संस्करण: 30मार्च-2009

उमा का प्रस्ताव और

आडवाणी का असमंजस
 

वीरेंद्र जैन

मा भारती ने भाजपा और लाल कृष्ण आडवाणी का प्रचार अपने एक बयान से कर दिया है।कभी भाजपा ने उमा भारती की प्रवचन कला, भीड़ को सम्बोधित करने की उनकी क्षमता, मुखरता जिसे देशी भाषा में मुँहफट होना कहा जाता है, दुस्साहस, सन्यासभेष आदि के कारण रामजन्म भूमि अभियान में जोड़ कर अपना राजनीतिक लाभ उठाना चाहा था और अवसर देख कर उन्हें सीधो राजनीति में भी उतार दिया था जिससे बहती गंगा में उनकी और भाजपा दोनों की ही नैया पार लग गयी थी। पर बाद में उनके ये ही गुण भाजपा के लिए आफत भी बने जब उन्होंने अपने भाई स्वामी प्रसाद को जबरदस्ती टिकिट दिलवाया उनके घर रखे हुये बमों में विस्फोट के प्रकरण को दबाया, खजुराहो सीट पर हार की संभावना देखते हुये अपने को भोपाल से उम्मीदवार बनवाया व वरिष्ठ नेता कैलाश जोशी का टिकिट कटवाया, केन्द्र में मंत्री बनने के लिए जिद की, मंत्री बने रहने के दौर में ही अचानक मध्यप्रदेश सरकार के खिलाफ अनशन पर बैठ गयीं व एक झूठा बहाना बना कर अज्ञातवास पर चली गयीं,। अज्ञातवास से वापिस लौट कर वे एशियन एज अखबार के कार्यालय के सामने अनशन पर बैठ गयीं जिसने उनके खिलाफ कुछ ऐसा समाचार छाप दिया था जिसे वे गलत और मानहानि करने वाला बता रही थीं। बाद में वे फिर केन्द्रीय मंत्रिमंडल में सम्मिलित हो गयीं और जब मध्यप्रदेश में दिग्विजयसिंह के सामने चुनाव में नेतृत्व का कठिन प्रश्न सामने आया और भगवाभेषधारी होने के कारण उन्हें मंत्रिमंडल छोड़ कर जाने को कहा गया था तब उन्होंने देर तक ना नुकर करने के बाद अपनी ढेर सारी शर्तें रखीं थीं जिसे जीत के प्रति नाउम्मीद पार्टी ने स्वीकार कर ली थीं। संयोग से वे चुनाव जीत गयीं जिससे उन्हें दिये गये आश्वासन के आधार पर मुख्यमंत्री बनाना पड़ा तब उन्होंने मनमानी करते हुये अपने भाई और खास  लोगों को कई कारपोरेशन्स के पद दे दिये। अंतत: पार्टी को एक बहाने का सहारा लेकर उन्हें पद से हटाना पड़ा व बाद में थक हार कर उन्हें पार्टी से ही निकालना पड़ा।

 

उन्होंने अपनी मुखरता और पद की लोकप्रियता के भ्रम में भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल लिया और ढेर सारे असन्तुष्टों को जोड़ कर समानान्तर भाजपा बनाने की कोशिश की। किंतु नेतृत्व क्षमता के अभाव में उनका गठजोड़ धीरे धीरे बिखरता गया व भाजपा ने उनको उभरने से पहले ही नष्ट कर देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। उनके उम्मीदवारों को लगातार हराया जाता रहा जिसके लिए भाजपा ने अपनी तिजोरी खोल देने में कोई संकोच नहीं किया। उनके निकट से निकट के लोग भी उनकी कार्यप्रणाली से हताश और निराश होते गये व टूटते चले गये जिन्हें लपक लेने में भी भाजपा ने देर नहीं की। मध्यप्रदेश के गत विधानसभा चुनावों में उन्हें भाजपा की सरकार बन जाने की उम्मीद नहीं थी पर उसके बन जाने के बाद वे एकदम से निराश हो गयीं थीं। उनके हालिया बयान ने परोक्ष रूप से लालकृष्ण आडवाणी की चुनावी मदद कर दी है क्यों कि उनके बयान ने उनके स्वयं और उनकी पार्टी के स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व को समाप्त कर दिया है। मध्यप्रदेश में हुये गत विधानसभा चुनाव में उन्हें ग्यारह लाख अस्सी हजार वोट मिले थे जो भाजपा को मिले कुल वोटों की तुलना में सातवां भाग थे। पर जितने वोटों में भाजपा को 139 सीटें मिलीं उस अनुपात से उन्हें बीस सीटें मिलना चाहिये थीं पर उन्हें कुल 5 सीटें मिली थीं जिसमें से भी एक दल बदल कर भाजपा में सम्मिलित हो गया। पर फिर भी यह उम्मीद थी कि मध्यप्रदेश में गैर राष्ट्रीय मान्य दलों में उनकी पार्टी बड़ा दल है व वे संघर्ष जारी रखेंगीं। किंतु वे ऐसा नहीं कर सकीं और उन्होंने भाजपा विरोधी ग्यारह लाख अस्सी हजार मतदाताओं को विश्वास में लिये बिना आत्मसमर्पण करने की पेशकश कर दी। ऐसा करके उन्होंने न केवल इन मतदाताओं की भावनाओं को ही ठेस पहुँचायी है अपितु उनकी निगाह में अपने को नेतृत्व क्षमताहीन प्रचारित करवा लिया है। वे अपने बयानों के माधयम से भाजपा से इतनी दूर जा चुकी थीं कि अब वापिस लौटना संभव नहीं था। पर उन्होंने जिन लचर बहानों से आडवाणी के सामने आत्मसमपर्ण किया उससे उनके समर्थकों ने खुद को ठगा और शर्मिन्दा महसूस किया। कुछ मतदाताओं को तो ऐसा लगा कि जैसे उन्होंने पहले ही भाजपा विरोधी वोटों को काँग्रेस के पक्ष में जाने से भटकाने के लिए ही विधानसभा में अपने उम्मीदवार उतारे थे।


 उमाभारती ने कहा कि वे लालकृष्ण आडवाणी का बड़ा सम्मान करती हैं और उन्हें प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहती हैं इसलिए वे भाजपा का प्रचार करना चाहती हैं जब कि पिछले कुछ वर्षों का न केवल प्रिंट मीडिया अपितु विजुअल मीडिया भी आडवाणी के खिलाफ उनके निम्न स्तरीय बयानों से भरा पड़ा है। यदि वे अब सही हैं तो पहले गलत थीं और अपने समर्थकों को धाोखा दे रहीं थीं। उन्होंने यह नहीं बताया कि अचानक यह इल्हाम उन्हें कब और कैसे हो गया जबकि आडवाणी की उम्मीदवारी तो काफी पहले ही घोषित हो गयी थी।


 उन्हें यदि लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद पर देखना ही पसंद था तो उन्हें उनका प्रचार करने के लिए उनकी अनुमति की क्या जरूरत है जबकि वे भाजपा की सदस्य नहीं हैं और अपनी पार्टी को भाजपा में विलय नहीं किया। कोई भी स्वतंत्र व्यक्ति किसी भी उम्मीदवार का प्रचार कर सकता है।


 उमा भारती की यदि थोड़ी बहुत कोई पहचान है तो वह भाजपा शासित राज्यों में ही है जिसमें से उन्होंने गुरू के आदेश और हिन्दू वोट न बंटने देने के नाम पर उत्तरप्रदेश और गुजरात से अपने उम्मीदवार वापिस कर लिये थे व राजस्थान छत्तीसगढ में आदि में उतारने का साहस भी नहीं दिखाया था। ऐसे में केवल गैर भाजपा शासित राज्यों में चुनाव प्रचार की अनुमति मांगना कितना हास्यास्पद है। इतना ही नहीं वे कल्याण सिंह के लोधी बहुल क्षेत्र में भी अपनी जाति के वोटों के बीच वोट मांगने न जाने की भी घोषणा कर रही हैं।


 अपने बयान में उमाभारती ने यह भी कहा कि यदि प्रधानमंत्री बनने के लिये वे उनका एक वोट बढवाने में भी मदद कर सकीं तो उन्हें खुशी होगी। यह परोक्ष रूप से अपने समर्थकों को धाता बताते हुये केवल अपने लिए टिकिट मांगने का ढंग है।


 उनका बयान यह भी था कि धान के अभाव में उनकी पार्टी लोकसभा के चुनाव में एक भी उम्मीदवार खड़ा नहीं करने जा रही। यह परोक्ष रूप से भाजपा के पास अकूत धान होने की ओर इशारा भी था और चुनाव लड़ने व जीतने में धान की उपयोगिता का खुलासा भी है। अगर वे ईमानदार और पश्चाताप से भरी हुयी होतीं तो यह भी बता सकती थीं कि पिछले आम चुनावों में उन्होंने कितना धान व्यय किया था व उसकी प्राप्ति के साधान क्या थे!


 पार्टी से अलग होने पर उन्होने अरूण जेटली, प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज सुरेश सोनी वैंकया नायडू बाबूलाल गौर, शिवराजसिंह चौहान आदि के खिलाफ बहुत ही नीचे उतर कर आलोचना की थी जबकि वैंकया को तो उनके कारण ही अधयक्ष पद भी छोड़ना पड़ा था। जब पद छोड़ने के लिए उन्होंने सार्वजनिक रूप से पत्नी की बीमारी का बहाना बनाया था तो उमाजी ने पत्र लिख कर और उसे प्रैस तक पहुंचने की व्यवस्था करके उसमें लिखा था कि अपनी पत्नी की रजोनिवृत्ति को उन्होंने राष्ट्रीय बीमारी बना दिया।(सन्दर्भ आउटलुक इन्डिया टुडे आदि) बड़ा मल्हरा उपचुनाव के दौरान तो उन्होंने भाजपा के शिवराज सिंह पर उनकी हत्या कराने के प्रयास का आरोप भी जड़ दिया था। अपने बयान में उन्होंने यह नहीं बताया कि प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री की प्रतीक्षारत मंत्रिपरिषद के इन सदस्यों के बारे में अब उनकी राय क्या है


वरूण गांधी को टिकिट न देने की चुनाव आयोग की जिस नैतिक सलाह को भाजपा के वकीलों ने कानूनी आधार पर ठुकरा दिया है उससे साफ हो रहा है कि उसे अब साम्प्रदायिक धारुवीकरण में ही इकलौता रास्ता दिखायी दे रहा है। संतोष की बात यह है कि उत्तरप्रदेश में भाजपा या भाजपा समर्थक सरकार नहीं है। आडवाणी को उमा भारतीयों की जरूरतें तो तेजी से महसूस हो रही पर पिछले अनुभव को देख कर वे 'उगलत निगलत पीर घनेरी' वाली दशा में हैं। बहर हाल उमाभारती के बचे खुचे समर्थकों तक उनका संदेश पहुँच गया है तथा संभावना यह भी बन गयी है कि उमा भारती से पहले उनके समर्थक भाजपा या किसी अन्य दल में पाये जायें व समर्थनहीन उमा को भाजपा सम्मिलित करने से मना कर दे।

 

वीरेंद्र जैन