संस्करण: 28जुलाई-2008

चुनावी सुधारों को जारी रखने की जरूरत

वीरेन्द्र जैन

देश में दलबदल विरोधी विधेयक  आने के पूर्व तक किसी दल की राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता का केवल इतना ही मतलब होता था कि उस पार्टी द्वारा टिकिट दिये जाने की स्थिति में चुनाव लड़ते समय संबंधित दल के उम्मीदवार को एक खास चुनाव चिन्ह आवंटित हो। चुने जाने के बाद वे स्वतंत्र थे और किसी भी प्रस्ताव पर चाहे जहाँ वोट दे सकते थे व अपने मनपसंद व्यक्ति को प्रधानमंत्री चुन सकते थे। भले ही उस दौरान अपने दल से विचलन की कोई बहुत उल्लेखनीय घटनाएं नहीं घटीं किंतु दलीय संगठन की दृष्टि से यह बहुत ही अराजक स्थिति थी। इसमें दल उसके कार्यक्रम और चुनाव घोषणा पत्र का महत्व व्यक्ति विशेष के विवेक और ईमानदारी पर निर्भर था। किंतु जैसे जैसे ईमानदारी कम होती गयीं व विवेक स्वार्थ केन्द्रित होता गया वैसे वैसे हमें नियमों में परिवर्तन के लिए विवश होना पड़ा और हमने क्रमश: नियमों में अनेक संशोधान किये। दलबदल विरोधी कानून लाये जिसमें किसी मान्यता प्राप्त पार्टी के सदन के सदस्यों में से कम से एक तिहाई सदस्यों द्वारा ही अलग हो कर दूसरी पार्टी बनायी जा सकती थी, तथा बाद में संशोधन करके उसे प्रति सदस्य तक ले आया गया। अब प्रावधान है कि यदि कोई भी सदस्य अपने पार्टी के व्हिप का उल्लंघन करता है तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है। दलीय स्तर पर भी प्रत्येक दल को नियत समय में अपने सांगठनिक चुनाव कराने को भी अनिवार्य बनाया गया।

आवश्यकता के अनुसार ये नियम भी बनाये गये कि चुनाव की अधिसूचना जारी हो जाने के बाद सरकार द्वारा कोई भी घोषणाएं नहीं की जा सकतीं और ना ही शिलान्यास आदि किये जा सकते हैं। इस दौरान चुनाव आदि से जुड़े किसी भी अधिकारी कर्मचारी का स्थानान्तरण चुनाव आयुक्त की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता। जाति धर्म भाषा क्षेत्र के आधार पर वोट मांगने की भी मनाही की गयी। बड़ी राशि के चन्दे लेने के बारे में भी कुछ नियंत्रण के प्रयास किये गये। उम्मीदवारों को अपनी और अपने परिवार की सम्पत्ति घोषित करने को कहा गया तथा उन पर चल रहे मुकदमों की जानकारी देने को भी कहा गया। प्रचार में किये गये खर्च का हिसाब रखने और नियत समय में उसे चुनाव आयोग के पास जमा करने के नियम भी बनाये गये। यही नहीं बैनर पोस्टर होर्डिंग समेत चुनाव प्रचार सामग्री का हिसाब रखने समेत चुनाव क्षेत्र में प्रचार के लिए आने वाले नेताओं की सूची देने के नियम बनाये गये। दूसरों की दीवारों पर वाल पेंटिंग्स को भी रोका गया। इस दौरान आम जनता को दिये गये लाइसेंसी हथियार भी जमा करा लिए जाने लगे। चुनाव क्षेत्रों में आवश्यकता होने पर दूसरे क्षेत्रों से चुनाव पर्यवेक्षक भी भेजे जाते रहे।

ये सारी कवायद इसलिए की जाती रही जिससे कि हम एक स्वस्थ लोकतंत्र की दिशा में निरंतर आगे बढ सकें। किंतु गत दिनों घटित घटनाओं से ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग को स्वस्थ लोकतंत्र की स्थापना के लिए इन सुधारात्मक कदमों को कुछ और आगे भी बढाना चाहिये जिससे निहित स्वार्थों के कारण सार्वजनिक जीवन से प्राप्त महत्व का दुरूपयोग करने वाले लोग राजनीति को दूषित न कर सकें। ये नियम कुछ इस प्रकार बनाये जा सकते हैं-
 प्रत्येक मान्यता प्राप्त दल को एक सुनिश्चित तिथि तक अपने सक्रिय सदस्यों की सूची को प्रतिवर्ष घोषित करना और चुनाव आयोग से उसकी पुष्टि कराना अनिवार्य होना चाहिये।

कोई भी दल केवल उस दशा में ही अपना चुनाव