संस्करण: 02मार्च-2009

टीना फैक्टर यानि
देयर इज नो अल्टरनेटिव

डॉ. सुनील शर्मा

भी एक खबर आई थी कि लोकसभा अधयक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी ने वर्तमान लोकसभा के सदस्यो के लिए कामना की है कि आप सभी हार जाए और जीत कर दोबारा संसद में न आयें,वास्तव में लोकसभा अधयक्ष का यह श्राप सांसदो के उस आचरण और व्यवहार से उपजी पीड़ा है जो उन्होने निकट से देखा और महसूस किया।
वास्तव में इस लोकसभा के अनेक सदस्यों के कारनामो से हम सभी को बड़ी शर्मिंदगी और ग्लानि महसूस हुई है।चालू लोकसभा के कई सांसद रिश्वत लेकर प्रश्न लगाते पकड़े गए, बीजेपी के एक सांसद कटारिया कबूतरबाजी में पकड़े गए, अनेक सांसदो पर सांसद निधा में कमीशन खोरी के आरोप लगे।लोकसभा के सत्रों में उपस्थित न रहने की प्रवृति भी सांसदो में बढ़ती जा रही है जिससे कोरम के अभाव में कई बार बैठक स्थगित करनी पडती है जिससे देश का धान और समय बर्बाद होता है,पिछले शुक्रवार 545 सांसदो के सदन मे सिर्फ 40 सदस्य मौजूद थे जिससे लोकसभा की बैठक स्थगित करना पड़ी ।वास्तव में ऐसे दागी और गैर जिम्मेदार जनप्रतिनिधी न देश का हित कर सकते हैं और न ही जनता का। ऐसी स्थिति में जरूरत इस बात की है कि हम अच्छे जनप्रतिनिधी का चुनाव करें ,लेकिन प्रश्न यह है यह अच्छा जनप्रतिनिधी आएगा कहाँ से? क्योंकि जिन व्यक्तियों को राजनीतिक दल टिकिट देगेंमतदाता को उन्हीं मे से किसी एक का चयन करना है।अगर चुना हुआ प्रत्याशी योग्य और कर्मठ है तो ठीक अन्यथा उसे झेलना तो पड़ेगा।
कुछ बर्ष पूर्व तक अधिाकांश राजनीतिक दल प्रत्याशी चयन के मामले में कुछ मापदण्ड रखते जिससे योग्य और कर्मठ व्यक्लि ही जनप्रतिनिधी बन पाते थे,परंतु अब स्थिति मे काफी गिरावट आई है आज स्थिति यह है कि जाके संग दस बीस ताको नाम महंत आज धानबल और बाहुबल के आधार पर भारी व्यक्ति को टिकिट देकर राजनीतिक दल अपनी जीत सुनिश्चित करना चाहते हैं। राजनीतिक दलों के नेता और कार्यकर्ता चुनाव के लिए पार्टी का प्रत्याशी बनने की आशा संजोए रहते है,लेकिन प्रत्याशियों के नाम सामने आते ही उनकी आशा पर तुषारपात सा हो जाता है।कभी-कभी अनजाना सा चेहरा थोप दिया जाता है। कार्यकर्ता मायूस और क्रुध्द होकर विरोधा करते हैं,टिकिट वितरण की चर्चाओं के साथ प्रत्याशियों द्वारा टिकिट खरीदने की चर्चायें आम जन के बीच चलती है एवं बड़े नेताओं पर टिकिट बांटने में रिश्वत लेने के आरोप लगाये जाते है। चुनाव के बाद सारी चर्चाओं पर विराम लग जाता है।परन्तु प्रश्न यह है कि जब विभिन्न पार्टियों द्वारा घोषित अनेक प्रत्याशी जनता की आकांक्षा के अनुरूप नहीं हैं, ऐसी स्थिति में जनता क्या करे? या तो अपने ऊपर थोपे हुए प्रत्याशी के विरोधा में अपना प्रत्याशी खड़ा करे या फिर कम खराब प्रत्याशी को अपना प्रतिनिधी मान ले,परन्तु यह समझोता भी गलत है।इससे अच्छा तो थोपे गए एवं अयोग्य प्रत्याशियों को नकार दिया जाए परन्तु यह विकल्प अभी तक हमारे पास नहीं है, आज जब प्रत्याशियों को थोपने की परंपरा चल पड़ी है एवं अयोग्य प्रत्याशी हमारे जनप्रतिनिधी बन रहे हैं ऐंसी स्थिति में ऐंसे सारे  मुद्धो पर विचार आवश्यक है जिससे जनता को अपना योग्य और कर्मठ प्रतिनिधी मिल सके। इसके लिए राजनीतिक दलों के स्थापित एवं बड़े-बड़े नेताओ में नैतिकता की बात के साथ-साथ इसके कानूनी प्रावधाानों पर भी चर्चा होनी चाहिए।
इस संदर्भ आज टीना फैक्टर पर विमर्श सामयिक होगा,उल्लेखनीय है कि पिछले दशक में यह टीना फैक्टर काफी चर्चा में था जिसका पूर्ण स्वरूप देयर इज नो अल्टरनेटिव होता है। इसके अनुसार चुनाव के मतपत्र में प्रत्याशियों के नाम के अलावा एक खंड खाली रहना चाहिए,जिससे अगर किसी मतदाता को मतपत्र में उल्लेखित प्रत्याशियों में से किसी को वोट नहीं देना है तो वह इस खाली खंड पर मुहर लगा सकता हैं। अगर खाली खंड पर मुहर लगाने वालों की संख्या कुल मतदान की 50 फीसदी से अधिक है तो उन समस्त प्रत्याशियों का चुनाव निरस्त कर उनके स्थान पर अन्य नए प्रत्याशियों का नामांकन कर चुनाव प्रक्रिया पुन: दोहराई जानी चाहिए। वास्तव में इस प्रक्रिया से राजनीतिक दल ईमानदार और जन हितैषी छवि युक्त व्यक्तियों को ही अपना प्रत्याशी बनाने मजबूर होंगे क्योंकि उनके प्रत्याशी की अस्वीकृति उनकी पार्टी की अस्वीकृति होगी।इस संदर्भ में एक गैरसरकारी संगठन पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज ;पीयूसीएलध्द ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है तथा केन्द्र को यह निर्देश देने की मांग की है कि यदि कोई मतदाता वोटिंग मशीन मैं 'इनमें से कोई नही के' विकल्प को चिन्हित करना चाहे तो इसकी व्यवस्था की जाये,वास्तव में पीयूसीएल जैसा प्रयास देश के अन्य जन संगठनो, नागरिकों एवं बुद्विजीवियों को करना चाहिए।
इसके अलावा पार्टियों द्वारा प्रत्याशियो के चयन के संदर्भ में आम राय बनाने की प्रक्रिया भी विस्तृत की जानी चाहिए। चुनाव होने के पूर्व पार्टियां अपने संभावित प्रत्याशियों की स्वीकार्यता का आंकलन छद्म मतदान के जरिए भी कर सकती हैं। आज हमें अगर लोकतंत्र को बचाना है तो आम जनता के प्रतिनिधियों की सदन में उपस्थिति होना जरूरी है क्योंकि जैसा कि सुनने में आ रहा है कि प्रत्याशी टिकिट खरीद रहे हैं, ऐसे प्रत्याशी लोकतंत्र के पहरेदार कैसे हो सकते हैं। वो देश की व्यवस्था, पर्यावरण और मिट्टी के रक्षक भी नहीं हो सकते हैं वो इन सभी में कमाई का जरिया ढूंढेगे और जनता की समस्याओं पर सिर्फ अट्टाहास करेंगे।


डॉ. सुनील शर्मा