संस्करण: 3 मई-2010

मोहम्मद युनूस क्यों दुखी हैं ?
महासूदखोरों को जन्म देती माईक्रो क्रेडिट योजना !

 

 

 

सुभाष गाताड़े

स्वयंसेवी संस्था के तौर पर कभी शुरू हुई मेक्सिको की कोम्पार्टामोस के नाम से धरती के इस हिस्से में बहुत कम लोग वाकीफ होंगे। स्वयं सहायता समूहों (सेल्फ हेल्प ग्रुप्स) के निर्माण या लघु वित्त योजनाओं के संचालन जैसे कामों में कभी यह संस्था भी मुब्तिला थी। मगर आज वह अरबों डालर की कम्पनी है। वर्ष 2007 में इसका नाम अधिक सूर्खियों में आया जब यह बात उजागर हुई कि अपने इन शुरूआती प्रयासों में निहित लाभ की सम्भावनाओं को बहुत पहले पहचान कर उसके द्वारा निर्मित कम्पनी ने स्टॉक मार्केट में निवेशकों के जरिए 458 मिलियन डॉलर इकट्ठा किया।

यूं तो कोम्पार्टामोस के संस्थापकों ने यह वायदा किया कि वह इस पैसे को विकास के क्षेत्र में ही लगाएंगे, मगर पश्चिमी गोलार्ध्द की इस सबसे बड़ी लघु वित्त संस्थान की यह 'कामयाबी' जो इसके द्वारा लिए जानेवाली सूद की दर और उसने बनाए मुनाफे पर टिकी थी, एक तरह से दुनिया भर की वित्तीय संस्थानों एवम बैंकों के लिए एक तरह का संकेत थी कि 'सामाजिक निवेश' कहीं जानेवाली इस योजना में मुनाफे की गंगा बह रही है।

साफ है कि सूद एवम फीस के तौर पर सालाना 82 फीसदी लेनेवाली कोम्पार्टामोस इस मामले में अकेली संस्था नहीं है। मेक्सिको की एक अन्य संस्था टे क्रीमोस तो 125 फीसदी सूद लेती है। जानकारों के मुताबिक मेक्सिको में सूद दर का औसत 70 फीसदी है जबकि वैश्विक औसत लगभग 37 फीसदी है। सूद की भारी दर लेनेवालों में मेक्सिको एवम नाईजेरिया जैसे मुल्क दुनिया भर में 'अव्वल' कहे जा सकते हैं।

साफ है जिस योजना के जरिए गरीबी मिटाने के दावे किये जा रहे थे, उसने जिस तरह पूंजी के बड़े बड़े 'शाक्र्स' को आकृष्ट किया है और मालामाल किया है, यह देख कर प्रोफेसर मोहम्मद युनूस जैसे लोग अन्दर ही अन्दर हिल गए हैं। यह अकारण नहीं कि पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्रसंघ में दुनिया भर से एकत्रित वित्त अधिकारियों के सामने प्रस्तुत अपने व्याख्यान में वर्ष 2006 में अपनी करिश्माई लगनेवाली माईक्रोक्रेडिट योजना के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाजे गए प्रोफेसर युनूस ने अपने दिल के गुबार को लोगों के साथ सांझा किया। उन्होंने साफ कहा कि हम लोगों ने माईक्रोक्रेडिट का निर्माण लोन शाक्र्स अर्थात गिध्दनुमा महाजनों से मुक्ति के लिए किया न कि इसलिए कि हम नए गिध्दनुमा महाजनों को निर्माण करें।

गौरतलब है कि वे तमाम सेलेब्रिटीज् जिन्होंने बड़े शौक से इस योजना के साथ अपना नाम जोड़ा था ताकि एक दिन दुनिया के चेहरे से गरीबी का बदसूरत दाग मिटाया जा सके उनके चेहरे की भृकुटियां भी तनी दिखती हैं। और ऐसे तमाम लोग जो वेबसाइटों के जरिए ही 'गरीबी मिटाने के नाम पर संचालित इस योजना में अपना छोटा छोटा योगदान करते हैं, उनके सामने भी इन कम्पनियों द्वारा बटोरे प्रचण्ड मुनाफे ने नए प्रश्न खड़े किए हैं।

दरअसल इन छोटे छोटे कर्जों के जरिए प्राप्त हो सकनेवाले जबरदस्त मुनाफे से आकर्षित होकर कई बड़े बड़े बैंक और वित्तीय संस्थान इसमें कूद गए हैं, जिनका आज इस क्षेत्र में दबदबा है। यह सुनने में किसी के लिए विचलित करनेवाला लग सकता है कि इनमें से कुछ वित्तीय संस्थान/बैंकों की सूद की दर सालाना सौ फीसदी है।

सूद की ऐसी दरों को लेकर यह बहस भी चल पड़ी है कि किस स्तर तक सूद और मुनाफा स्वीकार्य समझा जाना चाहिए और किसे शोषण कहा जाए ? गौरतलब है कि इस विवाद की तरफ अमेरिकी कांग्रेस की भी निगाह गयी है जिसमें उसकी वित्तीय सेवा कमेटी के सामने बाकायदा इस मुद्दे को रखा गया।

प्रश्न उठता है कि अपने यहां क्या स्थिति है ? दरअसल अपने यहां भी सूद की दर नियंत्रित रखने के बारे में सरकारी स्तर पर पर्याप्त गम्भीरता नहीं दिखती। गनीमत यही समझी जाएगी कि अपने यहां सूद की दूर अभी 80 से 100 फीसदी तक नहीं पहुंची है।

बजट सत्र शुरू होने के पहले ऐसे समाचार मिल रहे थे कि संसद के पटल पर रखे जाने के लिए बन रहे माईक्रोफाइनान्स बिल का मसविदा तैयार करते वक्त सूद की दर नियंत्रित रखने सम्बंधी रिजर्व बैंक आफ इण्डिया की सिफारिशों को नज़रअन्दाज़ किया गया है । (इकोनोमिक टाईम्स, 5 फरवरी 2010 'न्यू माईक्रोफाइनान्स बिल डज अवे विथ लेण्डिंग रेट कैप') मालूम हो कि रिजर्व बैंक ही नहीं खुद वित्त मंत्रालय के अधिकारियों का एक हिस्सा भी इस बात की मांग करता रहा है कि इस योजना के तहत जारी किए जा रहे कर्जे पर सूद की दर को नियंत्रित रखा जाना चाहिए। यह अलग बात है मसविदे में 'नियंत्रण' के बजाय 'सलाह' की बाद की गयी है।

मालूम हो कि देश में लघु वित्ता संस्थानों (माईक्रोफाइनान्स इन्स्टिटयूशन्स) के बढ़ते विस्तार को देखते हुए उनके नियमन एवम निर्देशन के लिए संसद में बिल लाने का मसला लम्बे समय से विचाराधीन रहा है। एक मोटे अनुमान के हिसाब से ही आज की तारीख में लगभग 250 लघु वित्त संस्थान कार्यरत हैं जो 2 करोड़ से अधिक जरूरतमन्दों तक अपनी सेवाएं पहुंचा रहे हैं और बीते वित्त वर्ष में उन्होंने 13,000 करोड़ रूपए के कर्जे दिए थे। बिल पर जब संसद की मुहर लगेगी है तो नेशनल बैंक फार एग्रीकल्चर एण्ड रूरल डेवलपमेण्ट (नाबार्ड) इन लघु वित्तीय संस्थानों की नियामक इकाई बनेगा, तथा यह भी मुमकिन होगा कि ये लघुवित्त संस्थान अपने यहां डिपॉजिटस भी रख सकेंगे, अब तक उन्हें इस बात की इजाजत नहीं थी।

शेष दुनिया के अनुभव को देखते हुए स्पष्ट है कि सूद की दर के नियमन का मसला इतना ज्वलंत क्यों है ? मगर उसके राष्ट्रीय सन्दर्भ भी हैं।

उदाहरण के लिए पिछले दिनों एक वित्तीय कम्पनी के निदेशक ने टीवी पर बताया कि उनकी कम्पनी जल्द ही आवास क्षेत्र को वित्त प्रदान करने का काम हाथ में लेनेवाली है और उनका इरादा है कि पांच लाख रूपए का कर्जा आठ फीसदी सूद की दर पर तथा बीस लाख का कर्जा साडे आठ फीसदी सूद की दर पर उपलब्ध  कराये। यह भी जानी हुई बात है कि अगर आप अपने उद्योग के संचालन के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों से कर्ज लेना चाहें तो करोड़ों रूपए के कर्ज के लिए भी ब्याज की इसी किस्म की दर आम तौर पर लागू होती है।

दूसरी तरफ जहां तक वंचित एवम गरीब तबके के लोगों का सवाल है, माईक्रोफाइनान्स इन्स्टिटयूशन्स की तरफ से इन गरीबों को दिये जाने वाले ऋण की मात्रा भी काफी कम रहती है और वह ज्यादातर उत्पादन के काम के लिए नहीं बल्कि उपभोग के मद में इस्तेमाल होता है तथा इसमें सूद की दर 20 से 40 फीसदी तक रहती है तथा कर्जे की वसूली 98 फीसदी तक देखी गयी है। यह ऐसा तबका रहा है जो हमेशा ही सरकारी बैंकों एवम निजी कार्पोरेट संस्थानों द्वारा संचालित कर्जे की योजनाओं से बाहर रहा हैं। मजबूरन उन्हें निजी साहूकारों के पास जाना पड़ता रहा है। यह अकारण नहीं कि उन्हें ऐसा कर्जा देने के लिए कार्पोरेट अलम्बरदारों से लेकर नीतिनिर्धारकों में भी गजब का उत्साह दिखने लगा है।

वैसे माईक्रोक्रेडिट योजनाओं की ऐसी क्या खासियत कही जा सकती है, जो पारम्पारिक बैंकों से अलग जान पड़ती है।पारम्पारिक बैंक जहां इसी धारणा पर काम करते हैं कि जिसके पास जितना अधिक है, उसे उतना अधिक मिलेगा; लेकिन माईक्रोक्रेडिट इसी धारणा पर काम करता है कि जिसके पास जितना कम होगा उसे उतनी प्राथमिकता मिलेगी। और यह प्राथमिकता समूचे समूह के आधार पर, उसे गारंटीदार बनाकर प्रदान की जाती है। जैसे भारत के सन्दर्भ में कर्जा वितरण को सुगम बनाने के लिए जिन स्वसहायता समूहों का निर्माण होता है, उनमें समूह खुद गारंटीदार बन जाता है।

इस मायने में आंध्र प्रदेश का उदाहरण रेखांकित करनेवाला है। भारत का यह वह सूबा है जहां हजारों की संख्या में स्वसहायता समूहों का निर्माण हुआ है, लेकिन यही वह प्रांत भी है जहां हजारों किसानों ने जिनमें तमाम महिलायें भी शामिल हैं, कर्जे से तंग आकर आत्महत्यायें की हैं। विगत साल इस प्रांत में कुछ इलाके बाढ़ से आप्लावित हुए तो तबाह हो चुके कई गांवों में सबसे पहले पहुंचनेवाले ऐसी स्वसहायता समूहों को कर्जा प्रदान करनेवाले माईक्रोक्रेडिट संस्थाओं के नुमाइन्दे थे, जो ऐसी तमाम महिलाओं से अपनी मासिक किश्त मांग रहे थे, जिनका सबकुछ बाढ़ में तबाह हो चुका था।

मालूम हो कि ऐसी कई संस्थाऐ - जिनका लगभग 1,040 करोड़ रूपया इस काम में लगा है - अपने कर्जे के लिए भारी सूद दर और अपने कर्जे वसूली के लिए अपनाये गये जोरजबरदस्ती के तरीकों के जरिये बेहद बदनाम हो चुकी थीं और उससे बेहद असन्तोष पनप रहा था। यहां तक कि कर्जो की जबरन वसूली के लिए इनके प्रतिनिधियों ने अपनाये तौर तरीकों से कृष्णा, गुण्टूर और प्रकाशम जिले में कई आत्महत्यायें भी हुई थीं। मजबूरन आंध्र सरकार को दबाव बना कर ऐसे स्वसहायता समूहों को कर्जा उपलब्ध कराने वाली लघुवित्तीय संस्थाओं द्वारा लिये जाने वाले सूद की दर घटाने के लिए दखल देनी पड़ी।

अन्त में, इस व्यवसाय में किस कदर लाभ कमाया जा सकता है, यह विशुध्द मानवतावादी कहे जानेवाले संगठनों के अनुभवों से भी स्पष्ट होता है। अटलाण्टा स्थित अमेरिकी मानवतावादी संगठन 'केअर' का अनुभव रेखांकित करनेलायक है। वर्ष 1997 में पेरू में लघुवित्ता संस्थान खड़ा करने में उसने अहम भूमिका अदा की। इसका शुरूआती निवेश 3.5 मिलियन डॉलर्स था जिसमें साड ेचार लाख डॉलर्स करदाताओं का पैसा भी शामिल था। पिछले साल उसने पेरू के इस उद्यम को वहां की सबसे बड़ी बैंकों में से एक बैंको दे क्रेडिटो को 96 मिलियन डॉलर में बेचा जिनमें से 74 मिलियन डालर अकेले 'केअर' को मिला।

सुभाष गाताड़े