संस्करण: 29जून-2009

बिछड़े कांग्रेसियों के एक हो जाने का स्वर्णिम अवसर  यू.पी.ए. की पुनरावृत्ति ने दिया
कांग्रेस की एकता और मजबूती का नया संदेश
 

राजेंद्र जोशी

रतीय लोकतंत्र में नये नये राजनैतिक दलों का गठन होना और फिर आपस में मिलकर समय समय पर उनका गठबंधन होते रहना कोई नई बात नहीं रह गई हैं। बड़े राजनैतिक दलों में कतिपय राजनेताओं द्वारा अपनी उपेक्षाओं के चलते उन नेताओं द्वारा अपने अस्तित्व के प्रदर्शन के लिए पार्टी से अलग होकर एक नये राजनैतिक दल का गठन कर लेना भारतीय राजनैतिक परिवेश का चरित्र जैसा बनता जा रहा है। देश में आजादी के बाद सत्ता की बागड़ोर सम्हालने वाली सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ही रही है। किंतु इस पार्टी में जिन नेताओं में सत्ता-सुख की प्यास भड़कती चली गई और जो सत्ता की मंडली में शामिल होने से वंचित होते चले गये उनके सामने अपनी राजनैतिक क्षमताओं और प्रतिभाओं के प्रदर्शन का अपनी पैतृक पार्टी में कोई मंच या मैदान नहीं बचा तो उन्होंने अलग राजनैतिक दल बनाकर अपने अपने दलों के नये नाम रखकर उनका पंजीयन करवा लिया। सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने के लिए छोटे क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व में आते रहना ही बड़ी पार्टियों में होती गई अपेक्षाओं का ही परिणाम है।

वर्तमान में अनेक ऐसे प्रादेशिक या क्षेत्रीय कहे जाने वाले राजनैतिक दल मौजूद हैं जिन्हें कांग्रेस से अलग हुए राजनेताओं ने अपनी राजनैतिक भूख मिटाने के लिए स्थापित कर दिखाया है। कांग्रेस से अलग हुए कुछ दलों ने तो राष्ट्रीय स्तर के दलों के रूप में अपनी पहचान कायम कर ली है। कांग्रेस के मजबूत जनाधार के खिलाफ अपना सिक्का चलाने में राष्ट्रीय स्तर की भारतीय जनता पार्टी ने केंद्रीय सत्ता तक पहुंचने के पांसे फेंके किंतु केवल अपने अकेले के दम पर सत्ता हासिल कर पाना उसके बूते के बाहर रहा तो, उसने कतिपय राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन का खेल खेला जिसमें वह कामयाब भी रही। एन.डी.ए. के नाम से एक महागठबंधन तैयार कर उसने केंद्रीय सत्ता हासिल करने का अवसर भी प्राप्त कर लिया। वैसे देखा जाय तो भारत में आपातकाल के बाद हुए निर्वाचन के उपरांत केंद्र में बनी जनता सरकार भी विभिन्न दलों के गठबंधन का ही परिणाम थी। मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बने थे। जैसा कि हकीकत है कि मोरारजी भाई भी कांग्रेस के ही वरिष्ठतम नेताओं में थे। जनता सरकार द्वारा वर्षों तक अस्तित्व में नहीं रह पाई। उसके बाद जो निर्वाचन हुए उसमें पुन: कांग्रेस सत्ता में आई और श्रीमती इंदिरा गांधी फिर से प्रधानमंत्री बन गई। इंदिरा जी के बाद भारतीय राजनीति में बड़े पैमाने पर परिवर्तन देखने को मिलते रहे जिसमें सत्ता में तो कांग्रेस नहीं रह पाई किंतु जितने भी प्रधानमंत्री बनते चले गये प्राय: वे सभी कांग्रेस पार्टी से ही निकले हुए थे। चंद्रशेखर, विश्वनाथ प्रताप सिंह, इंद्रकुमार गुजरात और देवगोड़ा भी प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहे थे। सभी नेता कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार रहे।

केंद्र में एन.डी.ए. की सरकार के बाद पहली बार 2004 में जब यू.पी.ए. की सरकार बनी तब कहीं जाकर कांग्रेस को उस सरकार में नेतृत्व मिला। यू.पी.ए. में प्राय: वे सभी दल शामिल थे जो या तो कांग्रेस से विलग होकर बने थे या फिर कांग्रेस की राजनैतिक विचारधारा के समर्थक थे। देश दो विचारधाराओं में बंट गया था। एक यू.पी.ए. की विचारधारा से तो दूसरे एन.डी.ए. की विचारधारा से।

अब 2009 के लोकसभा निर्वाचन में देश की जनता ने यू.पी.ए. को दुबारा जनादेश देकर यह साबित कर दिखाया है कि यह देश कांग्रेसी विचारधारा के बलबूते पर ही वैश्विक प्रतिस्पर्धाओं में आगे बढ़ सकता है। आर्थिक मंदी के इस अंतर्राष्ट्रीय माहौल में भारत की कांग्रेसी आर्थिक नीतियों का ही यह परिणाम है कि आज इस वैश्विक संकट के चलते भारत अपने आपको अन्य विकसित देशों के बीच सबसे अलग बेहतर स्थिति में खड़ा महसूस कर रहा है। निर्वाचन के समय प्रचार के दौर में विपक्ष ने यू.पी.ए. विशेषकर कांग्रेस के खिलाफ जितने भी मुद्दे उठाये थे, देश की जनता ने उन्हें ठुकरा दिया। देश की जनता, आतंक, हिंसा, नफरत, कट्टरवाद एवं तोड़फोड़ की राजनीति से ऊब चुकी है। जनता इस देश में साम्प्रदायिक सद्भाव, प्रेम, एकता, भाईचारा और धर्मनिरपेक्षता की भावना की पक्षधार है। वह अहंकार, रागद्वेष और छलकपट की राजनीति से तंग आ गई है। जनता चाहती है कि देश को ऐसी सरकार संचालित करे जो विकास के कामों को प्राथमिकता दें। युवा वर्ग, महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों और आरक्षित वर्गों के लोगों के कल्याण के साथ ही गरीब से गरीब लोगों के हित के लिए काम करे।

देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस ही ऐसी एक पार्टी है जो भारतीयता की बुनियाद का संरक्षण कर सकती है और आज के नये युग की दौड़ में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक इलेक्ट्रॉनिक और शैक्षणिक क्षेत्र के साथ ही आर्थिक क्षेत्र में विश्व में भारत की पहचान को सक्षमता और दृढ़ता के साथ एक नया रूप देने में कामयाब हो सकती है। देश का हित सर्वोपरि है और आज चौतरफा क्षेत्रों में व्याप्त चुनौतियों के इस युग में यह समय की मांग है कि कांग्रेस से विलग हुई पार्टियां अपने छोटे-छोटे मतभेद भुलाकर अपनी मूल पार्टी कांग्रेस में शामिल होकर भारत के चौतरफा विकास अपनी राजनैतिक क्षमताओं के साथ अपना अमूल्य योगदान दें। छोटे-छोटे राजनैतिक दलों और स्वार्थवश बने प्रादेशिक दलों के गठबंधन की सरकारों से देश की जनता की आशाओं और अपेक्षाओं की पूर्ति होना अब सहज और आसान नहीं रह गया है।

राजनैतिक ध्रुवीकरण और राजनीति की बदलती जा रही तस्वीरों से मिल रहे दुष्परिणामों के परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस पार्टी ही एक मात्र ऐसी पार्टी है जिसमें भविष्य की सुदृढ़ राजनैतिक संभावनाऐं नज़र आ रही है। इस दृष्टि से अपने से विलग हुई पार्टियों और उसके नेताओं को पुन: कांग्रेस में शामिल करने की कांग्रेस पार्टी द्वारा जो आवाज़ उठाई जा रही है, वह निश्चित ही स्वागत योग्य है। समय की इस मांग से अब वे सभी दल और उनके नेता भी शायद सहमत होंगे, जो किन्हीं कारणों से पार्टी से जुदा हो गये थे। ऐसे कतिपय नेताओं से सकारात्मक संदेश भी मिलने लगे हैं। इससे निश्चित ही देश के उज्ज्वल भविष्य की संभावनाऐं निखरती जा रही हैं।

 

 

राजेंद्र जोशी