संस्करण: 29जून-2009

 

युवा पीढ़ी रोक सकती है :
कन्या भूरण हत्या
 

 

 

डॉ.गीता गुप्त

 ह कटु सत्य है कि भारत में कन्या भ्रूण हत्या रोकने की सभी चेष्टाएं विफल रही हैं और आज भी यह गंभीर चुनौती के रूप में हमारे सामने है। यद्यपि इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया द्वारा ऐसे कई विज्ञापन एवं लेख निरंतर जारी किये गये जिनके माधयम से जनता की संवेदना को जीवंत कर इस बुराई को दूर किया जा सके। परंतु लिंगानुपात घटने की बजाय तेज़ी से बढ़ता ही जा रहा है औश्र एक हजार लड़कों के अनुपात में सिर्फ 927 लड़कियां रह गयी हैं। सन 2001 की जनगणना के अनुसार प्रति एक हज़ार लड़कों पर राजस्थान में 906, दिल्ली में 868, हरियाणा में 820, पंजाब में 793, गुजरात में 878, बिहार में 938, चंडीगढ़ में 845, उत्तर प्रदेश में 916, छत्तीसगढ़ में 975 और मध्य प्रदेश में 929 लड़कियां हैं। हरियाणा में एक सर्वे के अनुसार, यदि राज्य में इसी तरह लिंगानुपात बढ़ता रहा तो आगामी दो ढाई दशकों बाद एक हज़ार लड़कों के अनुपात में सिर्फ पांच सौ लड़कियां रह जाएंगी। इसी तरह पंजाब में भी एक सदी के बाद यह अनुपात 1000 : 7 रह जाएगा। जन्म से पूर्व ही कन्याओं की हत्या के मामले में पंजाब सबसे आगे है।

विश्व के प्रमुख देशों की तुलना में भारत में लिंगानुपात बहुत कम है। रूस में प्रति एक हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 1140, जापान में 1041, अमेरिका में 1029, इंडोनेशिया में 1004, ब्राजील में 1025 तथा भारत में 927 है। अब यह समस्या चीन में भी जड़े जमा चुकी है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के ऑनलाइन संस्करण में प्रकाशित एक शोधापत्र के अनुसार चीन में आगामी दो दशकों में लिंगानुपात अंतराल तेज़ी से बढ़ेगा। सन् 2005 में वहाँ बीस वर्ष के आयु वर्ग में लड़कों की संख्या लड़कियों से तीस लाख बीस हज़ार अधिक थी और नवजातों में एक लाख दस हज़ार बालक शिशुओं की संख्या अधिक थी। यह अधययन चीन के झेजियांग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर वेई जिंग झू और टेरेसा हेस्केथ विश्वविद्यालय लंदन के ली लू ने संयुक्त रूप से किया। यह अधययन सन् 2005 की राष्ट्रीय जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया गया और इसमें 20 वर्ष तक के लोगों को शामिल किया गया जिनकी आबादी 47,64000 थी।

यह जानना दिलचस्प होगा कि चीन के गांवों में सौ महिलाओं पर 126 पुरुष हैं। 20 वर्ष के आयु वर्ग में सौ महिलाओं के अनुपात में 124 पुरुष हैं। चीन में विद्यमान एक बच्चा कानून भी लिंगानुपात असंतुलन का एक कारण है। चीन के कुछ प्रांतों में एक बच्चे का नियम लागू है। वहाँ कन्याओं को बोझ माना जाता है इसलिए गर्भस्थ शिशु के कन्या होने का पता चलते ही लोग गर्भपात करा देते हैं। वहाँ अल्ट्रा साउण्ड और गर्भपात सस्ता साधान होने के कारण भी कन्या भ्रूण हत्या की प्रवृत्ति बढ़ी है।

भारत में कन्या भ्रूण-हत्या रोकने हेतु बहुत प्रयास किये जा रहे हैं परंतु अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है। यहाँ एक जनवरी 1996 से प्री नटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (पी एन डी टी 1994) लागू हुआ। सन् 2002 में इसमें संशोधान करके जन्म पूर्व बच्चे के लिंग-परीक्षण को अपराधा घोषित किया गया। इस एक्ट के तहत जान-बूझकर भ्रूण का लिंग जानने हेतु अल्ट्रा सोनोग्रॉफी करवाने और कन्या भ्रूण का गर्भपात करवाने पर पचास हज़ार रुपए जुर्माना और तीन वर्ष के कारावास का दंड सुनिश्चित है। लिंग परीक्षण करने वाले डॉक्टर की उपाधिा रद्द करने का प्रावधान भी है। पर आज तक किसी डॉक्टर को ऐसे प्रकरण में सज़ा नहीं दी गयी है जबकि प्रसव-पूर्व लिंग-परीक्षणा धाड़ल्ले से जारी है।

दरअसल इस समस्या के पीछे कई सामाजिक कारण हैं। जैसे-पुत्र की अभिलाषा, मृत्यु के उपरांत पुत्र के हाथों अंतिम संस्कार से ही मोक्ष प्राप्ति की अवधारणा, लड़की के विवाह में दहेज देने की बाधयता, महिला के प्रति बढ़ती हिंसा आदि। यह दु:खद सत्य है कि उच्च शिक्षित युवक भी पुत्र संतान की ही सर्वाधिक कामना करते हैं और पुत्री को जन्म देने वाली पत्नी की हत्या कर करने में नहीं हिचकिचाते। ऐसे अनेक मामले उजागर हुए हैं। समाज में यह भ्रामक धारणा भी व्याप्त है कि पुत्र द्वारा अत्येंष्टि क्रिया संपन्न किये जाने पर ही दिवंगत आत्मा को मोक्ष प्राप्ति होती है। इस कारण भी लोग पुत्र-मोह पालते हैं। यह भी सत्य है कि लड़कियां इसलिए बोझ समझी जाती हैं कि उनके विवाह में बहुत दहेज देना पड़ता है और आजीवन उनपर खर्च करना पड़ता है। यह एक जटिल समस्या है। दक्षिण भारत, बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में तो दूल्हों की हैसियत और योग्यतानुसार उनकी कीमत तय है जिसे चुकाना हर विवाह योग्य युवती के माता-पिता के वश की बात नहीं है।

वस्तुत: सामाजिक वातावरण में परिवर्तना लाना होगा, जो व्यावहारिक दृष्टि से उपयोगी और समाधानकरक भी हो। जैसे-लड़कियां दृढ़ निश्चय करें कि वे बिना दहेज के ही विवाह करेंगी। शिक्षा-संस्थाओं में अधययनरत युवक भी संकल्प लें कि वे विवाह में दहेज नहीं लेंगे। दहेज मुक्त विवाह करने वालों को समाज में सम्मानित किया जाए। प्रत्येक लड़की आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करे। उसे कोई न कोई हुनर आना ही चाहिए। कम से कम स्नातक स्तर तक की शिक्षा उसे अवश्य प्राप्त करनी चाहिए। इसके अलावा कोई रोज़गारोन्मुखी पाठयक्रम जैसे-कम्प्यूटर कोर्स, ब्यूटी पार्लर या इंटीरियर डिज़ायनिंग आदि भी करना चाहिए, यही नहीं, उसे घरेलू कामों के अलावा विद्युत,जल, दूरभाष आदि के बिलों का भुगतान करना, बैंक में राशि निकालना, ड्राफ्ट बनवाना, रेल में आरक्षण करवाना, वाहन चलाना और छोटी-मोटी मरम्मत के काम भी सीखना चाहिए। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे समाज में आसानी से अपनी जगह भी बना सकेंगी।

आजकल माता-पिता लड़कों की तरह ही लड़कियों को पढ़ाते-लिखाते और स्वावलंबी भी बनाते हैं। अत: उन्हें स्वयं ही विवाह के समय अनाप-शनाप धान ख़र्च करने या दहेज देने से परहेज करना चाहिए। अन्यथा कैसे नयी परंपरा कायम होगी ? वैसे भी दहेज लेना और देना दोनों ही अपराधा हैं। यह भी सर्वविदित है कि लड़कियां माता-पिता की संपत्ति में हक़दार हैं। पर खेद की बात है कि माता-पिता दहेज देते ही हैं और लड़कियां स्वयं अधिकाधिक दहेज चाहती हैं। वे सोचती हैं कि इससे ससुराल में उनकी धाक जमेगी। यह सोच कर एकदम ग़लत है। उन्हें अपने सद्गुणों से नये घर में धाक जमानी चाहिए और स्वाभिमान के साथ जीना चाहिए। यदि लड़कियां पैतृक संपत्ति में हिस्सा भी लेती हैं और चाहती हैं कि माता-पिता उनकी शिक्षा और विवाह में भी जी खोलकर धान व्यय करें-तो निश्चय ही किसी भी माता-पिता के लिए यह स्थिति सुखद नहीं होगी।

आवश्यकता इस बात की है कि विवाह में दहेज का लेन-देन पढ़े-लिखे, भद्र समाज द्वारा पूर्णत: समाप्त किया जाये। देखा जाता है कि शिक्षित व समर्थ लोग ही विवाह में बढ़-चढ़कर लेन-देन और प्रदर्शन करते हैं। ऐसे में, कमज़ोर वर्ग के सामने आदर्श कौन प्रस्तुत करेगा ? बेटी को पाल-पोस और पढ़ा-लिखा कर जीविकोपार्जन योग्य बना देना क्या महत्वपूर्ण नहीं है ? संतान मात्र को संस्कारित करना यानी बेटे-बेटी की समान भाव से परवरिश करना और लड़कियों के साथ भेदभाव को पूर्णत: समाप्त करना समय की मांग है। युवा वर्ग इसके महत्व को शायद समझता है तभी हाल ही में मथुरा की रेशू और मेरठ के अभिनव अग्रवाल ने ब्याह करते समय आठवां फेरा भी लिया जो इस संकल्प का प्रतीक था कि वे जीवन में कभी भी कन्या भ्रूण हत्या नहीं करवायेंगे। इसे एक सराहनीय पहल कहा जा सकता है।

मध्य प्रदेश में बालिकाओं की घटती संख्या से मध्यप्रदेश राज्य महिला आयोग बहुत चिंतित है। यहाँ 15 जिलों की स्थिति बहुत ख़राब है। एक हज़ार लड़कों के अनुपात में यहाँ लड़कियो की संख्या मुरैना में 822, भिंड में 829, ग्वालियर में 848,दतिया में 857,शिवपुरी में 858, छतरपुर में 869, विदिशा में 875, सागर में 884, गुना में 885, टीकमगढ़ में 886, भोपाल में 895, होशंगाबाद में 896, पन्ना में 901,जबलपुर में 908 तथा श्योपुर में 909 है। राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा ने सभी धर्मगुरुओं से अनुरोधाकिया है कि वे अपने प्रवचनों द्वारा कन्या भ्रूण हत्या के विरोधा में भी लोगों को समझाइश दें। ताकि इस बुराई को मिटाया जा सके।

ग़ौरतलब है कि आज पंजाब में 16 लाख भाइयों के भाग्य में बहने नहीं हैं। जब स्त्रियों की तुलना में पुरुषों की संख्या अधिक होगी तो समाज में निश्चित रूप से अराजकता फैलेगी। भविष्य में पुरुषों को विवाह के लिए स्त्रियां नहीं मिलेंगी और स्त्रियों को शायद बहुपति प्रथा का शिकार होना पड़ेगा। ऐसे में स्त्रियों के प्रति हिंसा और भी उग्र रूप धाारण करेगी और उनकी सुरक्षा का प्रश्न भी उपस्थित होगा। मौजूदा विषम परिस्थितियों को देखकर भविष्य के भयावह सामाजिक परिदृश्य का अनुमान लगाना कठिन नहीं है। ऐसे में समाज को उन रूढ़ियों और दकियानूसी मान्यताओं से मुक्ति दिलाना अनिवार्य है जिनके अनुसार पुत्र के बिना मोक्ष नहीं मिलता। युवा दंपत्तियों को यह तय करना होगा कि उनकी दो ही संतानें होंगी, चाहे दोनों पुत्रियां ही क्यों न हों! पुत्र की चाह में परिवार बढ़ाते जाना बुध्दिमानी नहीं है।

नि:संदेह अब लड़की भी माँ-बाप का सहारा बन सकती है। वह अत्येंष्टि कर सकती है, बस-ट्रक-रेलगाड़ी और विमान चला सकती है, पहलवानी कर सकती है, कुआं खोद सकती है, कहने का आशय यह कि लड़की सब कुछ कर सकती है। वह लड़के की तुलना में तनिक भी कमजोर नहीं है। फिर गर्भ में ही उसकी हत्या क्यों की जाए ? बेटी-बहू, पत्नी, माँ और नाना रिश्तों में बंधी कन्या ही परिवार की  धुरी होती है। समूची सृष्टि और जीवन का सौंदर्य उसी से है। कहा भी जाता है-यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:। ज़रा सोचिए, यदि कन्याओं की रक्षा नहीं की गयी, स्त्री-पुरुष का अनुपात निरंतर चिंताजनक होता गया तो इसके कितने भयंकर दुष्परिणाम हो सकते हैं ? युवा पीढ़ी इस बात को समझ ले और पुरानी पीढ़ी को दृढ़तापूर्वक इसका बोधा कराये तो उन तमाम सामाजिक विडंबनाओं से छुटकारा मिल सकता है, जो कन्या भ्रूणहत्या के लिए जिम्मेदार हैं। निश्चय ही भारत में आने वाला कल युवाओं का है अतएव सचमुच, यदि युवा पीढ़ी कटिबध्द हो जाए तो इस सामाजिक कलंक से मुक्ति पाने के लिए अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।
 

 


 डॉ.गीता गुप्त