संस्करण: 3 मई-2010

खाप पंचायतों का असभ्य फैसला
संविधान को खुली चुनौती है

 

वीरेंद्र जैन

विचारहीन राजनीति में जातिवाद का अभिशाप कहाँ तक ले जा सकता है, इसका ताजा तरीन उदाहरण हरियाणा के कुरुक्षेत्र में पिछले दिनों हुई खाप महापंचायत द्वारा करनाल के सत्र न्यायालय द्वारा दिये गये फैसले को अदालत के बाहर भी चुनौती देने की घोषणा से मिलता है।

हमारे देश में कई स्तर की न्याय व्यवस्था इसलिए तय की गयी है कि अगर कोई न्याय से संतुष्ट नहीं हो तो वह उससे उच्चत्तर अदालत में प्रकरण पर पुनर्विचार के लिए अपील कर सकता है। किंतु उसी पंचायत में जब एक ओर सरकार को इस आधार पर चेतावनी दी जा रही हो कि वह ''1955 के हिन्दू कोड बिल में संशोधन करके एक ही गोत्र में विवाह पर पाबन्दी लगाये'' तब यह भी स्पष्ट होता है कि सम्बन्धित महा पंचायत के पंच यह मान कर चल रहे हैं कि जो भी फैसला हुआ है वह संविधान में दिये गये कानूनों के अनुसार ही हुआ है। किसी भी लोकतांत्रिक देश का कानून वहाँ की संसद अपने सदस्यों के बहुमत के आधार पर ही तय करती है जिसके लिये देश के राजनीतिक दलों को विश्वास में लेना पड़ता है। उक्त पंचायत ने किसी भी राजनीतिक दल तक इसके लिए पहुँच नहीं बनायी और खुले आम सार्वजनिक हिंसा की धमकी के आधार पर सरकार को नृशंश हत्या के अपराधियों को छोड़ देने की सलाह दे रहे हैं। आश्चर्यजनक रूप से इस पर न केवल प्रदेश सरकार अपितु केन्द्र की सरकार भी मौन है जो इन दिनों आपरेशन ग्रीन हंट के नाम पर नक्सली या माओवादियों के नाम से जाने जाने लगे आदिवासियों के खिलाफ वायु सेना के स्तेमाल के बारे में सोच रही है।

खाप महापंचायत का फैसला इक्कीसवीं सदी के इस दौर में सोलहवीं सदी या तालिबानों के देश की याद दिला रहा है और सरेआम की गयी एक हत्या के अपराधियों को छुड़ाने के लिए धमकी दे रहा है। यह सीधा सीधा उन नक्सलवादियों की तरह का फैसला है जो मानते रहे हैं कि राज्यसत्ता का जन्म बन्दूक की नली से होता है। किंतु ऐसा मानने और कहने वालों को भूमिगत रहना पड़ता है और निरंतर लोकतांत्रिक समाज की निन्दा का पात्र होते रह कर कभी भी गोली का शिकार हो जाने के लिए तैयार रहना पड़ता है। इतिहास गवाह है कि ऐसा कहने वालों ने अपने हजारों साथी कुर्बान भी किये हैं। पर खेद है कि वोटों की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों में से किसी ने भी खाप पंचायत की निन्दा तक करने का साहस नहीं जुटाया और तो और उस समय चल रही संसद में भी कोई काम रोको प्रस्ताव भी नहीं लाया।

जाति समाज का सामाजिक नियंत्रण हमारे यहाँ रहा है और जब कोई अपनी जाति समाज के अनुशासन से बाहर जाता था तो समाज उसे जाति से बाहर करने की सजा दे कर उसे समाज से अलग कर देता था। ऐसे लोगों के यहाँ शादी व्याह आदि समारोहों में जाना वर्जित कर दिया जाता था। यह ठीक भी था क्योंकि यदि कोई व्यक्ति किसी संगठन का सदस्य है तो उसे उसके अनुशासन में रहना जरूरी है और जो अनुशासन में नहीं है उसे बाहर ही कर दिया जाना समुचित दँड है। गाँवों कस्बों से नगरों की ओर पलायन ने और परिवारों की एकल परिवार इकाई बनते जाने ने आज पुराने जाति समाज का नियंत्रण कम कर दिया है। कभी जातियाँ काम के आधार पर बनी थीं, किंतु नई आर्थिक व्यवस्थाओं, औद्योगिक विकास, ने नये नये तरह के काम पैदा किये हैं, बहुत सारे लोगों को अपना परम्परागत स्थान, और परिवेश छोड़ कर नई नई जगह बसना पड़ता है, इस कारण से उनका अब पुराने जाति समाज में बँध कर रहना सहज नहीं रह गया है।

दो दशक पूर्व तक तो जाति समाज अपने को सिकोड़ कर समाप्त होने की ओर बढ रहे थे किंतु चुनावी राजनीति में जातिवादी भूमिका के तेज उभार ने जाति समाज को पुनर्जीवित कर दिया ताकि उसका नेतृत्व वोट और टिकिट का सौदा कर सके। इस सौदे में लाखों करोड़ों की डील होने के कारण ही आज संसद में करोड़पति ही पहुँच पाते हैं, आज वहाँ तीन सौ से अधिक करोड़पति बैठते हैं।

ये पंचायतें अपनी जाति पर नियंत्रण बनाये रखने के लिए अपने जाति समाज के शादी ब्याह में दखल तक सीमित हो गयी हैं। इन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि इनके सदस्यों के कितने घरों में शौचालय नहीं हैं, इनके यहाँ कितने निरक्षर हैं, बच्चों को स्कूल सुविधाएं और युवाओं को नौकरी मिलने की दशा कैसी है, महिलाओं की शिक्षा और उनके सशक्तिकरण में क्या प्रगति है, आदि आदि। इस जाति के एक सदस्य और खाप पंचायत के फैसले का समर्थन करने वाले एक व्यक्ति से जब मैंने ये सवाल पूछे तो वे न केवल मौन ही रह गये अपितु उन्होंने स्वीकारा भी कि ये आंकड़े तो हमारे नेताओं के पास भी नहीं होंगे, और यदि किसी के पास हुये भी तो उसे बदलने के लिए इनके द्वारा किये गये किसी प्रयास की जानकारी उन्हें नहीं है। यही इस बात का संकेत है कि जाति पंचायतों का यह पुनर्जीवन केवल राजनीतिक वोट बैंक को भुनाने के लिये गढा जा रहा है। इस महापंचायत में एक सेवा निवृत्त डीजीपी की उपस्तिथि और हत्याओं के अपराधियों को छुड़ाने के लिए उसका समर्थन यही प्रकट करता है । किसी राज्य में कानून की रक्षा के लिए नियुक्त रहा यह व्यक्ति इतना बेवकूफ तो नहीं हो सकता कि जाति पंचायत के कानून विरुध्द फैसले का अन्धा समर्थन कर दे। उसका जानबूझ कर प्रकट किया गया अन्धापन किसी राजनीतिक स्वार्थ की भूमिका का हिस्सा हो सकता है।

सच्चाई यह है कि हत्याओं का फैसला आने के बाद् इस महापंचायत का फैसला और उसकी कार्यवाहियों का खुला ऐलान भारतीय संविधान के खिलाफ सीधा सीधा हमला है। यह वैसा ही कदम है जैसा कि कभी भिन्डरावाले ने उठाया था और श्रीमती इन्दिरा गांधी ने सारे खतरे झेल कर मजबूरन आपरेशन ब्लू स्टार को स्वीकृति दी थी। समझ नहीं आता कि महापंचायत के इस फैसले पर महाश्वेता देवी, अरुन्धाति राय, और मेधा पाटकर की बोलती क्यों बन्द है, आखिर इन्हें तो कोई चुनाव नहीं लड़ना है! ये नई सभ्यता में पैदा हुये ये बच्चे भी उतने ही मासूम हैं जितने कि बस्तर के आदिवासी और उनकी खाप पंचायत के ये हत्यारे उतने ही निर्दयी हैं। करोड़ों अरबों डकार जाने वाले एनजीओ क्यों चुपचाप बैठे हैं और संविधान के ऊपर मडराते इस खतरे के बाबजूद आईपीएल कैसे जारी रह सकता है! यदि कानून को बदलने की जरूरत है तो उस दिशा में बदलने की जरूरत है जहाँ विवाह में शादी करने वालों के अलावा किसी भी दूसरे के अनचाहे हस्तक्षेप को अपराध घोषित किया जाये।


 

वीरेंद्र जैन