संस्करण: 02मार्च-2009

लंका में आतंक की पराजय
क्या कुछ और लोग
इस से सबक लेंगे
 

भवानी शंकर

वैसे तो किसी की हार का जशन मानना कोई अच्छी बात नहीं है किंतु श्रीलंका में तमिल उग्रवादियों की पराजय के पश्चात एक बात पर संतोष व्यक्त किया जा सकता है. इसके बाद वहां पर हिंसा का दौर नहीं चलेगा. तमिल उग्रवाद के इस परिणाम ने एक बात फिर से सिध्द कर दी है. राजनैतिक मुद्दों का निपटारा हिंसा के माधयम से सम्भव नहीं है और यदि हिंसा का मार्ग अपनाया जाता है तो फिर वही पक्ष विजयी होता है जिस की सेना बड़ी होती है. श्री लंका के तमिल उग्रवादी प्रभाकरन के नेतृत्व में पिछले लगभग तीस वर्षों से वहां पर एक खूनी संघर्ष में जुटे हुए थे और इस में अब तक 70,000 से अधिाक लोग मारे गया तथा भारत के पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गाँधी की भी हत्या की गई. प्रभाकरन के इशारे पर ही हत्या हुई थी क्योंकि उनको यह भय था के के यदि 1991 के चुनावों के पश्चात् राजीव गाँधी फिर से सत्ता में आ गए तो वे तमिल उग्रवादियों के खिलाफ एक कदा रुख अपना लेंगे और फिर तमिल अलगाववादी आंदोलन पीछे रह जाएगा. तमिल उग्रवाद के चलते श्री लंका में 6 राष्ट्रपति बदल गए किंतु प्रभाकरन डटे रहे. सम्भव है के इसी कामयाबी ने उन्हें इस बात के प्रति आश्वस्त कर दिया था के वो अपराजेय हैं. किंतु जब से श्री लंका के वर्तमान राष्ट्रपति महिंदा राजपक्से सत्ता में आए हैं तब से उन्होंने आतकंवाद के विरुध्द चलनेवाले युध्द की परिभाषा ही बदल दी है और उसे एक निर्णायक दौर में पहुँचा दिया है तथा यह साबित कर दिया के सेना के लगातार हमलों के आगे कोई भी छापामार कारवाई नहीं टिक सकती है.
यह बात जग जाहिर है की तमिल उग्रवादियों ने अपना सिक्का जमा लिया था. उनके द्वारा पैदा किया खौफ काफी गंभीर था. सबसे ज्यादा खतरा उसके आत्मघातक दस्तों का बन गया था जो की किसी भी स्थान पर पहुँच कर हिंसक वारदातें और हत्याएं कर देते थे. यह बात भी अपनी जगह मायने रखती है के उनके लिए भारत के तमिलनाडु में समर्थन और सहानुभूति का वातावरण अभी भी है. इसी लिए इस पूरे अभियान के दौरान भारत सरकार ने यह पक्ष रखा के तमिल नागरिकों की सुरक्षा का पूरा धयान रखा जाना चाहिए. श्री लंका सरकार के बार बार इस बात का एहसास दिलाया गया के उग्रवादियों और सेना के बीच चल रहे संघर्ष में नागरिकों की सुरक्षा का धयान रखा जाए. दक्षिण एशिया में चल रहे सभी संघर्षों का मूल ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अंत के साथ जुडा हुआ है. उसकी विदाई ने इस पूरा इलाके में कुछ अन सुलझे प्रश्न अपनी विरासत में यहाँ की अवाम को दिए हैं. और इन्ही प्रश्नों का हल निकलने में यहाँ के नेता बुरी तरह विफल हुए हैं. आपसी समझ भूझ की कमी रही है और इसने एक व्यापक हिंसा और असुरक्षा का वातावरण इस पूरे इलाके को प्रदान किया है.
सच तो यह कि श्री लंका के तमिल समुदाय और वहां के सिंहाला लोगों के बीच ऐसा कोई प्रश्न नही है जो की आपसी बात चीत से न सुलझाया जा सके किंतु जैसे के भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर मसले को लेकर हुआ है इस रास्ते पर चलने की समझदारी दोनों पक्षों द्वारा कभी भी दर्शायी नहीं गई है. ऐसी स्थिती में दोष किसका का अधिाक है इस प्रश्न का उत्तार ढूँढना बेमायने हो जाता है क्योंकि नुकसान दोनों का बराबर ही होता है. ऐसा नहीं है कि तमिल उग्रवादी यदि हार गए हैं तो इस सारी प्रक्रिया में शेष श्री लंका का कोई बहुत बड़ा लाभ हुआ है. वास्तव में इस खूनी संघर्ष ने पूरे देश को ही बहुत नुकसान पहुँचाया है. दोनों पक्ष यह भली-भांति जानते हैं के अलग तमिल देश का निर्माण सम्भव नहीं है और दोनों को एक साथ रहने के अलावा कोई औ चारा भी नहीं है. फिर भी इस विवाद का शान्ति पूर्ण हल निकालने के बजाय एक हिंसक संघर्ष में अपनी सारी उर्जा का व्यय किया है. उग्रवादियों कि इस पराजय के पश्चात् भी इस समस्या का समाधाान नहीं होगा। यदि श्री लंका सरकार अब भी तमिल लोगों के मन नहीं जीतेगी या उनकी समस्याओं का निराकरण नहीं करगी. राष्ट्रपति राजपक्से को यह साबित करना पड़ेगा के वो केवल एक अच्छे सैनिक शासक ही नहीं है किंतु उन्हें राष्ट्र निर्माण में सभी पक्षों का सहयोग लेना भी आता है. तमिल लोगों कि आशाओं और अपेक्षाओं का पूरा धयान रखना उनका पहला कर्तव्य होगा नहीं तो उनकी यह कामयाबी बहुत टिकाऊ नहीं रहेगी. एक व्यापक स्तर पर सोचने वाली बात यह है के तमिल उग्रवाद कि पराजय ने महात्मा गाँधी के अहिंसा के सिध्दांत कि पुनरस्थापना कर दी है.
हिंसा के द्वारा कोई भी उद्देश्य प्राप्त नहीं होता इस बात को फिर से साबित कर दिया है. इस भ्रम को भी तोड़ दिया है कि हिंसा का इस्तेमाल कर के आप किसी को अपनी बात मनवाने के लिए मजबूर कर सकते हैं. दोनों तरफ से हिंसा कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकती यह सिध्दांत फिर से स्थापित हो गया है. यदि इस पूरे तीन दशकों के इतिहास से अन्य इसी प्रकार के संघर्ष भी सबक लें तो बहुत सा खून खराबा बच सकता है और हजारों बेकसूर एक असमय और दु:ख दाई मौत से बच सकते हैं. परन्तु ऐसी अपेक्षा करना मानव स्वभाव के विपरीत होगा. हमेशा ऐसा देखा गया के लोग दूसरो के अनुभव से कुछ नहीं सीखते हैं. इस लिए ये केवल उम्मीद ही की जा सकती है कि यदि तमिल उग्रवाद पराजित हो गया है तो कश्मीर के उग्रवादी या नक्सल उग्रवादी इस बात से कोई सबक लेकर हिंसा का रास्ता छोड़ देंगे और एक अहिंसक मार्ग अपना कर अपने प्रशों का हल निकालने का प्रयास करेंगे. यह एक मानव त्रासदी है की इस प्रकार का प्रत्येक हिंसक आन्दोलन विफलता में ही समाप्त होता है किंतु फिर भी ऐसे आन्दोलनों के प्रेरक हिंसा का मार्ग नहीं त्यागते हैं. इतिहास में ऐसे बहुत कम उध्दरण हैं जहाँ पर हिंसा के मार्ग पर चल कर किसी को कोई बहुत स्थायी सफलता मिली हो. और फिर यह भी हमेशा होता आया है की हिंसा की सफलता के बाद भी समस्याओं का निपटारा करने के लिए आपसी बात चीत की जरूरत पड़ती है. कई रन नीतिकार तो यह भी मानते हैं की हिंसा का उपयोग सामनेवालों के बात चीत के लिए मजबूर करने के ले लिए ही किया जाता है. इसलिए यह तो स्पष्ट है के विवाद चाहे कुछ भी हो, अंत में हल तो बातचीत के द्वारा ही निकलता है. इस लिए गाँधी के अहिंसक रास्ते में ही समझदारी है. पर दिक्कत यह है के इस रास्ते पर आने में लोगों को वक्त लगता है और जैसे के तमिल उग्रवाद के साथ हुआ बहुत सारा खून भी बहता है.
 




भवानी शंकर