संस्करण: 30मार्च-2009

''ट्रान्सफैट का
बढ़ता खतरा''


 

 

 

डॉ. सुनील शर्मा

      कुछ दिनों पूर्व एक गैर सरकारी संगठन ने अपने अधययन में पाया है कि हमारे देश के अधिकांश ब्रांडेड तेल और वनस्पति घी हमारे स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, क्योंकि इनमें ट्रांसफेटी एसिड की मात्रा सुरक्षित स्तर से कई गुना अधिक है, और यह ट्रांस फेट हमारे हृदय पर खतरनाक वार करता है क्योंकि वनस्पति तेलों और घी के जरिये तले पदार्थों को जब हम इस्तेमाल करते हैं तो इन पदार्थों में छिपा ट्रांस फैट हमारे हृदय की धामनियों में जमा होकर रक्त संचार जाम करने लगता है, परिणाम स्वरूप दिल को रक्त की आपूर्ति नहीं हो पाती है और दिल का दौरा पड़ने की घटनाएं होती है।

ट्रांस फेट का हृदय पर कितना बुरा असर पड़ता है, इसकी पुष्टि अभी हाल ही में हावर्ड यूनिवर्सिटी के एक शोधा से भी होती है। हावर्ड यूनिवर्सिटी ने इस संदर्भ में किए गए शोधा में पाया कि अमेरिकी लोगों के भोजन से हाइड्रोजेनेटेड वनस्पति तेल अलग कर लिया जाए तो सालाना करीब 2,28000 लोगों को दिल के दौरे से बचाया जा सकता है, उल्लेखनीय है कि हाइड्रोजेनेटेड वनस्पति तेलों में ट्रांस फेट की मात्रा काफी अधिाक होती है यह तेलों के हाइड्रोजनीकरण क्रिया के दौरान उनमें मिल जाती है, वनस्पति तेल के अंदर जब उच्च तापमान पर हाइड्रोजन गैस को छोड़ा जाता है तो उसमें उत्प्रेरक के रूप में मौजूद निकिल से ये ट्रांसफैट संघनित हो जाते हैं और आहार के साथ मिलकर मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते है। ये ट्रांसफैट हृदय को हितकर कोलेस्ट्राल घटाता है तथा बुरा कोलेस्ट्राल बढ़ाता है, इससे रक्त के थक्के बनने लगते है और मस्तिष्क पर जोर पड़ता है, इससे हृदयघात के साथ-साथ लकवा, मधुमेह और मोटापा जैसी बीमारिया भी बढ़ रही है।

जहां तक हाइड्रोजेनेटेड वनस्पति तेल की बात है तो हमारे देश में इसकी शुरूआत सबसे पहले चालीस के दशक में हिंदुस्तान लीवर कंपनी ने की थी, इसने असली देशी घी जैसा दिखने वाला हाइड्रोजेनेटेड वनस्पति तेल भारतीय बाजार में उतारा था तब इसके खरीददार नहीं मिलते थे सो कई जगह यह कंपनी अपने इस उत्पाद को फ्री बांटती थी, धीरे-धीरे असली घी की कमी और बढ़ती कीमतों की वजह से इसका बाजार बढ़ने लगा और आज यह वनस्पति घी वनस्पति तेलों से भी सस्ता है, तथा असली घी से काफी सस्ता पड़ता है, जिसकी वजह से इसका उपयोग शुध्द घी में मिलावट के लिए भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। वनस्पति घी के अलावा भी ट्रांसफैट का उपयोग बढ़ रहा है अब लगभग हर खाद्य पदार्थ में ट्रांसफैट होता ही हैं।ट्रांसफैट युक्त तेल का इस्तेमाल आइसक्रीम में, कोक में, चाकलेट, बिस्कुट, आलू चिप्स, मक्खन, भटूरा, पिज्जा आदि रोज खाने वाली वस्तुओं में हो रहा है, प्रोसेस फूड इण्डस्ट्री इसका इस्तेमाल कर पदार्थों को अधिक दिन तक टिकाऊ बनाती है, जबकि फास्ट फूड इण्डस्ट्री का आधार ही यही है। इस तरह ट्रांसफैट का खतरा आहार के हर निवाले के साथ बढ़ रहा है।

एक तरफ जब ट्रांसफैट से हमारे स्वास्थ्य पर खतरा बढ़ रहा है दूसरी तरफ देश के ज्यादातर उपभोक्ता ट्रांसफैट के खतरे से अनजान है ऐसी स्थिति में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ट्रांसफैट के बुरे असर से जनता को बचाये तथा उपभोक्ता को जागरूक करे। वास्तव में सरकार को अमेरिका और डेनमार्क की भांति मानक स्तर तय कर उसकी जानकारी उपभोक्ता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी तय करनी चाहिए।

सरकार को हाइड्रोजेनटेड वनस्पति तेलों के उत्पादन पर प्रतिबंधा लगाना चाहिए ताकि खुदरा स्तर पर इसका उपयोग न हो सके। उपभोक्ता गाय के देशी घी का इस्तेमाल कर भी ट्रांसफैट के खतरे से मुक्ति पा सकते है, देशी गाय के धीमें ट्रांसफैट का स्तर काफी कम होता है। उल्लेखनीय है कि जहां विश्व स्वास्थ्य संगठन इसकी अधिकतम मात्रा तीन प्रतिशत को स्वीकृति देता है वहीं भारतीय गाय के घी में इसकी मात्रा मात्र 1.71 प्रतिशत के स्तर पर पाई गई है, इस आधार पर हम कह सकते है कि देशी घी हृदय घात के खतरे को कम करता है। इसके साथ ही हमें अपने स्वास्थ्य के प्रति ज्यादा जवाबदेह बनना होगा अगर हम तय करें कि हम अपने घर में ट्रांसफैट की चीजें नहीं लाएंगे, नहीं खाएगे और न ही फास्ट फूड के लिए ललचाएंगे तो कोई भी जबरदस्ती तो हमें ट्रांसफैट नहीं खिला पाएगा।
डॉ. सुनील शर्मा