संस्करण: 2 सितम्बर-2013

मोदी चलें लंदन

? सुभाष गाताड़े

       बुरी ख़बरें गोया अच्छी ख़बरों का पीछा करती रहती हैं।

              जनाब नरेन्द्र मोदी एवं उनके नए पुराने प्रशंसक इन दिनों यही सोच रहे होंगे। और यह इस सबके बावजूद कि कार्पोरेट मीडिया - एक विश्लेषक की निगाह में - उन पर गोया 'फिदा' है और वह ऐसी किसी भी ख़बर को अधिक रेखांकित ही नहीं करता जो मोदी की प्रोजेक्टेड छवि से मेल नहीं खाती हो।

              अब यही देखिए कि कहां तो शेष हिन्दोस्तां में विकास के गुजरात मॉडल की बल्ले बल्ले हो रही है और उधर गुजरात के किसान इस विज़न को बेपर्द करने पर आमादा हैं। अहमदाबाद से सटे तीन जिलों के किसानों द्वारा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ गुजरात की धरती पर छेड़े एक अनूठे आन्दोलन की ख़बर यही बताती है कि 12साल में यह पहली दफा था कि राज्य सरकार को जनता के प्रचण्ड दबाव के चलते उनकी मांगें माननी पड़ी थीं।

        जानकार बता सकते हैं कि आन्दोलन का यह सिलसिला कुछ माह पहले ही शुरू हुआ था, जब गुजरात सरकार ने ऐलान किया था कि न केवल वह हंसलपुर गांव में विशालकाय मारूति सुजुकी प्लान्ट स्थापित करेगी बल्कि अगल बगल के मंडल बेचाराजी इलाके को स्पेशल इन्वेस्टमेण्ट रिजन के तौर पर विकसित करेगी। प्रस्तुत योजना का असर अहमदाबाद, मेहसाणा और सुरेन्द्रनगर के 44 गांवों पर पड़नेवाला था जिसके अन्तर्गत 50885 हेक्टेर जमीन का अधिग्रहण किया जानेवाला था। कार्पोरेट क्षेत्रा के लिए पलक पांवड़े बिछाने के लिए तैयार 'विकास' की इस योजना पर स्थानीय जनता ने सवाल खड़े किए और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आन्दोलन चलाने का निर्णय लिया था। आन्दोलन का दबाव इतना बना कि 14अगस्त को राज्य के वित्तमंत्री नितिन पटेल को प्रेस सम्मेलन कर बताना पड़ा कि वह बहुचर्चित प्रस्तावित स्पेशल इन्वेस्टमेण्ट रिजन से 36गांवो को निकालने का निर्णय ले रही है। अगर कच्छ के लालन के मैदान में मोदी लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री के भाषण को चुनौती दे रहे थे तो उधर इसी दिन अहमदाबाद से 150 किलोमीटर दालोड में आन्दोलनकारियों द्वारा आयोजित स्वतंत्रता दिवस में जुटे हजारों लोग मोदी के अपने विजन को बेपर्द कर रहे थे।

               उन्हीं दिनों एक और बात को लेकर नए प्रमाण सामने आए जो बात मोदी के बारे में आम हो चली है कि वह जो दावा करते हैं और जो करते हैं इसमें गहरा अन्तराल होता है। उदाहरण के लिए गुजरात परिवर्तन पार्टी द्वारा सूचना के अधिकार के अन्तर्गत मांगी गयी जानकारी से पता चला था कि है कि चुनावों के मद्देनज़र उन्होंने जो वायदे गुजरात की जनता से किए थे, वह सब खालिस पाखण्ड था। याद रहे कि 2012 में प्रदेश के हरेक जिले का मोदी ने दौरा किया था और वहां पर सदभावना के नाम पर एक दिनी उपवास रखा था। ऐसे हर उपवास के अन्त में वह हर जिले के विकास के लिए मोटे पैकेज की घोषणा करते थे। गुजरात के तमाम जिलों के लिए इस तरह उन्होंने लगभग 40,000 करोड़ रूपए के पैकेजों की घोषणा की थी। प्रदेश के सभी 26 जिलों को सूचना के अधिकार के तहत भेजी गयी प्रश्नावली को मिला उत्तर यही उजागर करता है कि किसी को कुछ नहीं मिला। हां,हर जिले में किए गए उपवास पर प्रदेश की जनता के टैक्स से एकत्रित 160करोड रूपया स्वाहा हो गया।  (http://www.hindustantimes.com/India-news/Ahmedabad/RTI-nails-Narendra-Modi-on-pre-poll-promises/Article1-1106260.aspx). और अब ताज़ा समाचार यह मिला है कि वडोदरा स्थित महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय के छात्रासंघ के चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का सुपड़ा साफ हो गया है और जीत प्रमुख विपक्षी पार्टी के छात्रासंघ को मिली है। दस साल बाद परिषद को मिली इस बुरी शिकस्त में मोदी की प्रोजेक्टेड छवि को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है जिन्हें 'यूथ आइकॉन'के तौर पर पूरे वडोदरा में पेश किया गया था। न केवल इस 'यूथ आइकॉन' के नाम से बने पोस्टरों से विश्वविद्यालय के इर्दगिर्द इलाकों को पाट दिया गया था, वही पूरे शहर में एक दर्जन से अधिक बडे होर्डिंग लगाए गए थे जिसमें 'युवाओं की नयी आशा' के प्रतीक के तौर पर मोदी की अलग अलग छवियां चमक रही थीं। स्पष्ट था कि न कि पोस्टर्स और न ही होर्डिंग वडोदरा के युवाओं को प्रभावित कर पाए। वैसे यह पहला मौका नहीं था कि गुजरात के छात्रों-युवाओं ने मोदी ब्राण्ड राजनीति के प्रति अपनी बढ़ती अरूचि का इजहार किया है। कुछ माह पहले ही अहमदाबाद स्थित गुजरात युनिवर्सिटी स्टुडेंट सिनेट के चुनावों में इसी तरह विद्यार्थी परिषद अल्पमत में आयी थी।

                अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब बीजेपी की तरफ से कहा जा रहा था कि जबसे मोदी को चुनाव प्रचार समिति का मुखिया बना दिया गया है तब से देश का युवा भाजपा के साथ जुड़ना चाह रहा है,अब खुद गुजरात के अन्दर के चुनाव - जिसे मोदी की असहिष्णु किस्म की राजनीति का गढ़ कहा जाता है - में अगर छात्र-युवा उन्हें खारिज कर रहे हैं, तो देश के बारे में क्या कहेंगे। वैसे यूथ आइकान की मोदी की छवि से प्रभावित राजदीप सरदेसाई जैसे चैनल के मालिकानों/पत्रकारों को भी अपनी भाषा बदलनी पड़ेगी जिन्हें लगता रहता है कि मोदी युवाओं से नाता जोड़ पा रहे हैं। ( 'Why Modi strikes a chord with youth ..'.)

        अब जहां तक पार्टी की बात है तो वहां पर तो फिलवक्त मोदी को चुनौती देनेवाला कोई नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भाजपा में बढ़ते प्रत्यक्ष हस्तक्षेप एवं छोटी छोटी चीजों का प्रबन्धन अपने हाथ में लेने की नीति का परिणाम है कि मोदी के प्रति असहमति रखनेवाली तमाम आवाजें अब खामोश हैं और उनके प्रति अपने पुराने 'वैरभाव' को भूल कर उनसे मेलमिलाप के लिए तैयार हैं।

               मगर शायद अन्दर ही अन्दर मोदी को वास्तविकता से अवगत कराने का मौका भी वह नहीं चूकते। अब संसद द्वारा हाल में पारित अन्न सुरक्षा बिल को देखें। लोगों को याद होगा कि लोकसभा में भाजपा की नेत्री सुषमा स्वराज्य ने पहले बिल को समर्थन देने का वायदा किया था,फिरकिसी अलसुबह मोदी का एक खत प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचा जिसमें इस बिल का विरोध किया गया था। चारों तरफ यही कयास लगाए गए थे कि अब शायद भाजपा अपना रूख बदलेगी। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ,भाजपा ने संसद के पटल पर बिल का समर्थन दिया। इस पूरे प्रसंग पर प्रतिक्रिया देते हुए जनता दल (यू)के नेता अली अन्वर ने कहा कि 'इस बिल के पारित होने में सबसे अधिक शिकस्त मोदी को मिली है।' ("In the passing of this bill, the biggest loser has been Narendra Modi.")

        अयोध्या में 'परिक्रमा' का मसला भी जिस तरह टांय टांय फिस्स हुआ और समाजवादी पार्टी एवं विश्व हिन्दू परिषद पर 'मैच फिक्सिंग' के आरोप लगे, उसने भी कुल मिला कर मोदी की विजय की रणनीति में नया फच्चर डाल दिया है। राज्य की राजनीति में अयोध्या के बहाने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नयी कोशिश करने के उनके मंसूबे भी फिलवक्त कामयाब होते नहीं दिखते। यहभी कहा जा रहा है कि अगर समाजवादी पार्टी ने पाबन्दी नहीं लगायी होती तो विश्व हिन्दू परिषद एवं संघ परिवारी संगठनों की और भद्द पीटती। याद करे कि चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख नियुक्त किए जाने पर मोदी ने अयोध्या की यात्रा नहीं करने का निर्णय क्योंकि वह अपनी 'विकास'वाली छवि पर जोर देना चाह रहे थे,मगर जब उनकी सलाह पर अमित शाह -वही शख्स जो मोदी के विश्वासपात्र हैं एवं सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ काण्ड में कुछ माह जेल में बीता आए हैं और इन दिनों जमानत पर चल रहे हैं - को यूपी का प्रभारी बनाया गया तो उन्होंने सबसे पहले अयोध्या की यात्रा की एवं मंदिर निर्माण का संकल्प दोहराया।

               जनाब मोदी की प्रस्तावित लन्दन यात्रा को ही लें, जब ब्रिटिश सांसद बैरी गार्डिनर ने उन्हें हाउस आफ कामन्स की बैठक को सम्बोधित करने के लिए आने का न्यौता दिया और इस तरह 2002 के दंगों में उनकी भूमिका को लेकर पश्चिमी जगत में जारी अलगाव के खतम होने का संकेत दिया, तो निश्चित ही वह मुदित थे। मगर अब ख़बर यह भी आयी है कि एक दूसरे ब्रिटिश सांसद ने इस निमंत्रण के खिलाफ विरोध दर्ज करते हुए कहा है कि मोदी को तगड़े विरोध** (hot reception) का सामना करना पड़ेगा। रिस्पेक्ट पार्टी से जुड़े सांसद जार्ज गैलोवे - जो एशियाई बहुल इलाकों से जीतते आए हैं - वे अफगाणिस्तान एवं इराक पर अमेरिकी हमले की लगातार मुखालिफत करते रहे हैं और फिलीस्तीन के भी समर्थक माने जाते हैं। सीएनएन-आईबीएन को दिए अपने साक्षात्कार में उन्होंने कहा है कि ''जनाब मोदी को चाहिए कि वह अतिरिक्त जैकेट लेकर आएं क्योंकि मुझे लगता है कि अंडे एवं टमाटर खूब बरसेंगे।** ("Mr Modi, better come prepared with a spare jacket because I suppose the eggs and tomatoes will be flying,")

        वैसे चूंकि मोदी जानेवाले हैं तो उन्हें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन के एक अन्य सदस्य शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल के ताजा फैसले पर भी गौर करना चाहिए, जो खुद लम्बे समय से कनाडा जाने की योजना बना रहे थे। सितम्बर के दूसरे सप्ताह में शुरू होने वाली यह यात्रा उन्होंने अचानक रद्द कर दी। (देखें, 'बादल कैन्सल्स कनाडा ट्रिप फोर फिअर आफ लिटीगेशन' 23 अगस्त 2013, टाईम्स आफ इंडिया) दरअसल 'सुखबीर एवं पंजाब के पुलिस प्रमुख सुमेधा सिंह सैनी को ''युध्द अपराधों एवं मानवता के खिलाफ अपराध''के लिए जिम्मेदार बताते हुए अमेरिकी सिख समूहों ने कनाडा स्थित एनजीओ 'कनाडियन सिख कोएलिशन'की तरफ से कनाडा की अदालत में मुकदमा दायर करने का सिलसिला शुरू किया था'। इस प्रस्तावित मुकदमे के मद्देनज़र खुद कनाडा की सरकार ने भी 'किसी सिविल मुकदमे में किसी तरह की इम्युनिटी प्रदान करने से इन्कार किया था'इतनाही नहीं उसने उन्हें सुरक्षा प्रदान करने से भी इन्कार किया था। अन्तत: विदेश मंत्रालय की सलाह का हवाला देते हुए कि इस यात्रा से उनके लिए असुविधाजनक स्थिति पैदा हो सकती है, उन्होंने यात्रा रद्द कर दी।

                सुनने में यह भी आया है कि मोदी की प्रस्तावित लन्दन यात्रा को लेकर मानवाधिकार संगठनों की तरफ चिले के पूर्व तानाशाह पिनोशे की लन्दन यात्रा के पुराने पड़ चुके प्रसंग पर भी निगाह डाली जा रही है। याद रहे कि चिले की लन्दन यात्रा के वक्त स्पेन के जज बालतासार गारजन ने पिनोशे की गिरफ्तारी का वारण्ट इस आधार पर निकाला था कि 1973 में चिले में सीआईए के समर्थन एवं सहयोग से हुई बगावत में - जिसमें प्रगतिशील साल्वाडोर एलेन्दे का तख्ता पलटा गया था और हजारों लोगों को मारा गया था - मारे गए लोगों में स्पेन के तमाम नागरिक भी शामिल थे। जब पिनोशे ने ब्रिटेन की अदालत में याचिका दायर की तब न्यायमूर्तियों ने यही कहा कि कुछ अपराध ऐसे होते हैं जिसके लिए राजनयिक सुरक्षा/इम्युनिटी प्रदान नहीं की जा सकती। पिनोशे को लन्दन में डेढ साल से अधिक वक्त लगभग गिरतारी में बीताना पड़ा था और उन्हें स्वास्थ्य आधार पर अपने मुल्क जाने की अनुमति दिलाने में ब्रिटेन सरकार को भी नाक से चने चबाने पड़े थे।

               आजाद हिन्दोस्तां के इतिहास में एक काले धाब्बे के तौर पर शुमार किए गए 2002 के दुखद अधयाय पर एवं तत्कालीन सत्ताधारियों की संलिप्तता/अकर्मण्यता को लेकर राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की तरफ से 50से अधिक रिपोटरं आ चुकी हैं। तय बात है कि मानवाधिकारों की सार्वभौमिक मौजूदगी (universal jurisdiction) के सिध्दान्त का हवाला देते हुए कोई अगर लन्दन या अमेरिका के न्यायालय में जाए तो हो सकता है कि वज़ीरे आज़म बनने के लिए मुन्तज़िर 'हिन्दू हृदय सम्राट' नयी मुश्किलों में फंस सकते हैं।          

? सुभाष गाताड़े