संस्करण: 28जुलाई-2008

नारी, तुम सचमुच शक्ति हो

 

डॉ. महेश परिमल

हिलाओं के स्वालम्बन और आत्मनिर्र्भर होने की बात हमेशा कही जाती है, पर इसे चरितार्थ करने के नाम पर केवल बयानबाजी होती है। इस दिशा में जब तक महिलाएँ स्वयं आगे नहीं आएँगी, तब तक कुछ होने वाला नहीं। हाल ही में दो घटनाएँ ऐसी हुई,जिससे लगता है कि महिलाओं ने न केवल आत्मनिर्भरता की दिशा में, बल्कि अपनी जिंदादिली का परिचय आगे आकर दिया। इन दोनों ही घटनाओं से इन महिलाओं ने यह बता दिया कि उनमें भी कुछ कर गुजरने का जज्बा है, इसके लिए वे पुरुषों के आगे किसी प्रकार की सहायता की भी अपेक्षा नहीं करतीं।
हुआ यूँ कि राजस्थान के उदयपुर में बारहवीं की परीक्षा चल रही थी, एक केंद्र में साधारण रूप से जैसी आपाधापी होती है, उसी तरह हर तरफ मारा-मारी मची थी। किसी को अपनी सीट नहीं मिल रही थी, किसी को रोल नम्बर ही नहीं मिल रहा था। कोई अपने साथी की तलाश में था, तो कोई बहुत ही बेफिक्र होकर अपना काम कर रहा था। ऐसे में परीक्षा शुरू होने में मात्र दस मिनट पहले एक विचित्र घटना उस परीक्षा केंद्र में हुई। सभी ने अपने-अपने काम छोड़ दिए और उस नजारे को देखने लगे। बात यह थी कि एक नवयौवना दुल्हन परीक्षा केंद्र के बरामदे से गुजरने लगी। शादी का जोड़ा, शरीर पर थोड़े से गहने, हाथों पर मेंहदी, घँघट निकला हुआ, यह थी उषा, जो उस दिन उस परीक्षा केंद्र में बारहवीं की परीक्षा में शामिल होने आई थी। साधारण मध्यम वर्ग परिवार की उषा के माता-पिता की इतनी अच्छी हैसियत नहीं थी कि बहुत सारा दहेज देकर बिटिया की शादी किसी अमीर घर में करते, इसलिए अभी उषा की उम्र शादी लायक नहीं थी, फिर भी उन्होंने उसके लिए योग्य वर की तलाश में थे। योग्य वर मिल भी गया, उन्होंने समझा कि परीक्षा तक सब कुछ ठीक हो जाएगा। उषा ने अपने भावी पति को देखा, दोनों ने मिलकर तय किया कि बारहवीं की परीक्षा तक शादी नहीं होगी, भावी पति ने उषा को बारहवीं की परीक्षा देने की अनुमति भी दे दी। अब किसे पता था कि शादी का मुहूर्त और परीक्षा की तारीख में एक दिन का अंतर होगा। अब मजे की बात यह है कि उषा तो सच्चे मन से परीक्षा की तैयारी कर रही थी। जिस दिन शादी, उसके ठीक दूसरे दिन परीक्षा का पहला पेपर। अब शादी कोई ऐसे तो हो नहीं जाती, पंडितों के सभी प्रसंग निपटाते-निपटाते आधी रात बीत चुकी थी। उसके बाद भोजन और फिर विदाई, बज गए चार। परीक्षा शुरू होनी थी सुबह सात बजे। समय मात्र तीन घंटे का। ऐसे में पढ़ाई आवश्यक थी, सो उषा ने जो थोड़ा समय मिला, उसे पढ़ाई में लगा दिया। अब वह दुल्हन के जोड़े में ही पहुँच गई, परीक्षा भवन। यह उसकी दृढ़ता ही थी, जो उसे यह सब करने के लिए प्रेरित कर रही थी। कुछ कर बताने का साहस ही उसे शक्ति प्रदान कर रहा था। उसने वह सब कुछ किया, जो उसे करना था। इसी से स्पष्ट है कि नारी यदि ठान ले कि उसे यह करना है, तो वह कर के ही रहती है।

 

एक और घटना राजस्थान से काफी दूर सिकर गाँव की है। इस गाँव में एक स्नातक गृहिणी सुभीता रहती हैं। पति की सहायता करने के लिए उसे शिक्षिका बनने की ठानी। इसके लिए बी.एड. करना आवश्यक था। पति सेना में हैं, इसलिए घर की कई जिम्मेदारियाँ उसे ही सँभालनी पड़ती थी। एक बार जब पति काफी समय बाद सेना से अवकाश लेकर आए, तो सुभीता ने उससे कहा कि घर में कई बार उसे लगता है कि वह केवल घर के कामों में ही सिमटकर नहीं रहना चाहती, वह कुछ और करना चाहती है। पति राजेंद्र को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी। पति के बाद ससुराल वालों ने भी कोई दलील नहीं दी। उन्होंने भी सोचा कि बहू बाहर जाकर कुछ करे, तो उससे समाज का ही भला होगा। अब स्थितियाँ अनुकूल हो, इसके लिए पति-पत्नी ने मिलकर ईश्वर से प्रार्थना की कि उनकी इच्छा पूरी कर दे। पर ईश्वर तो सुभीता को किसी और ही परीक्षा के लिए तैयार कर रहे थे। वह सुभीता को एक जाँबाज महिला के रूप में प्रस्तुत करना चाहते थे। यहाँ भी कुदरत ने अपनी करामात दिखाई। राजेंद्र जब छुट्टियाँ खत्म कर सीमा पर गया, उसके पहले अपने प्यार का बीज सुभीता की कोख पर स्थापित कर गया। सुभीता के लिए अब शुरू हो गई परीक्षा की घड़ी। एक तरफ पढ़ाई, दूसरी तरफ घर के रोजमर्रा के काम और तीसरी तरफ अपने प्यार की निशानी का धयान रखना। समय के साथ-साथ सब कुछ बदलता रहा।

 

अचानक एक सूचना ने सुभीता को हतप्रभ कर दिया। बीएड परीक्षा की समय सारिणी घोषित की गई, तब उसे ध्यान में आया कि उसकी डॉक्टर ने डिलीवरी की भी वही तारीख दी है। अब क्या होगा, पति हजार किलोमीटर दूर। परीक्षा भी देनी ही है, नहीं तो साल भर की मेहनत पर पानी फिर जाएगा। अब क्या किया जाए? संकट की घड़ी चारों तरफ से अपने तेज घंटे बजा रही थी। परीक्षा की तारीख आ पहुँची, परीक्षा शुरू होने में गिनती के घंटे बचे थे कि सुभीता को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। घर परिवार के सभी सदस्य तनाव में आ गए। अब क्या होगा? इधार सुभीता आश्वस्त थी कि जो भी होगा, अच्छा ही होगा। उसे ईश्वर पर पूरा विश्वास था। आधी रात को उसने एक तंदुरुस्त बच्चे को जन्म दिया। उसके बाद फोन पर अपने पति से कहा- मैं एक भारतीय सिपाही की पत्नी हूँ, मैं इससे भी विकट परिस्थिति के लिए तैयार थी। हमारा बेटा स्वस्थ है और अभी कुछ ही घंटों बाद मैं परीक्षा देने जा रही हूँ। उधार पति को उसकी जीवटता पर आश्चर्य हो रहा था, लेकिन वह खुश था कि मेरी पत्नी ने एक जाँबाज महिला होने का परिचय दिया है। उधार परीक्षा केंद्र में इसकी सूचना दे दी गई, वहाँ के लोगों ने उसके लिए विशेष व्यवस्था करते हुए उसे एक अलग कमरे में पेपर लिखने की छूट दे दी। सुभीता एम्बुलेंस से परीक्षा केंद्र पहुँची और पेपर समाप्त कर तुरंत ही अस्पताल पहुँच गई।

 

दोनों ही विकट परिस्थितियों में परीक्षा दी, यह बताते हुए खुशी हो रही है कि दोनों ने ही फर्स्ट क्लास में परीक्षा पास की। इस घटना ने साबित कर दिया कि ईश्वर हमारी हर घड़ी परीक्षा लेता है। यह काम इतने खामोश तरीके से होता है कि किसी को पता ही नहीं चलता। इसमें जो पास हो जाता है, उसके लिए फिर एक नई परीक्षा की तैयारी की जाती है। इसी तरह हर घड़ी परीक्षा देते हुए इंसान नए रास्ते तलाशता रहता है। उसे नई मंजिल मिलती रहती है। उन दोनों जाँबाज महिलाओं को सलाम......

 

डॉ. महेश परिमल