संस्करण: 2 सितम्बर-2013

हरा-भूरा शाल ओढे ये बुजुर्ग हमारे

? डॉ. देवप्रकाश खन्ना

        रा-भूरा शाल ओढ़े ये अनेक बडे पेड़ हमारे वृध्द वरिष्ठ नागरिकों की भाँति ही हमारे सब के आदर व सम्मान के पात्र हैं। धरती के इन जीवन्त वरिष्ठों ने अपनी और हमारी अनेक जड़ व चेतन पीढ़ियों को बढ़ते व फलते-फूलते देखा है, उन्हें पाला व पोसा है । ज्योंहि हम इन बूढ़े वरिष्ठो-पेड़ों के नीचे मानों उनकी शरण में जाते हैं तो हमें ये पेड़ ठण्डक का एहसास कराके बताते हैं कि हम युवा और जीवन्त हैं । यह भी अजीब अनुभव होता है कि पेड़ जितना अधिक वृध्द होता है, उसके नीचे जाकर अपने आप को हम उतना ही अधिक युवा अनुभव करते हैं ।

               इन बूढ़े बुजुर्ग पेड़ों की अपनी महत्ता है । आते-जाते थके विश्रान्त पथिक तो इनके नीचे आराम करते ही हैं, उड़ते चहकते पक्षी भी इन पर दिन या रात में कभी भी आश्रय लेकर अपनी जीवन यात्रा को आगे बढ़ाते हैं । गाँव के बड़े-बूढे पेड़ों की छाँव में स्कूल के अधयापक गाँव के बच्चों को ककहरा और गणित सिखाते व पहाड़े रटाते हैं । युगों'-युगों से ये वॄक्ष हमारे विद्या अर्जन के केन्द्र स्थान रहे हैं। बाहर से आते-जाते व्यापारी गण तो थकने हारने पर इनके नीचे लेटकर आराम करते ही हैं । कुछ व्यापारीगण तो ग्रामों व बस्तियों के पास के इन वृक्षों के नीचे कपड़ा बिछाकर, अपने विक्रय योग्य समान को उस पर प्रदर्शित कर बेचने का उपक्रम भी करते है। इन पेड़ों पर प्राय: गिलहरियों, चमगादड़ों, तोतों, कबूतरों व गुबरैलों का रैन बसेरा होता है।

               भगवान की सृष्टि के अति प्राचीन साक्षी ये पेड़ बड़ी लम्बी आयु के धनी होते हैं । इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मुख्य प्राँगण में अपनी लम्बी बाहें पसारे खड़ा पुराना बरगद का पेड़ अपनी जीवन की दो से अधिक शताब्दियाँ तो गुजार ही चुका है। सन 1888 में स्थापित इस विद्यालय की स्थापना के समय भी अपनी अनेक शाखाओं और तनों के साथ यह महान वृक्ष वहीं खड़ा सब कुछ निहार रहा था। विश्वविद्यालय के प्रतीक चिन्ह में इसका चित्र बना है व साथ ही यूनानी भाषा में उसमें लिखा है फनंज त्ंउप ज्वज । तइवतमे - अर्थात ''जितनी शाखाएँ उतने पेड़'' । दशकों के बाद भी इसे देखने पर इस वृक्ष के शालीन वृध्दत्व के प्रति सम्मान का भाव एकाएक जाग्रत होता है।

         समय व वर्षों के बीतने के साथ, इन बड़े बूढ़े वृक्षों का आकार जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे इनके आस-पास के गाँव बढ़ते हुए कस्बे में, व कस्बे नगर बनते जाते हैं। धीरे-धीरे इन वृक्षों का अन्त भी पास आने लगता है। बरगद जैसे पेड़ तो अपनी धरती की ओर लटकती, लम्बी झूलती शाखाओं से काफी बड़ा स्थान घेरते जाते हैं। आजकल के विकसित बडे होते कस्बों व नगरों में स्थान का अभाव खटखने लगा है। आज का मानव इन बूढ़े पेड़ों को कटवाकर उनसे प्राप्त लकड़ी के फर्नीचर बनवाने में रूचि लेने लगा है । पेड़ों से रिक्त हुए स्थान पर काँक्रीट के उत्तुॅग गगन चुम्बी भवन बनते जा रहे हैं ।

                चलते-चलते थकने वाले पाथिक को यदि आसपास कोई बड़ा बरगद या पीपल, नीम का वृक्ष आराम करने को नहीं मिलता, तो फिर आराम करने के लिए उसे आसपास किसी फूल या फलवाले वृक्षों के बगीचे में आराम करने का सुख पाने की तलाश में जुटना पड़ता है । ऐसी स्थिति में यह भी सामान्यत: अनुभव किया गया है कि आम जैसे फलों के बगीचे में पाथिक को आराम नहीं मिलता । वहाँ धमा'-चौकड़ी मचाने वाले तोते, कौए बन्दर आदि अपनी शैतानियों से बगीचे के वातावरण की शान्ति भंग किये रहते हैं। पार्कों में अपना सिर झुकाए, गम्भीरता से ऊँचे खड़े ये बड़े-बूढ़े पेड़ अपनी गहरी हरियाली छवि से वहाँ आये या गुजरने वाले पाथिक वृन्दों को बड़ा आनन्दित करते हैं। ये सभी पेड़ स्वभाव से खूब मिलनसार होते हैं व आसपास अपने साथियों के साथ हवा में आनन्द से झूमते रहकर जीने व औरों को जीने देने में गर्व महसूस करते हैं। देवदार के घने जंगल, जो पहाड़ों पर ज्यादातर पाये जाते हैं, बहुत ही रोमांचक सा अनुभव प्रदान करते हैं । एक के बाद उन्हें आसमान में ऊँचे से ऊँचे उठते देखना एक अजीब सी फौजी चुस्ती का आभास देता है। वैसे तो ये पेड़ सृष्टि में मानव से पहले आये बताये जाते हैं पर ये बुजुर्गवार पेड़ संसार में यत्र तत्र पाये जाते हैं । कहते हैं कि दुनियाँ के सबसे पुराने बुर्जुगवार पेड़ अमरीका के केलीफोर्निया प्रदेश में पाये जाते हैं । ऐसी मान्यता है कि वहाँ चीड़ जाति के वृक्ष पाँच-पाँच हजार सालों तक का लम्बा जीवन जीते हैं। हमारे भारत में उत्तराँचल प्रदेश में बड़े-बड़े वुजुर्गवार वृक्ष

पाये जाते हैं । कहा जाता है कि जोशीमठ का एक वृक्ष जिसे स्थानीय लोग कल्पवृक्ष के नाम से पुकारते हैं वह वृक्ष है जिसके नीचे बैठकर शंकराचार्य जी ने नवीं शताब्दी में धयान लगाया था । भगवान गौतम बुध्द ने गया (बिहार) के बरगद वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या की थी व ज्ञान प्राप्त किया था। गर्मियों के मौसम में हमारे देश के लोग अक्सर पीपल के बड़े वृक्ष के नीचे बैठ व लेट कर आराम करते देखे जा सकते हैं ।

               पीपल का वृक्ष : हमारी भारतीय संस्कृति का एक अतिप्राचीन व पावन प्रतीक है। भगवत गीता के ग्यारहवें अधयाय में भगवान श्री कृष्ण ने अपने विराटरूप का वर्णन करते हुए स्वयं को वृक्षों में पीपल वृक्ष होने की बात कही है । कोई भी हिन्दू पीपल के वृक्ष को काटने या उखाड़ने का दुस्साहस नहीं कर सकता । अपने घर के बुजुर्गो की तरह, अपने समाज के इन बुजुर्ग पेड़ों को काटने व नष्ट करने की हिमाकत को सख्ती से रोका जाना चाहिए। अपने सारे जीवन में ये वृक्ष हमारी कार्बन को हमसे लेकर व हमें भरपूर ऑक्सीजन का भण्डार देकर हमें नौजवान बनाये रखने वाले इन बुजुर्गो को हमें सुरक्षित ही नहीं रखना चाहिए, बल्कि यथाशक्ति नये वृक्ष रोपित कर उन्हें आगे बढ़ते रहने देना चाहिए, ताकि हमारे व हमारी सन्तति के लिए सुख-शान्ति पर इन की छाया पड़ती रहे और अपनी बढ़ती आयु के बावजूद हम अपने आप को युवा महसूस करते रहें । एक दिन यह समाचार जानकार बड़ी प्रसन्नता हुई कि बिहार के मधुवनी जिले के कुछ कलाकारों का एक दल वहाँ के बूढ़े पेड़ों को बचाने के लिए उन पर मधुबनी शैली में देवी-देवताओं के चित्र बनाने का अभियान चलाए हुए हैं । इन कलाकारों का विश्वास है कि पेड़ों पर ईश्वर के चित्र बना देने से लोग उन्हें काटने से रूकेगें । पेड़ों पर बनाई गई इन पेण्टिंग में प्रयोग किये जा रहे रंग तीन चार सालों तक टिकाऊ होना बताए जाते हैं। इन रंगों में चूना, गोंद भी मिलाया जाता है । पेड़ों के तनों पर दुर्गा, सीता, राम, लक्ष्मण, श्रीकृष्ण, हनुमान जैसे अनेक देवी-देवताओं के चित्र बनाते समय कलाकार स्त्री व पुरूष लोक गायन करते हुए भगवद्भजन भी करते देखे जाते हैं ।

               वृक्षों के परोपकारी स्वभाव से प्रभावित होकर ही तो कबीरदार जी ने कहा था -

               सरवर तरवर सन्तजन, चौथा बरसे मेह। परमारथ के कारने, चारों धारी देह ॥

              अर्थात् वृक्ष, तलाब, साधु और बादल ये चारों परमार्थ के लिए ही शरीर धारण करते है।     

                
? डॉ. देवप्रकाश खन्ना