संस्करण: 02मार्च-2009

सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से
गुजरात के दंगाई
कानून की चपेट में


एल.एस.हरदेनिया

गुजरात के दंगों को हुए सात साल बीत चुके हैं। 27 फरवरी, 2002 को साबरमती एक्सप्रेस के एस-4 कोच में आग लगने से 56 निर्दोष मारे गए थे। उसके बाद गुजरात में एकतरफा हत्याओं का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ, वह हमारे देश के इतिहास में अभूतपूर्व था। उसके पूर्व किसी भी दंगे में महिलाओं ने भाग नहीं लिया था परन्तु गुजरात के दंगों में महिलाओं ने भी हिंसा की, हिंसक भीड़ को मुसलमान महिलाओं और बच्चों की हत्या करने को भड़काया। महिलाओं की भागीदारी की बात पहले अफवाहों के रूप में ही सुनी जाती थी। परंतु अब इस बात को स्वयं गुजरात सरकार ने स्वीकार कर लिया है।
विगत 19 फरवरी को गुजरात सरकार ने उच्च न्यायालय में एक शपथ पत्र दाखिल किया। इस शपथ पत्र में यह स्वीकार किया गया है कि माया कोडनानी ने दंगों के दौरान एक ऐसी भीड़ का नेतृत्व किया था जिसने 95 लोगों की हत्या की थी। माया कोडनानी वर्तमान में नरेंद्र मोदी की मंत्रिमंरिषद की सदस्य हैं। गुजरात के दंगों के दौरान वे गुजरात  विधानसभाकी सदस्य थी। संभवत: मोदी ने कोडनानी को उनके इस 'अद्भुत' प्रदर्शन के लिए मंत्री बनाया होगा।
शपथ पत्र में कहा गया है कि 'चूंकि उस भीड़ ने 95 लोगों की हत्या की थी इसलिए उन हत्याओं की जिम्मेदारी कोडनानी को ही लेनी होगी।' यह शपथ पत्र, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित विशेष अनुसंधाान टीम (एसआईटी) द्वारा एकत्रित की गई जानकारी पर आधाारित है।
जहां एक ओर गुजरात के उच्च न्यायालय में उक्त शपथपत्र दाखिल किया गया है, वहीं आगामी 6 मार्च को सर्वोच्च न्यायालय उस याचिका पर विचार करेगा जिसमें गुजरात के मुख्यमंत्री समेत 70 अन्य लोगों के विरूध्द एफआईआर पंजीबध्द करने की मांग की गई है। सर्वोच्च न्यायालय को यह भी सूचित कर दिया गया है कि दंगों में मृत व्यक्तियों की संख्या, जो पहले 832 बताई गई थी, वह अब बढ़कर 1180 हो गई है संख्या में यह बढ़ोत्तरी इसलिए हुई है क्योंकि दंगों के बाद से बहुत से लोग लापता थे। कानून के अनुसार किसी व्यक्ति के लापता होने के सात साल बाद उसे मृत मान लिया जाता है। इसलिए अब गुमशुदा व्यक्तियों की संख्या भी मृत व्यक्तियों की संख्या में जोड़ दी गई है।
गुजरात पुलिस दंगों की जांच किस पक्षपाती ढंग से कर रही थी इसका एक जीता-जीता उदाहरण यह है कि गोधारा कांड के सिलसिले में 116 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। उनमें से सिर्फ 19 लोगों को जमानत पर छोड़ा गया। इस तथ्य के बावजूद कि गुजरात के उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि गोधारा कांड में आरोपियों के विरूध्द आतंकवाद से संबंधिात धाराएं नहीं लगाई जा सकती। इसके बावजूद गोधारा कांड के अधिाकांश आरोपियों को जमानत नहीं दी गई। वहीं दंगों के अपराधा के लिए 625 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, उनमें से 442 को जमानत पर छोड़ दिया गया।
दंगों के बाद से गुजरात सरकार ने पूरी ताकत दंगाईयों को बचाने में लगा दी। कमजोर एफआईआर दर्ज किए गए, पीड़ित व्यक्तियों के बयान से ठीक से दर्ज नहीं किए गए, ऐसे लोगों को धामकाया गया जिनके परिवारों के शेष सभी व्यक्तियों की हत्या कर दी गई थी, जिन अफसरों ने दंगों में भाग लिया, पीड़ित परिवारों की गुहार नहीं सुनी, उन्हीं अफसरों को जांच का काम सौंपा गया। जिन वकीलों ने दंगों में भाग लिया, उन्हें ही अदालतों में दंगाईयों के विरूध्द चलने वाले मामलों में सरकारी वकील बनाया गया। यहां तक कि दंगों की जांच करने वाले आयोग को भी प्रभावित किया गया।
जहां तक पुलिस का सवाल है, गुजरात में उसकी भूमिका अत्यंत शर्मनाक थी। इस तरह की भूमिका के पीछे वहां के मुख्यमंत्री और वहां की सत्ताधारी पार्टी का आदेश तो था ही परंतु कुछ हद तक स्वयं वहां की पुलिस का रवैया भी इसके लिए जिम्मेदार है। न सिर्फ गुजरात में वरन् देश के अन्य अनेक भागों में जहां भी दंगे हुए वहां की पुलिस का एक बड़ा हिस ऐसे अवसरों पर साम्प्रदायिक हो जाता है। अनेक बार पुलिस रक्षक की भूमिका के स्थान पर भक्षक की भूमिका अदा करने लगती है। देश के अनेक स्थानों पर हुए लगभग सभी गंभीर दंगों की न्यायिक जांच करवाई गई है। इन जांचों के निष्कर्ष में यह पाया गया है कि पुलिस का रवैया पक्षपातपूर्ण रहा है। दंगों में पीड़ितों की रक्षा उसी समय हो पाएगी जब पुलिस के दृष्टिकोण में बुनियादी परिवर्तन हो। यह उस समय ही संभव हो सकेगा जब पुलिस की भर्ती और प्रशिक्षण प्रक्रिया में बुनियादी सुधार किए जाए।
इस समय सिपाही की भर्ती का आधाार सिर्फ उसकी शैक्षणिक एवं शारीरिक श्रेष्ठता होती है। आवश्यकता इस बात की है कि भर्ती के दौरान इस बात का पता लगाया जाए कि उसका दृष्टिकोण क्या है। भर्ती करने वालों को यह स्मरण रखना चाहिए कि वे एक सेक्युलर देश की पुलिस में भर्ती कर रहे हैं। इसलिए कुछ ऐसी मनोवैज्ञानिक विधिा खोजी जाए जिससे भर्ती होने वाले सिपाहियों का अल्पसंख्यकों, दलितों और महिलाओं के प्रति क्या दृष्टिकोण है, यह पता लग सके। इसी तरह गरीबों व शोषितों के प्रति उनका क्या रवैया है। वर्षों पहिले मधयप्रदेश के एक उच्च पुलिस अधिकारी ने एक इंटरव्यू के दौरान मुझसे कहा था कि यदि विवाद शोषक व शोषित के बीच हो, अमीर और गरीब के बीच हो तो पुलिस को शोषित व गरीब का साथ देना चाहिए। परंतु प्राय: पुलिस शोषक और धानी व्यक्ति का साथ देती है। यह प्राय: सुनने को मिलता है कि बलात्कार की शिकार कोई महिला थाने में आती है तो पुलिस उसे संरक्षण देने के स्थान पर अपनी हवस का शिकार बनाया।
हमारे देश में पुलिस की एक बड़ी समस्या यह है कि वह प्राय: अपने राजनैतिक आकाओं की तरफ देखकर अपना रवैया तय करती है। यदि राजनैतिक आका चाहते है कि दंगें न हों तो पुलिस अपनी पूरी ताकत झोंककर दंगे रोकती है। यदि राजनैतिक आका चाहते हैं कि दंगा हो तो पुलिस स्वयं दंगों में शामिल हो जाती है। हमारे प्रदेश में दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में एक भी दंगा नहीं हुआ। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि दिग्विजय सिंह के सख्त आदेश थे कि किसी भी हालत में साम्प्रदायिक सद्भाव भंग नहीं होना चाहिए। इन सभी अनुभवों के मद्देनज़र पुलिस की भर्ती एवं कार्यप्रणाली में बुनियादी सुधार आवश्यक है। परंतु दु:ख की बात है कि अनेक आयोगों की सिफारिशों और सर्वोच्च न्यायालय के सख्त निर्देशों के बावजूद किसी भी सरकार ने पुलिस सुधार की दिशा में एक कदम भी नहीं उठाया है। आज भी हमारी पुलिस अंग्रेजों द्वारा सन् 1861 में बनाए गए कानून से संचालित हो रही है। 1861 का यह कानून 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद बना था। अंग्रेजों द्वारा बनाए गए कानून का मकसद था सारे देश में ऐसा दमनचक्र चलाना जिससे 1857 की पुनरावृत्ति न हो सके। आजाद भारत में इस तरह के दमन की आवश्यकता नहीं है, फिर भी यह कानून कायम है। यह शायद इसलिए है क्योंकि आजाद भारत की राजनैतिक पार्टियां भी दमन के आधार पर अपनी सत्ता की अट्टालिका खड़ी करना चाहती हैं। ऐसा ही नरेंद्र मोदी ने किया था। यदि पुलिस की भर्ती, प्रशिक्षण और पदस्थापना की प्रक्रिया में सुधाार हो गया होता तो शायद सर्वोच्च न्यायालय को गुजरात के मामले में बार-बार हस्तक्षेप नहीं करना पड़ता। यदि सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से सही जांच हो जाती है तो कोई कारण नहीं कि अंतत: दंगाईयों को दंगा करने की छूट देने और बाद में उन्हें बचाने का प्रयास करने में नरेंद्र मोदी की भूमिका सिध्द हो जाए और उन्हें इसके लिए दंड भुगतना पड़े।


 

एल.एस.हरदेनिया