रशासन और पुलिस इस तरह की बातें करने वाले व्यक्ति के विरूध्द स्वयं की पहल पर कार्यवाही नहीं कर सकते। हमारे कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि किसी अन्य धार्म के मानने वालों के विरूध्द विष वमन नहीं किया जा सकता। धार्म के नाम पर भड़काऊ बातें करने की मनाही है। इस कानून का सहारा लेकर वरूण गांधी के विरूध्द उसी समय कार्यवाही क्यों नहीं की गई जब उन्होंने अपने जहरीले भाषण दिए थे ? जहां वरूण गांधी भाषण दे रहे होंगे वहां पुलिस अवश्य मौजूद रही होगी। परंतु पुलिस क्यों मूक दर्शक बनी रही ? प्रशासन व पुलिस का इस तरह का दृष्टिकोण साम्प्रदायिक तत्वों के हौसले बढ़ाता है। मेरी राय में चुनाव आयोग और प्रशासन के उच्चाधिकारियों को इस गफलत के लिए स्थानीय अधिकारियों के विरूध्द कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए।

एल.एस.हरदेनिया