संस्करण: 3 मई-2010   

खाद्य सुरक्षा कानून
गरीबों के लिए सौगात
 

सुनील अमर

          केन्द्र सरकार देश में खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने की तैयारी कर रही है। यह उसके चुनावी वायदे के अनुरुप ही होगा। इस बात के लिए केन्द्र की संप्रग सरकार को बधाई दी जानी चाहिए कि उसने ऐतिहासिक और अन्तर्राष्ट्रीय महत्व रखने वाले कई कानूनों का निर्माण कर उन्हें देश में लागू किया। इसमें मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार, तथा विचाराधीन महिला आरक्षण विधेयक आदि शामिल हैं। दुनिया में विकसित और सम्पन्न कहे जाने वाले तमाम देशों में भी उक्त प्रकार के कई कानून नहीं हैं। इस प्रकार विश्व के सबसे बड़े और लोकतांत्रिक देश में नागरिकों के मूलभूत अधिकारों को बरकरार रखते हुए उन्हें उक्त प्रकार के और अधिकारों से लैस करना नि:सन्देह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है।

        खाद्य सुरक्षा कानून से तात्पर्य देश के प्रत्येक नागरिक को हर हाल में दो वक्त का भोजन मुहैया कराना है। यह चाहे खाद्यान्न के रुप में हो या फिर नकद सहायता के रुप में। देश में यद्यपि मँहगाई चरम पर है लेकिन सरकार के गोदाम मानक भंडारण से कई गुना अधिक अनाज से भरे हुए हैं। सरकारी सार्वजनिक वितरण प्रणाली से नागरिकों को रियायती दर पर दिए जा रहे खाद्यान्न में और भी आवश्यक वस्तुऐं शामिल की गई हैं। चर्चित कानून भी चूँकि लागू होने के बाद इसी वितरण प्रणाली पर आश्रित रहेगा इसलिए इस बात की संभावना व्यक्त की जा रही है कि कहीं इस कानून का भी वही हश्र न हो जैसा कि सिस्टम फेल होने से कई अन्य कानूनों का हुआ है।

         वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी इन दिनों इस कानून का मसौदा तैयार करने में जुटे हैं। जैसा कि सभी जानते हैं कि कानून के क्रियान्वयन का विषय राज्य सरकारों का होता है। केन्द्र और राज्यों का तालमेल सही न होने पर अच्छी से अच्छी योजना की क्या गति होती है यह हम मनरेगा के मामले में देख ही रहे हैं। अभी शिक्षा के अधिकार के मामले में ही उत्तर प्रदेश सरकार कह रही है कि उसके लिए अपना अंशदान देना संभव नहीं होगा। केन्द्र की अन्य योजनाओं के बारे में भी राज्य सरकारों का यही रवैया रहता है। उधार देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की क्या स्थिति है इसके बारे में सिर्फ सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी ही पर्याप्त है कि यह भ्रष्टाचार वितरण प्रणाली हो गई है। इस योजना में बने एक तिहाई से अधिक राशन कार्ड फर्जी हैं। मिलावट, घटतौली, कालाबाजारी और ज्यादा दाम लेना इस योजना की पैदाइशी बीमारी हो गई है। ऐसे में इस प्रणाली के सहारे किस तरह से देश के जरुरतमंद नागरिकों को दो वक्त की रोटी निश्चित तौर पर मुहैया करायी जा सकेगी, यह सोचने का विषय है और यदि ऐसा न हो सका तो फिर इस एक्सरसाइज का अर्थ ही क्या होगा?

         जहाँ तक खाद्यान्न का सवाल है, देश के सरकारी गोदाम 'ओवर फ्लडेड' यानी कि भर कर जैसे उफना रहे हैं। इन दिनों सरकार के पास गेहू 200 लाख टन तथा चावल 240 लाख टन है। आकस्मिक सुरक्षा के लिहाज से सरकारी भंडारों में 40 लाख टन गेहँ तथा 125 लाख टन चावल हमेशा रखने का मानक है। गेहूं की नयी फसल बाजार में आने को है।

        इस प्रकार यह भंडारण और भी बढ़ जाएगा तथा हमेशा की तरह अव्यवस्था, प्रकृति के कोप तथा चोरों के भरोसे रहेगा। केन्द्र सरकार अगर खाद्य सुरक्षा योजना के तहत अनाज का वितरण करना चाहे तो उसे कोई दिक्कत नहीं होगी लेकिन मूल प्रश्न वितरण की सफलता और राज्य सरकारों के सहयोग का है।

        दूसरा उपाय नकद सहायता देने का है। नकदी के रुप में सहायता सीधे लाभार्थी के हाथ में पहुँचाई जा सकती है। केन्द्र सरकार, आने वाले दिनों में उर्वरक सब्सिडी भी सीधे किसानों के हाथों में ही देने की योजना बना रही है। अभी यह कार्य सरकारी बैंकों के माध्यम से करने को सोचा जा रहा है जिसके कि सफल हो पाने में सन्देह है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र के बैंकों में स्टाफ कम होने की वजह से उनकी कार्य-प्रणाली बहुत खराब है। केन्द्र सरकार अपनी योजनाओं की पूरी या निर्धारित वित्त-व्यवस्था करती है। ऐसे में राज्य सरकारों को योजना का केन्द्रीय हिस्सा उपलब्ध करा कर नकदी वितरण की जिम्मेदारी उन पर छोड़ देनी चाहिए। होना तो वास्तव में यह चाहिए कि केन्द्र या राज्य सरकारें जितनी भी प्रकार की सहायता या छूट नागरिकों को देना चाहती हैं उन्हें एकीकृत कर सीधे लाभार्थी के हाथ में पहुँचाने की व्यवस्था करें तथा वस्तुओं या उत्पाद को सस्ती दर पर बिकवाने के बजाय खुले बाजार में बिकने दें। सरकारी सहायता के रुप में प्राप्त क्रय-शक्ति से लोग खुद दुकानों से आवश्यकता का सामान खरीद लेंगें। सरकार के पास कर्मचारियों का भारी तंत्र है ही। लेखपाल नामक एक सरकारी कर्मचारी तो गाँवों में ही दिन-रात तैनात रहता है तथा वह अपने क्षेत्र के प्रत्येक निवासी को पहचानता तक है। सरकारी सहायता के बैंक-चेक उसके माध्यम से लाभार्थी के हाथ तक सीधे पहुँचाए जा सकते हैं।

       सरकार द्वारा किसानों को संरक्षण देने तथा आवश्यक भंडारण की खरीद हेतु न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर फसलों के मौसम में अनाज की खरीद की जाती है तत्पश्चात उसी अनाज को खरीद दर के आधे से भी कम दाम पर या कई बार तो लगभग मुफ्त सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा राशन-कार्ड धारकों को बाँटा जाता है। इस प्रक्रिया से ही भ्रष्टाचार पनपता है। सरकारी कर्मचारियों व दलालों का दखल कम करके ही भ्रष्टाचार को कम किया जा सकता है। खाद्य सुरक्षा कानून को प्रभावी करने में एक और समस्या उन लोगों या समूहों की पहचान करना है जो एक निश्चित जगह पर नहीं रहते। इसमें प्राय: असंगठित क्षेत्र के श्रमिक तथा भिखारी आदि आते हैं। नेशनल सैम्पल सर्वे ने कुछ वर्ष पूर्व ऐसे श्रमिकों की संख्या लगभग 37 करोड़ ऑंकी थी। यही वह वर्ग है जिसे सबसे ज्यादा खाद्य सुरक्षा की आवश्यकता है लेकिन इसमें सबसे बड़ी बाधा इनकी पहचान करना तथा एक निश्चित स्थान पर इन्हें खाद्यान्न उपलब्ध करा पाना है। हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर इलेक्ट्रानिक डाटा बेस बनाने की तैयारियाँ चल रही हैं और ऐसा हो जाने पर यह कार्य काफी आसान हो जायेगा लेकिन अभी इसमें समय लगेगा।

        देश में प्रतिवर्ष लगभग 50,000करोड़ रुपये का अनाज प्रकृति के कोप, असुरक्षित भंडारण तथा चोरी आदि के कारण नष्ट हो जाता है। जाहिर है कि इसमें 80प्रतिशत से अधिक हिस्सा सरकारी अनाज का है। इस प्रकार सरकार द्वारा बहुत अधिक मात्रा में अनाज खरीदने का कोई औचित्य प्रतीत नहीं होता। किसानों को संरक्षण भी अन्य प्रकार से दिया जा सकता है। गरीबों की असली समस्या क्रय-शक्ति की है। पैसा होने पर वे मोल-तोल कर अच्छा सामान सस्ते में खरीद सकते हैं। इसलिए यह ज्यादा उचित होगा कि सरकार उन्हें नकद अनुदान उपलब्ध कराये। इससे सरकार के उस धन की बचत होगी जो वह खरीद, भंडारण, परिवहन तथा वितरण आदि पर व्यय करती है। देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली कितनी भ्रष्ट तथा असफल साबित हो चुकी है, यह हम देख ही रहे हैं। यह जानकर किसी भी देशवासी को आश्चर्य हो सकता है कि देश में प्रतिवर्ष सिर्फ केरोसिन यानी मिट्टी के तेल पर सरकार 63,000 करोड़ रुपये से अधिक का अनुदान देती है लेकिन यह मिट्टी का तेल वास्तव में कहाँ चला जाता है, इसे बताने की आवश्यकता नहीं है।

        वास्तव में खाद्य-सुरक्षा सरीखे कानून तभी प्रभावी हो सकते हैं, जब रोजगार की उपलब्धता भी सुनिश्चित करायी जाय। यह मनरेगा जैसी योजनाओं द्वारा ही संभव है। निवास स्थान के निकट रोजगार की सुलभता कई प्रकार के स्थायित्व को पैदा करती है। यह स्थायित्व ही सरकार को कई आवश्यक ऑंकलन,डाटा संग्रह तथा विकास व कल्याणकारी योजनाओं को तैयार करने में मदद करता है। खाद्य-सुरक्षा कानून भी घुमन्तुओं को कुछ स्थायित्व तो प्रदान करेगा ही।

सुनील अमर