संस्करण: 02मार्च-2009

भारत पुन: विश्व गुरू
बन सकता है

डॉ. राजश्री रावत ''राज''

भारत कभी अपने ज्ञान और विश्वास के बल पर विश्व का सिरमौर हुआ करता था। यह उस समय संभव हो पाया था जब हमारे पूर्वजों ने ज्ञान और विज्ञान की विभिन्न धाराओं को खोजा और इनको जनोपयोगी बनाया। भारत को विश्व का सिरमौर बनाने में पूर्वजों की अथक लगन, परिश्रम और निष्ठा का हाथ था। स्वयं अपने देश में उपलब्धा संसाधानों के समुचित उपयोग ने ही उन्हें यह सफलता दिलाई थी।

किसी भी राष्ट्र की राष्ट्रीय समृध्दि उपलब्धा संसाधानों के समुचित उपयोग पर आधाारित होती है। संसाधानों को खोज कर उनके सर्वोत्तम उपयोग किस तरह किया जा सकता है यह ज्ञान होना आवश्यक है। जागरूकता के साथ लगन और परिश्रम के बल पर ही समृध्दि के शिखर तक पहुंचा जा सकता है। अभी तक हमने अपने देश और देश के अकूत भंडार को पहचाना ही नहीं है ? आवश्यकता इस बात की है कि अपनी इस संपदा के सही ज्ञान एवं उपयोग की ठीक-ठीक जानकारी हम प्राप्त करें।

किसी भी देश की शक्ति उसके प्राकृतिक साधानों में समाहित है। प्रकृति ने भारत में दिल खोलकर अपनी संपदा लुटाई है। हमारे देश की भौगोलिक स्थिति जलवायु, खनिज संपदा, कृषि योग्य, सभी उचित चीजें, जल, जंगल, जलवायु वातावरण सभी एक से बढ़कर एक हैं। हमारे देश की जलवायु में अलग-अलग भिन्नता बहुत समृध्द है। जैव वैविधय या बायोडायवर्सिटी की समृध्दि ने हमारे देश के अंदर ही पूर्ण विश्व उपस्थित कर दिया है। हमारा देश संपूर्ण विश्व के समान है जहां धा्रुव क्षेत्रों जैसी ठंडक भी है तो उष्ण् कटिबंधाीय स्थलों की हरियाली भी है। ऊंचे ऊंचे पर्वत शिखरों की मालायें भी है तो दूसरी ओर विस्तृत रेगिस्तान भी हैं। ये सारी विशेषताएँ पूरे विश्व में अलग-अलग स्थानों पर पाई जाती हैं। हमारे देश में आने वाली छह ऋतुएं विदेशों में बड़े आश्चर्य के रूप में मानी जाती हैं। प्रकृति के ये उपहार हमारे देश को विकास के उच्चतम पायदान पर ले जा सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन प्राकृतिक संसाधानों का सही उपयोग कर स्वयं को तथा अपने देश को समृध्द बनायें।

हमारी समृध्दि की दूसरी बुनियाद बन सकती है हमारी प्राकृतिक संपदा के रूप में उपलब्धा खनिज पदार्थ और कच्ची धातुओं की उपलब्धाता। स्टील, एल्यूमिनियम और अन्य धातुओं के भंडार हमारे पास है। चमत्कारी और बहुमूल्य टिटेनियम के भंडार, हीरों और रत्नों की खानें, दुर्लभ भंडार के रूप में हमारे पास हैं। इनका खोजने परिश्रम से निकालने और विश्व के सामने जितना अधिक प्रस्तुत किया जायेगा हमारी समृध्दि उतनी ही बढ़ेंगी।
हमारे देश की नदियां, और समुद्री तट काफी समृध्द है इनके सहयोग से विद्युत उत्पादन को बढ़ावा दिया जाये तो दिन प्रति दिन विद्युत की होने वाली कमी से लड़ा जा सकता है।

हमारे देश में निरंतर प्रवाहित होने वाली वायु के वेग के पवनचक्कियों के उपयोग से भी विद्युत बनाई जाती है। विद्युत की कमी का रोना तो हर राज्य सरकार रोती है पर जल और वायु के समुचित उपयोग से विद्युत उत्पादन की ओर कोई सरकार पहल कर नये कदम नहीं उठा रही है। हमारे देश में सूर्य का प्रकाश भी 6 से 8 माह तक भरपूर रहता है। सोलर एनर्जी से विद्युत उत्पादन प्रारंभ करने की ओर भी ज्यादा धयान नहीं दिया जा रहा है। ऊर्जा के अन्य वैकल्पिक साधानों को ढूंढ कर उनके उपयोग के रास्ते खोजने और वैज्ञानिक खोजों को जारी रखने की आवश्यकता है।
भारत एक कृषि प्रधान देश है और कृषि के क्षेत्र में नए नए अनुसंधाान कर जागरूकता और सजगता के साथ नए प्रयोग कर विकास के अनेकों सोपान चढ़े जा सकते हैं।

पारंपरिक उद्योगों के साथ-साथ हमारे देश में अब अत्याधाुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के साधान भी हैं इसके लिए युवा पीढ़ी को जाग्रत होकर अत्यधिक श्रम और समय लगाकर निरंतर लगे रहना होगा ताकि प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी भारत सबसे आगे निकल सके। यह एक सत्य है कि भारतीय युवा आज प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अमेरिका और युरोप में सभी जगह अपनी जगह बनाये हुए हैं।

विदेशों में भारतीय युवाओं की प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सबसे अधिाक धााक जमी हुई है देश में भी आज मोबाइल फोन, इंटरनेट, ई-मेल आदि गांवों में भी पहुंच चुके हैं। गांवों-गांवों में घर-घर में इनका और अधिक प्रचार प्रसार हो यह आवश्यक है।

पर्यटन के रूप में देश के पास एक विशाल क्षेत्र है जहां से देश की संपन्नता और समृध्दि में और वृध्दि हो सकती है, यदि पर्यटन को और अधिक विकसित और परिष्कृत किया जाये।इससे हमारी राष्ट्रीय धारोहरें सुरक्षित और सुनियोजित रह पायेंगी। साथ ही राष्ट्र की संपदा और समृध्दि में वृध्दि भी करा पायेंगीं।

विश्व का धार्मगुरू भारत अभी भी धार्मिक विचारों की भिन्नता के होते हुए भी धार्म को संप्रदायों से अलग रखना जानता है ये मतान्तर हमारे देश के नागरिकों की बौध्दिक व्यापकता को दर्शाते हैं। अधयात्म के भंडार हमारा सर्वोपरि विशेष गुण है। अधयात्म की खोज में विश्व के अन्य देश समृध्दि और विज्ञान के शिखर पर पहुँचकर भी अशांत और उद्विग्न हैं।आवश्यकता इस बात की है कि भौतिकता के बोझ तले दबे जीवन को अधयात्म की संजीवनी से जागृत और उत्कृष्ट बनाने, जीवन के समग्र अस्तित्व को पहचानने और विकसित करने की कला हमारे देश को पूरे विश्व को बताना है और यही कला हमारे देश को सही अर्थों में विश्व गुरू बनायेगी।

इसके लिए हमें क्षुद्र स्वार्थ और अहं को त्यागकर हमें सजग, जागरूक और कर्मशील बनकर उपलब्धा संसाधानों को नए सिरे से संवर्धान कर उन्हें जन-जन के उपयोग के योग्य बनाना होगा और विश्व के सामने अपने विश्व गुरू के खिताब को पुन: सिध्द कर दिखाना होगा।


डॉ. राजश्री रावत ''राज''