संस्करण: 02मार्च-2009

स्लमडॉग मिलेनियम को आस्कर
गर्व और शर्म एक साथ



वीरेंद्र जैन

स्कर पुरस्कारों को दुनिया के फिल्म जगत के पुरस्कारों में श्रेष्ठता का दर्जा प्राप्त है। यही कारण है कि 'स्लमडॉग मिलेनियर' को आठ आस्कर पुरस्कार प्राप्त होने पर हमारी लोकसभा के अधयक्ष सोमनाथ चटर्जी ने एकमत से लोकसभा की ओर से पुरस्कार विजेताओं को बधाई दी जो एक तरह से पूरे देश द्वारा दी गयी बधाई की तरह थी। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि यह पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। सच तो यह है कि हम भारत के लोग बहुत हद तक उत्सवधार्मी हो गये हैं और ऊंची आर्थिक स्थिति वालों के साथ साथ उनकी नकल करने वाले मधयमवर्ग के लोग उत्सव मनाने के हर एक अवसर का उपयोग करने से नहीं चूकते। जब हर गोविंद खुराना, नायपाल या अमर्त्य सेन को नोबुल पुरस्कार मिलता है तो हमें उनके भारतीय होने का खयाल आता है। हमारी गुणग्राहकता की स्थिति यह है कि नोबल पुरस्कार मिलने के बाद हमें मदर टेरसा और अमृत्यसेन को भारत रत्न देने की याद आती है। प्रसंगवश याद आया कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार भारतीय मूल के नॉयपाल के लिए पलक पाँवड़े बिछा देती है जिनका कहना था कि जो माथे पर टीका लगाये रहते हैं असल में उनका दिमाग खोखला होता है। अटलजी के मंत्रिमंडल में इस स्वरूप के कई लोग थे।
 फिल्म सैकड़ो लोगो के समनिवत कार्य का परिणाम हाती है फिर भी इसे डायरेक्र्ट'स मीडिया माना जाता है जो सच भी है। यह डायरेक्टर ही होता है जो न केवल कहानी का चयन करता है अपितु उसमें फिल्म निर्माण के उपयुक्त परिवर्तन भी सुझाता है। फिल्म नाटक नहीं होती कि एक बार हो गयी चूक पर केवल पश्चाताप ही शेष रहे अपितु निर्देशक जब तक अपनी कल्पना का दृश्य निर्मित नहीं कर लेता तब तक रिटेक कराता रहता है जिसका मतलब होता है कि वह कलाकार से अपने अनुरूप काम कराता है तथा फिल्म का जो परिष्कृत रूप दर्शकों की तालियाँ बटोरता है उसमें कलाकार की कम निदेर्शक की मेहनत और कलात्मकता अधिक होती है। विचारणीय यह है कि हमें जिस फिल्म पर आस्कर पुरस्कार मिला है वह फिल्म भले ही हमारे देश की विषय वस्तु पर बनी हो पर उसे हमारे देश के निर्देशक ने नहीं बनायी। इस खुशी के जश्न में हमें यह बात याद रखना होगी कि इस फिल्म का डायरेक्टर डैनी बायले विदेशी है। भारतीय सहयोगियों को गीत संगीत और धवनिमिश्रण के लिए पुरस्कृत किया गया है। मैं इस अवसर की खुशी को कम नहीं करना चाहता किंतु यदि हमें अपनी वास्तविकता का ज्ञान रहेगा तो हम इस अवसर पर उन क्षेत्रों को याद रख सकेंगे जहाँ तक हमें पहुँचना बाकी है। संगीत के लिए पुरस्कार जीतने पर रहमान पूरे दिल से बधाई के पात्र हैं तथा उनका सहयोग करने वाले गीतकार गुलजार समेत धवनि मिश्रण करने वाले रेसुल पुकुट्ठी भी बधाई के पात्र हैं। यह अर्न्तराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पधरा में अर्जित विजय है इसलिए इसका महत्व कलात्मक मूल्यों पर आधारित है। अब इस बात का कोई मतलब नहीं कि इस दौर में रहमान के अनेक गीत 'जय हो' की तुलना में अधिक लोकप्रिय हुये हैं।
इस परिघटना में शर्म की बात यह है कि हमारे देश की सबसे बड़ी जिस संस्था ने फिल्म पर मिले पुरस्कार के विजेताओं को बधाई दी है वही इस फिल्म की विषय वस्तु के लिए जिम्मेवार भी है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की जिन संस्थाओं द्वारा अरबों खरबों रूपयों की मदद शिक्षा स्वास्थ पोषण और बालश्रम उन्मूलन के लिए आता है उसका अधिकांश भाग भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाता है जिसके लिए संसद में बैठे यही नेता और इस सरकार के नीचे काम करने वाली नौकरशाही जिम्मेवार है। दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्तियाँ भारत में ही हैं तथा जहाँ रहने वाले लाखों बच्चे गन्दे कचरे में से उपयोगी सामान बीन कर अपना पेट पालते हैं। जूठन पर पल रहे इन बच्चों के लिए पोषण वाला आहार तो जाने दीजिये नियमित आहार ही उपलब्धा नहीं है। उनके नाम पर आने वाला पैसा भी हमारे तंत्र की भेंट चढ जाता है। अपनी राजनीति के लिए साम्प्रदायिक दंगे कराने वाले लोग गाजर मूली की तरह किसी को भी उसके अनुमानित धार्म के आधार पर मार डालने से गुरेज नहीं करते व हमारी अपरिपक्व चुनाव प्रणाली के कारण ऐसे ही हत्यारों में से अनेक संसद भवन तक ही नहीं सरकार तक भी पहुँच जाते हैं। संसद में भी इनमें से अनेक लोग पूरे कार्यकाल में बिना एक शब्द बोले हुये भी पूरे जीवन भर के लिए ना केवल पेंशन और उच्च श्रेणी में मुफ्त यात्रा भत्ता के पात्र हो जाते हें अपितु सैकड़ों दूसरी सुविधाएं भी उठाते रहते हैं। अपने संसद के कार्यकाल में भी ये मौनव्रती केवल रजिस्टर पर हस्ताक्षर करके सदन से चले जाते है तथा लोक सभा टीवी दिखाता है कि आधो से अधिक सदन खाली पड़ा रहता है पर इन्हें भत्ता पूरा मिलता है।
सदन के जो सदस्य आस्कर पुरस्कारों पर बधाई दे रहे हैं उन में से बहुत कम ऐसे होंगे जिन्होंने यह फिल्म देखने की फुरसत पायी हो। यदि उनमें से कुछ भी ऐसे हों तो पुरस्कारों पर गर्व करते समय उन्हें इस बात पर शर्म आना चाहिये कि किसी कहानीकार को ऐसी फिल्म लिखने के लिए मजबूर होना पड़ा जिससे पूरी दुनिया में भारत की सच्चाई सामने आयी और लोगों को पता चला कि उनकी सात प्रतिशत जीडीपी के ढिंढोरे के बाद भी अजुर्न देव गुप्ता की रिपोर्ट के अनुसार चौरासी करोड़ लोग केवल बीस रूपये रोज पर गुजर करने को मजबूर हैं। दूसरी ओर राजनीतिक पार्टियों के लिए च्यवनप्राश की तरह विज्ञापन करने वाले अमिताभ बच्चन जैसे लोग हैं जिन्होंने फिल्मों का काम केवल मनोरंजन करना ही मान लिया है। उन्हें भी इस सच्चाई को दर्शाने वाली फिल्म पसंद नहीं आयी। वे अपने अभिन्न मित्र अमरसिंह और उनके कारनामों को पसंद कर सकते है किंतु 'स्लम डाम्ग मिलेनियर' को मिलने वाले पुरस्कार से उन्हें अपनी विज्ञापन कीमत कम होती नजर आती है। यदि भविष्य में हिन्दी फिल्मी कहानियों को प्रेमचन्द की तरह देश के मेहनतकश वर्ग द्वारा जिन्दा रहने की कश्मकश में तलाशा जाने लगेगा व सत्यजीत रे की तरह फिल्में बनायी जाने लगेंगी तो बड़े बड़े महलों के सैटों और लुभावने ग्लैमर के आधाार पर झूठा सपना बेचने वालों के दिन लद जायेंगे। अमिताभ जैसे लोगों की यही चिंता है। अकेले मुंबई में ही लाखों कारें अतिक्रमण करके सड़कों पर पार्क की जाती हैं जिनके अतिक्रमण को हटाने के लिए कोई मुहिम नहीं चलायी जाती पर अपने सोने के लिए पॉलीथिन की झुग्गी तान लेने वालों को बार बार उजाड़ा जाता है। 'स्लमडाग' की सफलता देश की जनता के सामने ये सारे अप्रिय सवाल खड़े करती है।
आइये फिल्म में उठाये गये मुद्दों पर धयान आकर्षित करने के लिए फिल्म को पुरस्कृत किये जाने पर गर्व महसूस करें और फिल्म की कथा वस्तु की परिस्थितियाँ पैदा करने और उन्हें बनाये रखने वालों पर शर्म महसूस करें।



 


 

वीरेंद्र जैन