संस्करण: 02मार्च-2009

छोटे दलों के नेताओं की प्रधान मंत्री पद की अभिलाषा और भारत का लोकतंत्र
 

 

ए.के.शर्मा

बसे इस देश में देवेगौडा इंद्र कुमार गुजराल चंद्रशेखर जैसे नेता प्रधानमंत्री  बने हैं तबसे इस देश के नेताओं को एक विचित्र रोग लग गया है. यह रोग है प्रधानमंत्री बन जाने का दिवा स्वप्न देखना. चाहे मायावती हों या शरद पवार, मुलायम हों या चंद्र बाबु नायडू या फिर देवेगौडा ही क्यों न हों इन सब को लगता है के प्रधानमंत्री बन जाने के लिए देश में बहुमत प्राप्त करने की कोई जरूरत नहीं है केवल जोड़ तोड़ से ही काम चल जाएगा.
यही कारण है के जब यह नेता प्रधानमंत्री  पद के लिए अपनी दावेदारी की बात करते हैं तो अपने दल के संख्या बल का कोई ख्याल नहीं रखते. वरना जरा गौर कीजिये. प्रधानमंत्री  पद के लिए सक्षम होने के लिए लोक सभा में आपको 543 में से 272 सदस्यों के समर्थन प्राप्त होना चाहिए. और हालत यह है के यह सभी नेता जो प्रधानमंत्री  बन जाने का सपना देख रहे हैं इनके दल लोक सभा की आधी सीटों पर चुनाव ही नहीं लढ रहे हैं. फिर जीत कर बहुमत प्राप्त करने का तो प्रश्न ही नहीं खड़ा होता. परन्तु यही भारत के लोकतंत्र की विशेषता है. यह नेताओं को दिवा स्वप्न देखने के बहुत अवसर देता है. यह उन्हें भी मुगालता में रखता है और इन्ही नेताओं को सबक भी सिखाता है. वास्तव में जबसे कांग्रेस पार्टी के विरुध्द सभी दलों ने मिल कर यह प्रयास किया के उसका एक छत्रीय राज टूट जाए तो उन्हें इस बात में केवल आधी कामयाबी ही मिल पाई . कांग्रेस का वर्चस्व तो कम हो गया किंतु वे एक वैकल्पिक व्यवस्था नहीं खड़ी कर पाए. इन सभी दलों के हाथ में कांग्रेस से छीनी हुई सत्ता टुकडों टुकडों में ही आई. यह राज्यों में तो ताकतवर बन गए किंतु केन्द्र में ऐसा कुछ नहीं कर पाए. यही मूल कारणा हैं के इन टुकडों टुकडों में बने हुए नेताओं के राज्य स्तरीय स्वप्न तो पूरे हो गए किंतु राष्ट्रीय स्तर पर यह अभी भी दिवा स्वप्न ही देख रहे हैं. यह सब अपने राज्यों में तो मुख्य मंत्री बन गए हैं पर इन सभी लोगों के पास पूरे देश में कांग्रेस का विकल्प बन जाने का न तो समय है और न ही कोई सोच है. पर प्रधानमंत्री बन जाने की लालसा बिकट है. इस के लिए यह कोई भी सौदा करने के लिए राजी हैं. राजनीति में सत्ता या तो ताकत के भरोसे प्राप्त होती है या फिर इसके मूल में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ होती हैं जो किसी भी व्यक्ति को सत्ता पर बैठा देती हैं.
इन सभी प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार नेताओं के लिए उम्मीद जगाने वाली बात यह है के पिछले कई वर्षों से प्रधान मंत्री की कुर्सी पर वही व्यक्ति बैठा है जिसका परिस्थितियों ने साथ दिया है. इस पद को प्राप्त करने के लिए उस व्यक्ति को लोक सभा चुनावों में अपने दल के लिए देश में बहुमत प्राप्त करने की जरूरत नहीं पड़ी है. हुआ यूँ है के बहुमत या तो किसी को मिला ही नहीं और या किसी और ने प्राप्त किया और  प्रधान मंत्री कोई और बन बैठा.  प्रधानमंत्री पद का सारा खेल चुनावों के परिणाम आने के बाद खेला गया है. इस का परिणाम यह है की देश में सत्ता बहुमत के आधार पर नहीं किंतु जोड़ तोड़ के आधाार पर हासिल की जाती है. यही कारण है के मायावती, मुलायम सिंह, शरद पवार और अन्य सभी नेता यह उम्मीद करते हैं के उनके पास यदि लोक सभा के 50 संसद सदस्य भी हैं तो वे सब  प्रधान मंत्री बन सकते हैं. मजे की बात यह है की 40 सदस्यों के समर्थन वाले चन्द्रशेखर बन चुके हैं और इस लिए कोई इन नेताओं से यह कहने की हिम्मत नहीं रखता है के आप लोग देश की जनता के साथ इस प्रकार का मजाक क्यों कर रहे हो.
कोई इन्हे यह नहीं कहता के पहले आप जनता से पर्याप्त समर्थन तो प्राप्त कर लो फिर  प्रधान मंत्री बन जाने की बात करना. इस का सबसे नुकसानदायक पहलु यह है के लोक सभा चुनाव एक बहुत ही सीमित आंकडों का खेल बन कर रह गए हैं. मसलन पवार साहब के लिए चुनाव केवल महाराष्ट्र की उतनी सीटों तक ही सीमित हैं जहाँ पर उनके दल के उम्म्मीद लड़ रहे हैं. और मायावती के लिए चुनावों का अर्थ केवल उत्तार प्रदेश तक ही है. और अपने आपको इतना सीमित करने के बाद यह नेता भारत के  प्रधान मंत्री बन जाना चाहते हैं. इन नेताओं के लिए सुविधााजनक बात यह है की किसी बड़े दल-अर्थात कांग्रेस या भाजपा से समर्थन लेने या देने में इन्हे कोई परेशानी नहीं होती है. जब इन्हे भाजपा से हाथ मिलाना होता है तो वे कह देते हैं की कांग्रेस के भ्रष्टाचार और उसकी गरीब विरोधाी नीतियों के कारण वे भाजपा का साथ दे रहे हैं और दूसरी तरफ जब उन्हें कांग्रेस का समर्थन चाहिए होता है तो यह लोग ये कह कर रास्ता निकाल लेते हैं कि देश को साम्प्रदायिकता और कट्टरवाद से बचाना है. दोनों ही हाथों में लडु रखने का यह तरीका है और भारत का लोकतंत्र आज कल ऐसे ही दलों के लिए बहुत ही पोषक वातावरण निर्माण कर रहा है. किंतु मिली जुली सरकारों के इस दौर में अब इन सभी दलों की असलियत लोगों को मालूम हो चुकी है. जागरूक जनता यह समझती है की यह लोग केवल सत्ता की राजनीति कर रहे हैं और इनका अब किसी उसूल से कोई लेना देना नहीं है.
सच तो यह है की  प्रधान मंत्री की लालसा रखने वाले यह सभी नेता केन्द्र में स्वयं को मंत्री या अपने चहेतों को मंत्री बना कर ही अपना राजनैतिक उद्देश्य पूरा कर लेते हैं. जो नेता केन्द्र में सीधो सत्ता में नहीं आते वो दबाव की राजनीति कर के अपना दाम वसूलने में लगे रहते हैं. फिलहाल तो देश के राजनैतिक समीकरण ऐसे हैं की इन सब ही दलों के नेताओं को अपना पूरा जोर अजमाने का अवसर मिलेगा. सरकारें चाहे कैसी भी चलें उनका स्वरुप तो खिचडी जैसा ही होगा. देश को सत्ता के लिए इन बिना उसूलों के राजनैतिक समीकरणों से हमारे मतदाता ही निकाल सकते हैं. यह उनके हाथों में है के वो किसी एक दल को बहुमत दें या फिर सत्ता को टुकडों टुकडों में बाँट कर दें.

 

ए.के.शर्मा