संस्करण: 02मार्च-2009

हिन्दुराष्ट्र में दलित 'स्पंदित' और 'समृध्द'
गुजरात में सामाजिक न्याय

सुभाष गाताड़े

(पिछले दिनों सूबा गुजरात के प्रसार निदेशनालय की तरफ से तैयार किया गया एक विज्ञापन देश के तमाम अख़बारों में छापा। 'वायब्रन्ट' गुजरात और 'प्रोस्परेस' गुजरात जैसे केन्द्रीय नारों के तहत बताया गया कि किस तरह जनाब मोदी की अगुआई में गुजरात का नौजवान, किसान और महिलाएं तरक्की की राह की ओर बढ़ रहे हैं। फिलवक्त हम उन नारों की सत्यता-असत्यता की पड़ताल नहीं करना चाह रहे हैं, हम उस 'स्पंदित' करते गुजरात की तस्वीर से दलितों एवं अल्पसंख्यकों की सचेत अनुपस्थिति की ओर इशारा करना चाह रहे हैं। अब जहां तक अल्पसंख्यकों के साथ दोयम दर्जे के व्यवहार का प्रश्न है तो उसके लिए गुजरात सरकार देश-विदेश के मानवाधिकार संगठनों के हाथों ही नहीं, मुल्क के सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यहां तक कि संयुक्त राष्ट्रसंघ की कमेटी की तरफ से भी घोर भर्त्सना का शिकार होती आयी है। मोदी देश के किसी सूबे के एकमात्रा मुख्यमंत्री हैं जिन्हें अपनी इन्हीं करतूतों के लिए पश्चिमी देशों का वीसा तक नहीं मिल पा रहा है।

इसे सुनियोजित कहें या अन्य किसी वजह का नतीजा, 'स्पंदित' करते एवं 'समृध्दि' की ओर बढ़ते गुजरात के नक्शे से दलितों की अनुपस्थिति बहुत कुछ बयां करती हैं। )

यह वर्ष 2001 की बात है जब नरेश सोलंकी के ढाई साल के भतीजे का देहान्त हुआ। गुजरात के बनासकांठा जिले के पालनपुर ब्लॉक की हूडा गांव के इस दुखी परिवार ने उसे समुदाय/जाति के लिए बने स्मशानभूमि में दफना दिया। वे लोग घर पहुंचे ही नहीं थे कि ख़बर आयी कि गांव की दबंग पटेल जाति के एक व्यक्ति ने अपने ट्रैक्टर से उस लाश को जमीन से बाहर निकाल दिया था। दरअसल समुदाय की स्मशानभूमि के पास के जमीन के टुकड़े पर अतिक्रमण कर चुके पटेलों को यह बात नागंवार गुजरी थी कि गांव के दलितों ने उस 'विवादास्पद' जमीन पर फिर अपना हक जता दिया।

इस घटना को सात साल से अधिक वक्त हो गया और हूडा गांव के दलित आज भी इसी इन्तज़ार में है कि इलाके के कलेक्टर या गांव पंचायत के मुखिया उन्हें अपने आत्मीयजनों को दफनाने के लिए जमीन का एक टुकड़ा आवंटित कर देंगे।

लेकिन क्या यह कहा जा सकता है कि दफनाने के लिए जमीन की कमी का मसला महज हूडा गांव के दलितों तक सीमित है या यह गुजरात की परिघटना है। फरवरी 2009 के प्रथम सप्ताह में 'मेल टुडे' ने इस मसले पर रौशनी डाली थी। उसमें बताया गया था कि दलितों को सांझी स्मशानभूमि का इस्तेमाल नहीं करने दिया जाता और उन्हें गांव से दूर किसी परती जमीन का इस्तेमाल करना पड़ता है। किसी कानूनी हक के अभाव में गांव की दबंग जातियां उन्हें उनके समुदाय के लिए बनी स्मशानभूमि से भी खदेड़ती हैं।

इस सन्दर्भ में गुजरात राज्य ग्रामपंचायत सामाजिक न्याय समिति मंच द्वारा किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि 'गुजरात के 67 गांवों में से 397 गांवों में दलितों के लिए दफनाने के लिए कोई अलग भूमि आवंटित नहीं है। वे 260 गांव जहां जमीन को औपचारिक तौर पर आवंटित किया गया है, उनमें से 94 गांवों की जमीनों पर वर्चस्वशाली जातियों का कब्जा है और 26 गांवों में वह कोई नीचला इलाका है, जहां पानी भर जाता है।

गौरतलब है कि अपने आत्मीयजनों को दफनाने का सवाल जब भी उठता है, तो दलितों की स्थिति काफी हद तक सूबे के मुसलमानों जैसी हो जाती है। मुसलमानों के बने अपने कब्रगाहों पर भी कई स्थानों पर उंची जातियों ने कब्जा किया है और सूबे की सरकार के रूख के कारण कुछ बोल पाने की स्थिति में भी नहीं हैं। कुछ साल पहले गुजरात हाईकोर्ट को पाटन जिले के एक मामले में पुलिस को बाकायदा आदेश देना पड़ा था कि वह मुसलमानों के कब्रगाह पर दबंगों के कब्जे का खतम करने के लिए पुलिस बल भेजे।

अगर मृत दलितों के लिए मोदी के 'समृध्द' एवं 'स्पंदित' गुजरात में कोई स्थान नहीं है, तो हम जीवित दलितों की स्थिति की कल्पना कर सकते हैं। इसे जानना हो तो आप अहमदाबाद में अपने लिए मकान की तलाश में निकल सकते हैं।

आम तौर पर यही देखने में आता है कि अगर कोई दलित ऊंची जाति के किसी बिल्डर या प्रापर्टी डीलर से मकान के लिए सम्पर्क करता है तो या तो उसे निरूत्साहित किया जाता है या देने से साफ इंकार किया जाता है। इस बात से भी कोई फरक नहीं पड़ता कि दलित बेहतर आर्थिक पृष्ठभूमि से सम्बधिात हो। बिल्डरों एवं रीयल इस्टेट एजेण्टों के लिए एक अदद दलित परिवार के लिए सोसायटी में मकान देना, बाद की बिक्री पर उलटा असर डालता है।
दरअसल यह गुजराती समाज में गहराई में व्याप्त वर्ण/जाति मानसिकता का ही परिचायक है - जिसे 2002 के जनसंहार के बाद एक नया जीवन मिला है। इस परिस्थिति ने एक नयी प्रवृत्तिा को जन्म दिया है। यह बात देखने में आ रही है कि हाल के समयों में अकेले अहमदाबाद में 'सिर्फ दलितों के लिए बनी - लगभग तीन सौ की संख्या में' रिहायशी सोसायटीज का निर्माण हुआ है। इण्डियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर ने कुछ समय पहले इसे लेकर तैयार अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा था कि ''यह कोई चॉइस/पसन्दगी का मामला नहीं है बल्कि मजबूरी का मामला है।'' ( ए दलित ? गो फाइन्ड ए दलित सोसायटी, डी पी भट्टाचार्य, अहमदाबाद, 17 जून 2007)

''अगर कोई दलित ऊंची जातियों वाली सोसायटी में मकान खरीदने की हालत में भी हो, तो भी उसे बिल्डर या बेचनेवाले द्वारा देने से इन्कार किया जाता है।'' रामदेवनगर की एक ऐसी ही दलित सोसायटी में रह रहे सेवानिवृत्ता आई ए एस अफसर पी के वालेरा बताते हैं। कुछ समाजविज्ञानियों के मुताबिक यह अलगाव 1982 में शुरू हुआ, जिन दिनों आरक्षणविरोधाी आन्दोलन खड़ा हुआ था, हालांकि वे इस बात से सहमत हैं कि वर्गीय एवं जातीय विभाजन हाल के दिनों में अधिक गम्भीर हुए हैं। ...चर्चित सामाजिक-राजनीतिक वैज्ञानिक अच्युत याज्ञिक के मुताबिक ''शहर में तीन सौ से अधिक दलित सोसायटी हैं। अकेले चांदखेड़ा में दो सौ से अधिक सोसायटी हैं जिनमें से अधिकतर 2002 के दंगों के बाद बनी हैं जब लोग गोमतीपुर, बापूनगर और दानी लिमडा जैसे इलाकों से यहां स्थानान्तरित हुए हैं।''

हालांकि एक तरफ हिन्दू एकता की बातें और दूसरी तरफ दलितों का यह अलगाव, संघ परिवार को इस बात से नहीं रोकता कि वह चुनावों और दंगों के दरमियान अपने संकीर्ण एजेण्डा के लिए उनका इस्तेमाल करें।
रिहायशी इलाकों में अलगाव की तरह स्कूली शिक्षा में मुब्तिला निजी स्कूलों के प्रबन्धाक भी सरकारी दावों को ठेंगा दिखाते हुए दलितों-आदिवासियों को ऐसे स्कूलों में भरती होने से रोकते हैं। अधयापक स्तर पर यह परिघटना अधिक गम्भीर दिखती है। अगर गुजरात राज्य सेकेण्डरी और हायर सेकेण्डरी एजुकेशन बोर्ड ' के आंकड़ों को पलटें तो हमें दिख सकता समूचे गुजरात में अनुदानसहायता से रहित स्कूलों की संख्या 3255 तक दिखती है। ये सभी स्कूल इस मायने में 'समान' है कि वे 1972 के एजुकेशन एक्ट के स्टेचुटरी प्रावधानों का वे उल्लंघन करते हैं।

दरअसल 1972 के शिक्षा अधिानियम के तहत ऐसे सभी अनुदान प्राप्त और गैरअनुदान प्राप्त स्कूलों के लिए यह अनिवार्य है कि वे भरती करते वक्त आरक्षण नीति का पालन करें। और नियम यह कहता है कि अगर कोई स्कूल इन नियमों का उल्लंघन करता है तो उसका रजिस्टे्रशन रद्द किया जा सकता है। अनुभव बताता है कि गैरअनुदान प्राप्त स्कूल इस नियम का पालन नहीं करते हैं। गौरतलब है कि राज्य सरकार को यह स्वीकारने में भी कोई संकोच नहीं होता कि नियम का उल्लंघन करनेवाले स्कूल ऐसा करते हैं क्योकि हम उन्हें कोई सहायता नहीं देते हैं।

अभी पिछले साल की ही बात है जब इण्डियन एक्स्प्रेस ने (बडोदरा, 26 मई 2008) इस मसले का रहस्योद्धाटन करते हुए एक स्टोरी की थी। सूबे में रिजर्वेशन की नीति के अमल पर देखरेख करने के लिए बने सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण महकमे - जिसका जिम्मा है आरक्षण के अमल की निगरानी करना - सफाई देते हुए कहा था कि रोस्टर नियमों के अभाव में वे स्टेचुटरी प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं।

किसी सामाजिक कार्यकत्तरता ने जब सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत यह जानना चाहा कि आखिर गैरअनुदानप्राप्त स्कूलों में आरक्षण की नीति के अन्तर्गत कितने लोग काम करते हैं, तभी इस मामले का रहस्योदघाटन हुआ। बाद में उपरोक्त कार्यकत्तरता ने दो बातों की मांग की : ऐसे स्कूलों की मान्यता रद्द की जाए और उन अधिकारियों को दण्डित किया जाए जो इस नीति के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार हैं।

वैसे रिहायश और स्कूलों में रोजगार में नज़र आनेवाले भेदभाव की तरह अत्याचारों के मामले में भी स्थिति दलितों के विपरीत दिखती है। यह अकारण नहीं कि दलित अत्याचार के मामले में यहां दोषसिध्दि की दर महज 2.5 फीसदी दिखती है जबकि दोषमुक्त छूटने का दर 97.5 है। महज ढाई साल पहले राज्य के सामाजिक न्याय विभाग ने राज्य के मुख्य सचिव एवं विधि विभाग के समक्ष गोपनीय रिपोर्ट पेश की थी उसमें 'अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (1989) के अन्तर्गत दर्ज मामलों में प्रगट होनेवाली लापरवाही' की बात बतायी गयी थी। (एक्स्प्रेस, 15 सितम्बर 2006)

उपरोक्त रिपोर्ट में ही इस बात का विवरण पेश किया गया था कि किस तरह पुलिस ऐसे मामलों में ठीक से जांच नहीं करती है या मुकदमे के दौरान पब्लिक प्रॉसिक्यूटर दुश्मनाना भूमिका अदा करते हैं।

इस अधिनियम के तहत यह स्पष्ट है कि इन मामलों की जांच डेप्युटी सुपरिटेण्डेट आफ पुलिस के नीचे के ओहदे का अधिकारी नही कर सकता, लेकिन ऐसे चार हजार से अधिक मामले नज़र आए जहां इस बुनियादी प्रावधान का उल्लंघन किया गया था। कई सारे मामलों में जांच अधिकारी द्वारा पीड़ित की जाति का प्रमाणपत्रा साथ में संलग्न न करने से मामले खारिज कर दिए गए। कुछ मामलों में जानबूझकर पब्लिक प्रासिक्यूटर ने यह दावा किया कि अधिनियम को राज्य सरकार ने संशोधित किया है जबकि केन्द्रीय अधिनियम होने के नाते उसके पास ऐसा कोई अधिकार नहीं होता। कई ऐसे मामले भी नज़र आए जहां इस अधिनियम के तहत अभियुक्तों को एण्टीसिपेटरी जमानत भी दी गयी जबकि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। गौरतलब है कि अनुसूचित जाति और जनजाति मामलों की संसदीय कमेटी ने भी गुजरात में व्याप्त इस परिघटना पर चिन्ता प्रगट की थी।

जाननेयोग्य है कि इस मामले में भी सरकार की कुम्भकर्णी नींद तभी खुली जब गुजरात दलित पैंथर्स के संस्थापकों में से एक तथा फिलवक्त 'कौन्सिल फोर सोशल जस्टिस' के कर्णधार वालजीभाई पटेल ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज 400 से अधिक मामलों के हश्र को लेकर सरकार एवं प्रशासन की घोर सम्वेदनहीनता को उजागर किया। उन्होंने गुजरात के 16 जिलों में अप्रैल 1995 के बाद आए 400 ऐसे मामले उठाए और उनकी तह तक जाने की कोशिश की कि आखिर क्या दलितों-आदिवासियों को न्याय मिला। इस अधययन ने इस गलत धारणा को भी बेपर्द किया कि कानून की अक्षमता इस वजह से है क्योंकि लोग फर्जी मुकदमे दर्ज करते हैं, उल्टे यही बात स्पष्ट थी कि राज्य खुद ऐसे मामलों में समझौता परस्ती का रूख अख्तियार करता है।

वे लोग जो गुजरात के सामाजिक-सांस्कृतिक हालात पर लम्बे समय से नज़र रखे हुए हैं वह बता सकते हैं कि इन दिनों अपनी 'स्पंदित' (Vibrant) एवम 'समृध्द' ;च्तवेचमतवनेध्द छवि पर इतराते गुजरात में दलितों की स्थिति हमेशा ही दोयम दर्जे की रही है। कुछ साल पहले के नेशनल क्राइम रेकार्ड ब्युरो के आंकड़ों के मुताबिक दलितों पर अत्याचार के मामलों में उत्तार प्रदेश और बिहार के बाद गुजरात का नम्बर था। (एशियन एज, 11 अप्रैल 2003) उसके पहले का रेकार्ड भी कत्ताई अच्छा नहीं था। 1998 की उसकी रिपोर्ट के मुताबिक अगर दलितों के खिलाफ अत्याचारों की कुल संख्या 25,617 थी तो अकेले गुजरात में दलित अत्याचार के 8894 मामले दर्ज किए गए थे।

मगर जब दलितों-आदिवासियों पर होने वाले अत्याचारों को रोकने का मसला उठा तो भाजपा सरकार ने महज कागजी कार्रवाई की। अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के तहत जिन विशेष अदालतों की रूपरेखा बनी थी, वे गुजरात के 26 जिलों में से महज 10 जिलों में कायम हो सकी थीं और दलित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक इन अदालतों में भी दलित मुद्दों को प्राथमिकता नहीं दी जाती थी।
दलितो की दोयम दर्जे की परिस्थिति को लेकर तमाम अन्य बातें यहां कही जा सकती हैं, निश्चित ही ऐसे तथ्यों की भरमार कर देना हमारा मन्तव्य नहीं है। सोचने का मसला है कि गुजरात के 'हिन्दुराष्ट्र' में दलितों के इस दोयम दर्जे को लेकर शेष मुल्क में ज्यादा चर्चा क्यों नहीं हो सकी है और उतनाही विचारणीय मसला यह है कि आखिर इस स्थिति के बावजूद आखिर किन कारणों से दलितों का ही एक हिस्सा हिन्दुत्व की अल्पसंख्यक विरोधी राजनीति की ओर आकर्षित होता दिखा है! वर्ष 2002 के जनसंहार में दलितों-आदिवासियों के एक हिस्से ने किस तरह जूनूनी गिरोहों का साथ दिया इसके बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है।

इस मुक़ाम पर हिन्दू राज को लेकर डा अम्बेडकर की भविष्यवाणी समीचीन जान पड़ती है। अपनी रचना 'पाकिस्तान या देश का विभाजन, पेज 358) - जो उन्होंने देश के बंटवारे के पहले लिखी थी, उन्होंने भविष्यवाणी की थी : ''यदि हिन्दू राज एक सच्चाई बनता है, तो यह इस देश के लिए सबसे बड़ी विपत्ति होगी। हिन्दू चाहे जो कहें, इस बात से फर्क नहीं पड़ता, हिन्दूवाद स्वतंत्राता, समानता और भाईचारे के लिए खतरा है। उस लिहाज से यह लोकतंत्रा का विरोधी है। हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।'



सुभाष गाताड़े