संस्करण: 29जून-2009

 


सियासत और वकालत का
झगड़ा है भाजपा में
 

 

वीरेंद्र जैन

15वीं लोकसभा के लिए भाजपा के 116 सांसद जीते हैं जो उसे सदन में दूसरे नम्बर की सबसे बड़ी पार्टी बनाते हैं व इस नाते उसे विपक्षी दल का दर्जा भी दिलाते हैं। भाजपा की गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखण्ड,में अपने दम पर सरकार है पंजाब और बिहार में वे गठबंधन सरकारों में प्रमुख भागीदार हैं। लोकसभा चुनावों में झारखण्ड, छत्तीसगढ, गुजरात, कर्नाटक आदि में उन्होंने पहले से अधिक सफलता पायी है। उनके पीछे समर्पित कार्यकर्ताओं वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का सहारा है और उन्हें पसंद न करने वालों की भाषा में कहा जाये तो वे अभी भी देश में साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए एक बड़ा खतरा हैं भले ही सत्ता पाकर मगन कांग्रेस के लोग उसे महसूस न कर रहे हों।

पर, फिर भी सत्ता पाने में असफल रहने के कारण भाजपा में भयानक ले दे मची हुयी है। वे पराजय को पचा नहीं पा रहे हैं और सार्वजनिक रूप से एक दूसरे पर जिम्मेवारी डाल कर देश और दुनिया में तमाशा बने हुये हैं। इसका असली कारण यह है कि वे एक आन्दोलन की जगह सत्ता हथियाने और सत्ता के सहारे सम्पत्ति व साधानों की लूट पर निगाह गड़ाने वाले गिरोह में बदल चुके हैं। विडम्बना यह है कि जिस संघ को उनके मार्ग से विचलन पर नियंत्रण रखना चाहिये था वह भी सत्ता की चकाचोंधा से प्रभावित होकर भाजपा के एक गुट विशेष का पिछलग्गू बन गया है। जब जब उसके विचलन से कोई सहयोगी संगठन नाराज हुआ तब संघ ने भाजपा को सुधारने का प्रयास करने की जगह उसका बचाव ही किया। स्वदेशी जागरण मंच के दत्तोपंत ठेगड़ी की आर्थिक नीतियों पर आलोचना हो या भारतीय किसान संघ द्वारा किसानों की अनदेखी पर असंतोष हो संघ ने सदैव भाजपा की ढाल बनने की कोशिश की जिससे उसमें मनमानी करने की प्रवृत्ति पनपती गयी। इसलिए जब चुनावों में कई हजार करोड़ की लागत लगाने के बाद उसे वसूल करने वाले पद नहीं मिलते हैं तो सही विश्लेषण की जगह खीझ में एक दूसरे पर जिम्मेवारियां थोपने का काम तेज हो जाता है। जब हार के बाद भी विपक्षी नेता उपनेता जैसे बचे खुचे लाभ के पद भी उन लोगों को बांटे जाने लगें जिन्होंने कभी चुनावों का सामना करने का साहस ही नहीं जुटाया हो और जो जीतने वालों द्वारा गलत नीतियां बनाने के लिए जिम्मेवार माने जा रहे हों तो संकट का बढना स्वाभाविक ही है।

       लोकतंत्र में जब कोई दल कार्यक्रम, कार्यकर्ता, और आन्दोलन पर आधारित नहीं रह जाता है और उसके नेताओं का सत्ता लालच तीव्र होता है तो उसे शार्टकट की तलाश होती है। सत्ता का स्वाद लगते ही भाजपा भी क्रमश: ऐसे ही संगठन में बदल चुका है इसलिए अब चाहे जैसे मिले उसे केवल और केवल सत्ता चाहिये। इसके लिए उन्होंने साम्प्रदायिकता से लेकर जातिवाद और लोकप्रिय व्यक्तित्वों को भुनाने से लेकर धान कुबेरों व घोषित अपराधियों के खुले सहयोग का सहारा लेने में भी गुरेज नहीं किया। सत्ता पाने के लिए बहुमत जुटाने में उन्होंने पूर्व राजवंशों के सदस्यों, क्रिकेट खिलाड़ियों, टीवी के मसखरों, फिल्मी अभिनेता/ अभिनेत्रियों, संत महंत की वेषभूषा में रहने वालों,  दलबदलुओं, आर्थिक अपराधियों, बड़े उद्योगपतियों आदि को उम्मीदवार बनाया। दिवंगतों के परिवारजनों के प्रति उमड़ी सहानुभूति का भी भरपूर उपयोग किया। ऐसे लोगों से संघ प्रेरित घोषित आदर्शों पर चलने और अच्छे सांसद होने की आशा कैसे की जा सकती है जबकि संसद में आने के उनके अपने लक्ष्य होते हैं। वे एक ओर तो हाजिरी लगा कर अपना भत्ता पक्का करते हैं वहीं दूसरी ओर सरकारी कार्यालयों में काम करवाते घूमते रहते हैं। ऐसी दशा में सदन में बहस करने व प्रैस के सामने बयान देने के लिए सुयोग्य वाक्पटु लोगों की जरूरत होती है और जब इस जरूरत की पूर्ति नेताओं से नहीं हो पाती तो उसकी जगह दलों में वकीलों की भर्ती की जाती है। भाजपा में उसे वकीलों की भरमार है। रोचक यह है कि राजनीति में सक्रिय ऐसे वकीलों या उनके परिवार जनों को बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी अच्छे मानदेय पर अपना विधिक सलाहकार नियुक्त करती हैं। एक पत्रिका ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विधिक सलाहकारों व उनके राजनीतिक सम्बंधियों की सूची प्रकाशित की थी जो भारतीय राजनीति के चरित्र पर भरपूर प्रकाश डालती है।

       भाजपा ने अपने एक बड़े नेता की उसके ही भाई द्वारा हत्या कर दिये जाने के बाद उसके ही पुत्र को बहुत उतावले पन में उम्मीदवार बनाने की कोशिश की थी पर उसके द्वारा नशे में जो कुछ भी किया गया था उससे उसके जीतने की संभावना कम हो जाने के बाद उसकी बेटी को उम्मीदवार बनाने की कोशिशें की गयी थीं। उनके एक राष्ट्रीय अध्यक्ष को कैमरे के सामने घूस लेते और डालरों में मांगते पकड़े जाने के बाद उनकी पत्नी को ही सांसद बना कर सांत्वना दी गयी थी। राम जन्मभूमि मंदिर को मुद्दा बनाने के बाद  तो संतो के भगवे चोले में रहने वाले उम्मीदवारों की भरमार ही हो गयी थी जिनमें से अनेक से अभी भी पीछा नहीं छूटा है। लोकसभा के चुनाव में राज्य के मंत्रियों, विधायकों, आदि के प्रभाव को भुनाने के लिए उन्हें उम्मीदार बनाया  जाता है जिनके जीत जाने के बाद वहाँ दुबारा विधानसभा का चुनाव कराना पड़ता है। ऐसा करना भाजपा के लिए अधिक हास्यास्पद होता है क्यों कि वह बार बार होने वाले चुनाव खर्चों से बचने के लिए लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने व प्रधानमंत्री के सीधो चुनाव जैसी मांगें करती रहती है।

            जहॉ आडवाणीजी के भाषण लेखक ने हार की जिम्मेवारी हिंदुत्व की अति पक्षधारता पर डाली है वहीं राजनाथ सिंह ने सबको बचाते हुये स्वयं को ही जिम्मेवार ठहराये जाने के लिए प्रस्तुत कर दिया। यह नुस्खा काम आया और इससे सारे जिम्मेवार लोगों की बचत हो गयी। किंतु स्वयं को जिम्मेवार बताते समय उन्होंने अपने पद से स्तीफा देने की जरूरत नहीं समझी। आडवाणीजी ने भी दो एक दिन विपक्ष का नेता नहीं बनने का दिखावा करने के बाद अपने पक्ष में माहौल बना लिया। खंडूरी को मुख्यमंत्री पद से हटवाने के लिए कोश्यारी ने राज्यसभा सीट से स्तीफा देने की पेशकश की जिससे कि दुबारा राज्यसभा सीट के लिए चुनाव होने पर मतविभाजन सामने आ सकता था। इसलिए उनकी बात मान कर उन्हें स्तीफा वापिस लेने के लिए मना लिया गया और खंडूरी से सीट खाली करवा ली। जसवंत सिंह और यशवंत सिन्हा बाहर से आये हुये भाजपायी हैं जो अभी तक हजम नहीं किये जा सके हैं। ऐसे लोगों पर संघ के अनुशासन का बहाना भी नहीं चलता। सब कुछ मिलाकर कहा जा सकता है कि भाजपा का संकट दिन प्रतिदिन बढेगा ही बढेगा जब तक कि वे सीटों की चिंता को छोड़ कर अपने सिध्दातों पर अडिग नहीं होते।

 

 


 वीरेंद्र जैन