संस्करण: 29जून-2009

 

तालिबानियों की राह पर
भारतीय माओवादी
 

एम.के.सिंह      

भारत में 15 राज्यों में सक्रिय माओवादियों ने अब अपनी रणनीति बदल दी है। पहले से ही केन्द्र और राज्य सरकारों की नाक में दम करने वाले माओवादी और आक्रामक हो गए हैं। पश्चिम बंगाल की लालगढ क़ी घटना में तालिबानी रणनीति की झलक दिखाई दे रही है। तालिबानियों की ही तर्ज पर भारतीय माओवादियों ने लालगढ और उसके आस-पास के इलाकों पर कब्जा कर लिया और धीरे-धीरे अपनी ताकत बढाते रहे। आदिवासियों की गरीबी और अशिक्षा का फायदा उठते हुए, उन्हें सरकार के खिलाफ खडा कर दिया। थानों, सरकारी भवनों और स्कूल समेत कई प्रतिष्ठानों को अपले कब्जे में ले लिया। राजनीतिक दलों के दफ्तरों को आग के हवाले कर दिया। सकड़ों को क्षतिग्रस्त और अवरूध्द कर क्षेत्र को बाकी देश से अलग कर दिया। लालगढ़ की घटना से स्पष्ट है कि माओवादी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन चुके है।

वर्तमान में देश के 150 से अधिक जिले माओवादी आंदोलन तथा हिंसा की चपेट में है। प्रभावित जिलों में फरवरी से मई के बीच माओवादी हिंसा में सौ से अधिक जवान एवं अधिकारी मारे जा चुके हैं। माओवादियों ने अब रूस, अमरीका और यहां तक कि चीन में बने हथियारों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। नक्सलियों ने द्वितीय विश्व युध्द के समय की 303 राइफलों से लेकर पूरी तरह स्वचालित राइफलों तक की व्यापक शृंखला का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। अनेक नक्सल दलम अमरीका निर्मित एसएमजी थामसन बंदूकें, एके-47 राइफलें और बड़ी संख्या में रूसी और चीनी राइफल एवं पिस्तौल सहित घातक हथियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। नक्सली समस्या से निपटने के लिए तैनात सीआरपीएफ ने वित्तीय वर्ष 2008-09 में 1714 हथियार जब्त किए थे। कहा जा रहा है कि नेपाल में हथियार छोड़कर संसदीय लोकतंत्र में शामिल हुए माओवादियों के प्रमुख नेता पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड से नाराज माओवादी भारत को अपना ठिकाना बनाने लगे हैं।

माओवादियों ने उड़ीसा के मलकागिरी जिले को अपने लिए सबसे सुरक्षित माना है। खुफिया अधिकारियों का भी घुसपैठ का अंदेशा हो गया है। उनका कहना है कि हमें नेपाली माओवादियों की घुसपैठ की सूचना मिली है, लेकिन जब तक वे पकड़े नहीं जाते कुछ भी कहना उचित नहीं होगा। कुछ समय पहले नेपाल ने भh भारत को आगाह किया था कि माओवादियों का एक हिस्सा भारतीय सीमा में प्रवेश कर सकता है। माओवादी आंदोलन ने नेपाल के पशुपतिनाथ से आंध्रप्रदेश के तिरूपति तक एक लाल गलियारे के निर्माण को अपना लक्ष्य बनाया है। ऐसे में नेपाल में प्रचंड को सत्ता मिलने के बाद माओवादी कार्यकर्ता सीमा लांघ कर भारत में आने की बात को नकारा नहीं जा सकता है।

लंबे अर्से से भारत के माओवादी अपने नेपाली समकक्षों से नैतिक के साथ-साथ साजोसामान का समर्थन हासिल करते रहे हैं। यह सर्वविदित है कि उड़ीसा, आंध्रप्रदेश और छत्तीसगढ़ में सयि माओवादी दूसरे इलाकों के विशेषज्ञों से मदद ले रहे हैं। माओवाद से प्रभावित राज्य लंबे अरसे से यह मांग करते आ रहे हैं कि माओवाद समस्या को राज्यों की समस्या न मानकर राष्ट्रीय समस्या माना जाए, क्योंकि लगभग आधा देश इससे ग्रसित है। नक्सली आंदोलन 1960 के दशक में शुरू हुआ था। माओ जेदोंगे से प्रेरित होकर रिवोल्यूशनरी अपोजिशन दल का गठन किया था। 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माक्र्सवादी-लेनिनवादी का जन्म हुआ। 1970 के दशक में यह कमजोर पडने लगी। इसके बाद माओवादी कम्युनिस्ट सेन्टर जैसे क्षेत्रीय संगठन एकीकृत बिहार में मजबूत हो गए। आंध्रप्रदेश एवं अन्य राज्यों में पीपुल्स वार ग्रुप ने हथियारबंद विद्रोहियों की कमान अपने हाथों में ले ली और 1980 से 1990 के दशक तक 30 नक्सली समूह सक्रिय थे, जिनके सदस्यों की संख्या 30 हजार तक पहुंच गई। नक्सली अवैध वसूली और जमीन पर कब्जा करने जैसे घटनाओं में लिप्त होने लगे। देश में माओवादियों की संख्या 50 हजार के आसपास है, जिनमें 20 हजार हथियार बंद है। झारखंड के 24 में से 16 जिले बुरी तरह नक्सली हिंसा की चपेट में हैं। उड़ीसा के कुल 30 में से 17 जिले माओवाद की चपेट में हैं। बिहार के 38 में 19 जिलों में इनका प्रभाव है। छत्तीसगढ़ के 10 जिलों में 150 पुलिस थाने संवेदनशील हैं। आंध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम, विजयनगरम, खम्माम आरै पूर्वी गोदावरी जिले तथा महाराष्ट्र के गढ़चिरौली, चन्द्रपुर, गोंडिया, यवतमाल, भंडारा और नांदेड जैसे जिले नक्सलग्रस्त घोषित किए गए हैं। राज्यों के बीच आपसी समन्वय न हो पाने के कारण यह समस्या बढ़ती ही जा रही है। केंद्र और राज्यों की खींचतान का लाभ नक्सली ले रहे हैं। उनकी गतिविधियां बेखौफ जारी हैं। पीड़ित राज्य सरकारें अपने-अपने ढंग से नक्सलियों से लड़ रहे हैं। संयुक्त रूप से कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। । केंद्र और राज्य सरकारें जब तक एकजुट हो कर नक्सली समस्या का समाधान नहीं करेंगे, तब तक समस्या का समाधान एक दिवा स्वप्न ही साबित होगा।
 


एम.के.सिंह