संस्करण: 28जुलाई-2008

हमारी जम्हूरियत में खुमानलीमा
क्या इरोम शर्मिला की मांग पूरी होगी ?

सुभाष गाताड़े

गर आप को जिन्दगी के साठ बसन्त पार कर चुकी खुमानलीमा (Khumanleima) के बारे में बताया जाए तो क्या आप पहचान सकते हैं ? सम्भवत: नहीं। खुमानलीमा ने पिछले दिनों सूबा मणिपुर के पूर्वी इम्फाल जिले के बामोन काम्पू गांव में अपनी बेटी का अन्तिम संस्कार किया। पारम्पारिक पोशाक पहने सौ से अधिक लोग वहां गर्दन झुकाए खड़े थे और खुमानलीमा को तसल्ली दे रहे थे। (11 जुलाई 2008)विडम्बना यही है कि इस अन्तिम संस्कार में खुमानलीमा की बेटी का मृत शरीर नहीं रखा गया था, उसे तो बहुत पहले दफनाया गया है। यह अन्तिम संस्कार उसकी तस्वीर रख कर किया गया। खुमानलीमा की बेटी को गुजरे चार साल बीत गया और फिर किस वजह से इस अन्तिम संस्कार में चार साल लग गए थे ? यह एक लम्बी कहानी है जिसमें कहीं न कहीं हम सब जाने अनजाने शामिल रहे हैं, भले ही दर्शक के रूप में ।

 

10 जुलाई 2004 की रात को असम राइफल्स के जवानों का एक दस्ता खुमानलीमा के घर पहुंचा था, जहां से वे उनकी युवा बेटी थांगजाम मनोरमा को उठा कर ले गए थे। उनका कहना था कि मनोरमा मणिपुर में जारी उग्रवादी आन्दोलन की सदस्या है और इसी सम्बन्ध में उन्हें कुछ जरूरी पूछताछ करनी है। उन्होंने यह भरोसा भी दिलाया था कि सुबह तक छोड़ देंगे। अगले दिन पास के जंगलों में थांगजाम मनोरमा मिली अवश्य लेकिन जिन्दा नहीं बल्कि एक क्षतविक्षत लाश के रूप में, अपने जिस्म पर अत्याचार की तमाम निशानियां लिए हुए। जाहिर था कि असम राइफल्स के 'रणबांकुरों' ने सूचनाएं पाने के लिए उसे प्रचण्ड यातनांए और उस पर सामूहिक बलात्कार भी किया था।

वह बात अब इतिहास हो चुकी है कि किस तरह थांगजाम मनोरमा के अत्याचारियों को दण्डित करने के लिए एक जबरदस्त जनान्दोलन खड़ा हुआ था, जिसने पूरे सूबे को अपने चपेट में लिया था। आन्दोलनकारियों की मांग थी कि थांगजाम मनोरमा के अत्याचारियों को दण्डित किया जाए और औपनिवेशिक काल के काले कानूनों की याद दिलाता 'आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर्स एक्ट' जिसने समूचे सूबे में ही नहीं पूरे उत्तार-पूर्व में कहर मचा रखा है, उसे निरस्त किया जाए।

 

इस दौरान इन्साफ की मांग करते हुए मणिपुर की महिलाओं के एक छोटे से हिस्से द्वारा उठाये सुनियोजित एवं सुविचारित कदम की महज राष्ट्रीय मीडिया ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा हो चुकी है। 15 जुलाई 2004 के दिन असम राईफल्स के इलाकाई मुख्यालय के सामने सूबे की चन्द प्रतिष्ठित एवम बुजुर्ग महिलाओं ने बाकायदा निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया था। वे अपने साथ जो बैनर लायी थीं उस पर लिखा था : 'भारतीय सेना आओ हम पर बलात्कार करो' ' भारतीय सैनिकों आओ हमारा मांस नोचो'। मीडिया के सामने उठाये गये इस कदम ने गोया इस समूचे आन्दोलन को नयी उंचाइयों पर ले जाने का काम किया।

 

यह जुदा बात है कि इतनी व्यापक सरगर्मी के बाद जिसकी प्रतिक्रिया देश-विदेश में सुनायी दी थी, अभी भी असम राइफल्स के उन दोषी जवानों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है, कहा जा रहा है कि अभी तक केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने इस सम्बन्ध में कोई आदेश नहीं दिया है। वह कुख्यात कानून निरस्त होना तो दूर की बात रही। दरअसल इस अधिनियम (1958) के प्रावधान के तहत सुरक्षाबलों की किसी ज्यादती के खिलाफ कार्रवाई के लिए केन्द्रीय गृह मंत्रालय की अनुमति लेनी पड़ती है।

 

अपनी युवा बेटी की लाश देख कर खुमानलीमा ने कसम खायी थी कि उसके अत्याचारियों को जब तक वह सज़ा नहीं दिलवाएंगी वह उसका अन्तिम संस्कार नहीं करेंगी। चार साल तक उन्होंने इस संकल्प को बखूबी निभाया। वैसे यही प्रतीत होता है कि उनके सामने खड़ी कड़वी हकीकत ने उन्हें अपना संकल्प भूलने के लिए मजबूर किया। पारम्पारिक मूल्य-मान्यताओं में यकीन रखनेवाली खुमानलीमा को लगा होगा कि कहीं ऐसा न हो कि मनोरमा की अतृप्त आत्मा भटकती रहे। संकेतों में इसी बात को खुमानलीमा ने मीडिया को बताया कि 10 जुलाई की रात खुद थांगजाम मनोरमा उनके सपने में आयी थी, जिसमें उसने अपनी मां को बताया था कि वह 'बेहद भूखी है और थकी है'। मां ने शायद उसी के बाद तय किया कि अन्तिम संस्कार कर लेंगे।

 

यह साफ है इन बुजुर्ग महिलाओं का वह ऐतिहासिक प्रदर्शन या मणिपुर की जनता का लम्बा शान्तिपूर्ण आन्दोलन या उसके समर्थन में देश के अलग-अलग हिस्सों में उठी सरगर्मियां या उन दिनों सत्तासीन हुई मनमोहन सिंह सरकार द्वारा अधिनियम की समीक्षा के लिए बनायी गयी न्यायाधीश जीवन रेड्डी कमेटी - जिसने साफ लब्जों में कानून को जनपक्षीय बनाने के लिए सुझाव दिए थे - कोई भी काम नहीं आया है।

 

पिछले दिनों इस कुख्यात कानून के बनने के पचास साल पूरे हुए।

 

अगर आप इस अधिनियम के प्रावधानों पर नज़र डालें तो पता चलेगा कि इस कानून के तहत सुरक्षा बलों को असीमित अधिकार दिये गये हैं और अगर वे ज्यादतियां भी करें तो भी चाह कर भी लोग अदालत की शरण नहीं ले सकते हैं। साधारण नागरिकों के लिये अपने ऊपर हुए अत्याचार की जांच शुरू करवाने के लिये केन्द्र सरकार से गुहार लगाना कितना लम्बा, खर्चीला और पीड़ादायी अनुभव होता होगा।

 

अभूतपूर्व दमन अभूतपूर्व किस्म के प्रतिरोध को जन्म देता है।

 

पिछले आठ साल से मणिपुर की चर्चित कवयित्री और सामाजिक कार्यकर्ती इरोम शर्मिला इस कानून को निरस्त करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं।

 

वह नवम्बर 2000 की बात है जब इरोम की भूख हड़ताल शुरू हुई थी। उस दिन मणिपुर की राजधानी इम्फाल के हवाई अड्डेवाले इलाके में सुरक्षा बलों ने अंधाधुंध गोलियां चला कर दस नागरिकों को मार डाला था। यह कोई पहला वाकया नहीं था जब मणिपुर या उत्तर पूर्व की सड़कें मासूम लोगों के खून से लाल हुई थीं। लेकिन इरोम को लगा कि अब सर पर से पानी गुजरने को है लिहाजा उन्होंने उसी दिन से ऐलान कर दिया था कि आज से वे खाना छोड़ रही हैं।

 

विगत आठ साल से अधिक समय से उनकी हड़ताल जारी है। फिलवक्त सरकारी अस्पताल में न्यायिक हिरासत में रखा गया है, जहां उन्हें एक नली के जरिये जबरदस्ती खाना खिलाया जाता है। हर पन्दरह दिन पर उन्हें जिले के सेशन जज के सामने पेश किया जाता है जो उनकी रिमाण्ड की मुद्दत को और पन्दरह दिन बढ़ा देता है। यह सिलसिला यूं ही चल रहा है।

 

उनके भाई सिंहजीत सिंह ने पिछले दिनों बताया कि इतनी लम्बी हड़ताल के कारण इरोम की हड्डियां अन्दर से बेहद कमजोर हो चली हैं। मगर इरोम अपने संकल्प से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

 

अमेरिका के नागरिक अधिकार आन्दोलन के चर्चित अश्वेत नेता मार्टिन ल्यूथर किंग ने कहीं लिखा था

 

हम लोग नहीं भूल सकते कि हिटलर ने जर्मनी में जो कुछ किया वह 'कानूनी' था और हंगेरी के स्वतंत्राता सेनानियों ने जो भी किया वह 'गैरकानूनी' था। हिटलर के जर्मनी में एक यहुदी की मदद करना 'गैरकानूनी' था, लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर मैं उन दिनों जर्मनी में रहता तो मैंने अपने यहुदी भाई-बहनों का साथ दिया होता भले ही वह काम गैरकानूनी था.... हम जो अहिंसक प्रत्यक्ष कार्रवाई में उतरते हैं तो तनाव को जनम नहीं देते है। हम लोग बस छिपे तनाव को सतह पर ला देते है।'

 

क्या अहिंसा के पुजारी की आए दिन कसमें खाने वाले मुल्क के हुक्मरान उस तनाव को दूर करने के लिए संकल्प करेंगे जिसे खुमानलीमा, इरोम शर्मिला जैसों के शान्तिपूर्ण प्रतिरोधा ने सतह पर ला दिया है।

 

सुभाष गाताड़े