संस्करण: 28 अक्टूबर-2013

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स्विस कॉटेज में बैठकर

गरीबों की चिंता

       भारतीय जनता पार्टी के एक मात्र नेता नरेंद्र मोदी पिछले दिनों कानपुर में थे। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को बताया कि सोने की चम्मच लेकर पैदा होने वाले गरीबों का दर्द नहीं समझ सकते। हो सकता है उनका अनुभव सही हो, लेकिन उनके इस दिग्दर्शन पर सवाल इसलिए खड़े हो रहे हैं कि आज तक जितने लोगों का नाम गरीबों का दर्द समझने वालों की सूची में जोड़ा जा चुका है वे सभी कमोबेश सोने की चम्मच लेकर ही पैदा हुए हैं। चाहे समदर्शी राम हों या ज्ञान और उदारता के सागर महात्माबुध्द हों।     

? विवेकानंद


मोदी मशीन के विदेशी मेकेनिक

        रेन्द्र मोदी के निवेश और विकास के मॉडल ''वाइब्रेंट गुजरात'' को बढ़ावा देने के लिये दिग्गज जनसंपर्क कंपनी ''एप्को वर्ल्डवाइड'' से 14 दिसंबर, 2009 समझौता किया गया था। तब से लेकर अब तक चार वर्षों में एप्को की 20 देशों में 45 विशेषज्ञों की टीम ने गुजरात के मुख्यमंत्री के लिये वैश्विक स्तर पर दरवाजे खोलने में आवश्यक सहयोग दिया है।

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अप्पू एस्थोस सुरेश

(द इंडियन एक्सप्रेस से साभार)


न सुधरने को कृतसंकल्प

रामदेव और कानून के हाथ

       इस बात को अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं जब रामदेव किसी महिला के कपड़े पहन कर रामलीला मैदान से भागे थे और उसके बाद जब अनशन करने का दावा किया था तब चौथे दिन ही कोमा में चले गये थे या बचे खुचे सम्मान को बनाये रख कर अनशन तोड़ने के लिए वैसा बहाना किया था। उस समय ऐसा लगता था कि उस भूल से उन्होंने सबक लिया होगा और असत्य को आधार बनाने के भाजपायी हथकण्डे से तौबा कर लेंगे, पर उनकी ताजा गतिविधियां ऐसा संकेत नहीं देतीं।

 ? वीरेन्द्र जैन


फंस गए बाबा

      बाबा रामदेव जब तक योग गुरु थे, तब तक वे लोगों की सेवा करते दिखाई दिए। जब से उन पर राजनीति का रंग चढ़ा है, तब से उनकी छवि बेदाग नहीं कही जा सकती। स्वयं पर चढ़े राजनीति के रंग का असर वे दिल्ली में दो वर्ष पहले देख ही चुके हैं, जब उन्हें साड़ी पहनकर अपनी जान बचानी पड़ी थी। यदि उसी समय वे चेत जाते, तो शायद उतनी फजीहत नहीं होती। अब तो वे अपने ही गुरु की हत्या के आरोप में फंस गए हैं। 

? डॉ. महेश परिमल


आखिर नरेन्द्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाने के पीछे संघ परिवार का क्या इरादा है?

         ''नरेन्द्र मोदी पूरी व्यवस्था को बदल देंगे''।

             इस वाक्य से भारतीय जनता पार्टी के एक प्रभावशाली कार्यकर्ता ने अपनी बातचीत प्रारंभ की। बातचीत नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय में हो रही थी। वार्तालाप में भागीदार थे संघ के सदानंद शिरडले और अंग्रेजी समाचारपत्र ''द हिन्दू'' के संवाददाता प्रशांत झा। शिरडले पूना जिले की भारतीय जनता पार्टी इकाई के पूर्व सचिव हैं। प्रशांत झा ने शिरडले से कहा, ''कृपया अपनी बात को स्पष्ट करें''। शिरडले ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था का लाभ सिर्फ अल्पसंख्यकों को मिल रहा है।

 ?   एल.एस.हरदेनिया


भाजपा से अलग है मोदी का एजेन्डा ?

           भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी की बहुप्रचारित कानपुर चुनावी रैली सम्पन्न हो गयी। उत्तर प्रदेश में होने वाली मोदी की नौ चुनावी रैलियों में से यह पहली थी। भाजपा की चुनावी रैलियों में जाने वाले  श्रोताओं को मंदिर निर्माण के बारे घोषणाऐं सुनने की आदत रही है लेकिन मोदी को सुनने वाले इस बार निराश हो रहे हैं क्योंकि उन्होंने मंदिर निर्माण के मुद्दे और उसकी घोषणा से किनारा किया हुआ है।  

? सुनील अमर


खजाने की खोज पर

मीडिया का बौराना

      मिर खान की चर्चित फिल्म पीपली लाइव में इलेक्ट्रानिक मीडिया पर जो तीखा और व्यंगात्मक प्रहार किया गया था, कमोबेश उसी तरह की स्थिति उत्तरप्रदेश के उन्नाव जिले के डौंडियाखेड़ा में दिखाई पड़ रही है। बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तर्ज पर यहां भी इलेक्ट्रानिक मीडिया का जमावड़ा और फिर न्यूज रूम से डौंडियाखेड़ा स्थित किला परिसर में 1000 टन सोने को प्राप्त करने के लिए हो रही खुदाई पर चटखारे ले-लेकर खबरें दिखाना मीडिया की साख पर सवालिया निशान लगा रहा है।

?  सिध्दार्थ शंकर गौतम


चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में

मोदी के कारण कुछ फर्क नहीं पड़ रहा है

      पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे 8 दिसंबर को आ जायेगें। यह चुनाव भारत की राजनीति में उतना ही  महत्वपूर्ण  है जितना जर्मनी में हुआ 1933 का चुनाव था. दोनों बड़ी  कोई भी इस चुनाव को सेमी फाइनल मानने को तैयार नहीं है लेकिन सच्चाई यह  है कि विधानसभा  चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। मिजोरम का राजनीतिक महत्तव उतना नहीं है  जितना मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़,दिल्ली और राजस्थान  का है। दिल्ली और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है जबकि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में  सरकारें हैं।  

 

? शेष नारायण सिंह


आस्था के पावन स्थलों पर हादसे-

प्रशासनिक अनदेखी के नतीजे

        स्था के पावन स्थलों के प्रति जनता में कितनी श्रध्दा के भाव हैं, वे विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक पर्वों-उत्सवों के अवसर पर देखने को मिलते हैं। बड़ी संख्या में गांवों और शहरों के श्रध्दालु भक्ति-भाव के साथ इन पावन स्थलों पर पहुंचकर पूजा और आराधना करते हुए अपने जीवन की खुशहाली की कामना करते हैं। विभिन्न पर्वों-उत्सवों पर जब इन स्थानों पर श्रध्दालुओं का जमावड़ा जिस तादाद में होता है उसके अनुरूप वहां प्रशासनिक व्यवस्था नहीं हो पाती।

? राजेन्द्र जोशी


एक नई गुफ्तगू का आग़ाज़

       ब हम महिलाओं पर हिंसा की बात करते हें तो परदे के पीछे कहीं एक परछाईं सी डोलती रहती है। किसी भी अन्य परछाई की ही तरह यह भी काली, धुधंली होती है और इसके विषय में हम जो भी जानते हैं वह हमें अच्छा नहीं लगता। यह काली परछाईं, यह अनकहा विषय है -पुरूष। महिलाओं पर हिंसा कोई एक संज्ञा नहीं है वह एक क्रिया है, एक एक्शन है। यह किसी व्यक्ति या चीज़ द्वारा किया जाना चाहिए। लिहाजा जब हम औरतों पर हिंसा की बात करते हैं तो गुपचुप रूप से, बिना कहे पुरूषों की बात भी करते हैं।       

 

? राखी रघुवंशी


भ्रष्टाचार के मोर्चे पर

देशवासियों को अच्छी खबर

        काफी लम्बे समय से देश में बढ़ते भ्रष्टाचार को लेकर काफी चर्चा और विरोध होते रहें हैं। और इन विरोध प्रदर्शनों और मीडिया के प्रचार से आम आदमी में धारणा व्याप्त हो गई है कि हम सबसे भ्रष्ट हैं। वैसे देश का प्रशासनिक जगत हो या औद्योगिक जगत या फिर सेवाओं से जुड़ा क्षेत्र सर्वत्र भ्रष्टाचार की बात आसानी से दिखती है लेकिन इन तमाम परिस्थितियों के बीच भ्रष्टाचार की निगरानी से जुड़ी प्रतिष्ठित संस्था ट्रांसपेरेसी इंटरनेशनल की पिछले सप्ताह जारी रिपोर्ट से कुछ तथ्य उभर कर सामने आएॅ है,जिनसे स्पष्ट होता है कि  भ्रष्टाचार मामलों पर रोक लगाने में हम कामयाब हुए है। 

? डॉ. सुनील शर्मा


3 नवम्बर दीपावली पर विशेष

ज्योति पर्व और इक्कीसवीं सदी का भारत

       क बार फिर देहरी पर है ज्योति पर्व। देवी लक्ष्मी की पूजा की जाएगी, दीप जलाये जाएंगे और पटाखों के शोर से मानो आसमान हिला दिया जाएगा। अभी-अभी मां दुर्गा की विदाई हुई है, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक पर्व विजयादशमी सोल्लास मनाया गया है। और अब आलोक की आराधाना का महोत्सव हमारे सामने है। यह देश सचमुच उत्सवधर्मा है। वर्ष के 365 दिनों में लगभग 111 पर्व, उत्सव, व्रत और त्योहार हम मना लेते हैं।    

 

? डॉ. गीता गुप्त


  28 अक्टूबर-2013

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