संस्करण: 28जुलाई-2008

क्या सेमेस्टर पध्दति से उच्चशिक्षा में गुणवत्ता आयेगी ?

 

डॉ. गीता गुप्त

ध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर हाय-तौबा मची हुई है। मज़े की बात तो यह कि चिन्तित वे लोग हैं, जिनका शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं है। समाधान भी वे ही सुझाने के अधिकारी हैं जिन्हें शिक्षा के क्षेत्र की कठिनाइयों का रत्ती भर भी ज्ञान नहीं है। यह उसी तरह हैरानी की बात है जैसे यह जानते हुए भी कि पेड़ की जड़ को दीमक खोख़ला कर रहे हैं, दीमक का उपचार करने के बजाय कृषि वैज्ञानिक उस पेड़ में फल उगाने की तकनीक आज़माये।

 

यहाँ तकनीकी शिक्षा को एकदम छोड़ दें और सिर्फ़ सामान्य शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित रखें। ऐसे में उन तथ्यो पर गहन चिन्तन-मनन और विश्लेषण नितान्त आवश्यक है जिनके कारण आज उच्च शिक्षा में अवमूल्यन की स्थिति निर्मित हुई है। विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने के पूर्व विद्यार्थी 12-14 वर्ष विद्यालय में पढ़ते हैं। मध्यप्रदेश के विद्यालयों में शिक्षा और शिक्षकों की दुर्दशा सर्वविदित है। तथापित सरकार इस जन-कल्याण से जुड़े सर्वाधिक महत्वपूर्ण मुद्दे पर ऑंखे बन्द किये हुए है। इसीलिए तो एक शिक्षक पाँच कक्षाओं को पढ़ा रहा है। लाखों शिक्षकों की आवश्यकता होते हुए भी स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की जा रही है। स्वध्यायी शिक्षक चपरासी से भी कम वेतन पर कार्यरत् हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के विपरीत उनसे निरन्तर गैर शिक्षकीय कार्य लिये जा रहे हैं। ऐसे शिक्षक कैसी पीढ़ी का निर्माण करेंगे ? और वह पीढ़ी महाविद्यालय में पदार्पण कर कैसार् कीत्तिमान स्थापित करेगी ? यह समझा जा सकता है।

 

यह भी सच है कि विद्यालय में अधिकतम अंकों से सफल होने वाले विद्यार्थी तकनीकी शिक्षा संस्थानों में अधययन हेतु चले जाते हैं। शेष विद्यार्थी सामान्यत: स्नातक/स्नातकोत्तर उपाधि के लिए महाविद्यालय/विश्वविद्यालय में प्रवेश लेते हैं। उन्हें यह प्रवेश मधय प्रदेश में बिना किसी पात्रता-परीक्षा के ही मिल जाता है इसलिए यहाँ उपाधिकारी साक्षरों(शिक्षित नहीं) की लम्बी जमात खड़ी हो गयी है। यदि यहाँ भी प्रवेश-पूर्व पात्रता-परीक्षा अनिवार्य होती तो विश्वविद्यालयों में सिर्फ़ ज्ञान-पिपासु ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे होते। लेकिन वस्तुस्थिति यह नहीं है।

 

विद्यालयीन शिक्षा की कमज़ोर बुनियाद भी उच्च शिक्षा के अवमूल्यन के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है। रही-सही क़सर महाविद्यालयों के रवैये ने पूरी कर दी। महाविद्यालयों में विद्यार्थी की नियमित उपस्थिति को अधिक महत्व नहीं दिया गया। यह कटु सत्य है कि विद्यार्थी वहाँ प्रवेश लेकर अपनी छोटी-मोटी नौकरी या व्यवसाय करते रहे और परीक्षा के लिए उपस्थित होकर उपाधियाँ प्राप्त करते रहे। शिक्षकों ने भी उन्हें पढ़ाने में रूचि नहीं दर्शायी। अनुपस्थिति के आधार पर उन्हें परीक्षा से वंचित नहीं किया गया। विश्वविद्यालय उपाधि बेचने वाली दुकान बन गये, जहाँ परीक्षा के एक दिन पूर्व भी फार्म भरकर उपाधि प्राप्त करने की सुविधा सुलभ है तो इस पध्दति में शिक्षा की गुणवत्ता का स्थान कहाँ है ? स्नातक, स्नातकोत्तर और पी.एच.डी. की उपाधियों का आज ज्ञान से कोई नाता नहीं है। कुलपति के पद पर आसीन व्यक्ति जब किसी शोधा प्रबंधा की नक़ल करके लज्जित और दण्डित होता तो विद्यार्थी उनसे कैसी प्रेरणा ग्रहण करेंगे ?

 

किन्तु मात्र उच्च शिक्षा में गुणवत्ता की चिन्ता बेमानी है। दरअसल स्कूल-शिक्षा की सड़ी-गली व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक है। प्राथमिक स्तर से ही शिक्षा में सुधार होगा तभी उच्च शिक्षा की बदहाली दूर होगी। दुर्भाग्य से भारत में शिक्षा की दुर्दशा पर सोचने और उपयुक्त क़दम उठाने की दृढ़ इच्छा-शक्ति का अभाव सरकार ही नहीं, शिक्षाविदों में भी है। जो सचमुच शिक्षा को सही दिशा दे सकते हैं, उनकी कहीं कोई भूमिका नहीं है। जिनका योग्यता से कोई सरोकार नहीं, जो कभी पढ़ाते ही नहीं-वे विश्वविद्यालयों में पाठयक्रम तैयार करते हैं, परीक्षक बनते हैं, उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन करते हैं। यह भी विडम्बना है कि संस्था की छवि धूमिल करने वाले शिक्षकों के विरुध्द प्राचार्य राजनीतिक व अन्य दबाववश कोई कार्रवाई नहीं करते, ईमानदार प्राधयापक ही उनके कटघरे में खड़े होते रहे हैं।

 

बहरहाल, सत्र 2008-09 से उच्च शिक्षा में सुधार हेतु मध्यप्रदेश के सभी महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में सेमेस्टर पध्दति लागू कर दी गयी है। इस पध्दति से अवगत कराने के लिए शिक्षकों को दो दिनों का अपर्याप्त प्रशिक्षण् दिया गया। उक्त पध्दति में वर्ष भर के पाठयक्रम को दो भागों अर्थात-दो सेमेस्टर में बाँट दिया गया है। ज़ाहिर-सी बात है कि शिक्षा-सत्र दस महीनों का होता है। तो अब एक सेमेस्टर पाँच महीने का होगा जिसमें दो आन्तरिक मूल्यांकन तथा एक मुख्य परीक्षा क्रमश: तीस एवं सत्तर प्रतिशत अंकों की होगी। निर्धारीत पूर्णांक में से 30: अंक के दो आन्तरिक मूल्यांकनों के लिए महाविद्यालयीन स्तर पर शिक्षक जवाबदेह होंगे। चूंकि यह मूल्यांकन मुख्य परीक्षा जैसा ही महत्वपूर्ण है और शिक्षकों को उतना ही परिश्रम करना पड़ता है तथापि उन्हें कोई पारिश्रमिक नहीं दिया जाता तो कोई भी शिक्षक इतना श्रम क्यों करेगा ? शिक्षक अपना रिकार्ड ख़राब नहीं करना चाहेगा इसलिए तय है कि विद्यार्थियों को पहले से प्रश्न बताकर 30: में से 29: अंक दे देगा। अब 70: अंकों की मुख्य परीक्षा में बाहरी परीक्षक 4: अंक देंगे तो भी वह उत्तीर्ण हो जाएगा। मतलब, अनुत्तीर्ण होने की कोई गुंजायश है ही नहीं। फिर भी, विद्यार्थी अनुत्तीर्ण हो ही जाए तो भी चिन्ता की कोई बात नहीं क्योंकि परीक्षाफल घोषित होने के पूर्व ही अगले सेमेस्टर में प्रवेश की प्रक्रिया पूर्ण हो जाएगी इसलिए उसके साथ-साथ ही वह पिछले सेमेस्टर की परीक्षा भी दे सकेगा। इस तरह वह उपाधि मिलने तक पढ़ता रह सकेगा और सम्बन्धित महाविद्यालय को उसका पूरा विवरण सुरक्षित रखना होगा ताकि कोई ग़फलत न हो।

 

सेमेस्टर पध्दति में उच्च शिक्षा को रोजगारमूलक और जीवनोपयोगी बनाने हेतु जो विषय जोड़े गये हैं वे नि:संदेह विद्यार्थियों के लिए लाभप्रद हैं लेकिन शिक्षकों के लिए जो नियम बनाये गये है, वे अव्यावहारिक है। अब शिक्षक को बाक़ायदा लिखित रूप में एक पाठय-योजना दर्शानी होगी, तदनुसार ही अधयापन करना होगा। वह स्वेच्छा से कुछ नहीं कर सकेगा। पांच माह के एक सेमेस्टर में चाहे जैसे भी हो-तीन परीक्षाएँ करवाने के हिसाब से पाठयक्रम पूर्ण करना होगा। इसके अलावा चालीस मिनट के एक कालखण्ड में सभी विद्यार्थियों से उपस्थिति-पत्रक पर उनके हस्ताक्षर भी करवाना और पढ़ाना भी व्यावहारिक दृष्टि से कितना असंगत और असुविधाजनक है-वातानुकूलित कक्ष में बैठकर नियम बनाने वाले अधिकारी यह नहीं समझ सकते। एक सेक्शन में उपस्थित 75 से 125 तक की संख्या में विद्यार्थियों से हस्ताक्षर करवाने के बाद 40 मिनट में से कितना समय पढ़ाने के लिए बचेगा ? और इतने कम समय में शिक्षक कितना ज्ञान देंगे ?

 

शिक्षक को प्रतिदिन प्रत्येक कक्षा की विद्यार्थी संख्या सहित उपस्थिति अनुपस्थिति का हिसाब तैयार रखना होगा जिसे हर पन्द्रह दिन बाद उच्च शिक्षा विभाग को भेजा जाएगा। आशय यह कि शिक्षक भले ही न पढ़ाये परन्तु कागज़ी कार्रवाई पूरी करे। यही उसके कार्य का प्रमाण होगा।

 

प्रत्येक विद्यार्थी के लिए 50 अंकों का एक प्रोजेक्ट वर्क अनिवार्य किया गया है। यह कार्य उसे किसी संस्था में जाकर करना होगा, जहाँ से बाक़ायदा प्रमाण पत्र भी लेना होगा। हज़ारों की संख्या में छात्रों को कोई भी संस्था क्यों सहयोग करेगी ? एक समस्या छात्राओं की है, जिन्हें बमुश्किल कन्या महाविद्यालयों में पढ़ने की अनुमति मिली है, वे प्रोजेक्ट कार्य के लिए कहाँ-कहाँ भटकेंगी ? उस पर जो ख़र्च आयेगा, उसे कौन वहन करेगा ?

 

जिन महाविद्यालयों में पहले से सेमेस्टर पध्दति है, वहाँ के शिक्षक जानते हैं कि एक सेमेस्टर में तीन परीक्षाएँ करवाने के साथ-साथ अधयापन कितना कठिन है ? ऊपर से दूसरे महाविद्यालय/विश्वविद्यालय के प्रश्नपत्र तैयार करने और मूल्यांकन कार्य करने की अनिवार्य बाधयता का उनपर कितना मानसिक दबाव होता है ? पूरा वर्ष पढ़ाने में कम, परीक्षा और मूल्यांकन में अधिक बीतता है। अधयापन तो एक औपचारिकता मात्र रह गयी क्योंकि नये नियमानुसार समय बचेगा ही नहीं। एक वर्ष में चार बार बिना पारिश्रमिक के आन्तरिक मूल्यांकन करने वाला शिक्षक कितनी निष्ठा और ईमानदारी से कार्य करेगा, यह सोचने की बात है। प्रश्नों की जो प्रणाली तय की गयी है, वह विद्यार्थी के ज्ञान को परखने के लिए अपर्याप्त है।

 

बहरहाल, सेमेस्टर पध्दति लागू कर दी गयी है और अभी यह विद्यार्थियों की समझ से परे है। नियम-पालन का यह हाल है कि प्रवेश-तिथि 10 जून तक निर्धारीत थी फिर इसे बढ़ाकर क्रमश: 25 जून, 5 जुलाई और अब 31 जुलाई तक कर दिया गया। कौन जाने कि अगस्त में भी प्रवेश होते रहें ? जुलाई का महीना बीतने को है? अभी तक स्नातक और स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष की पुस्तकें छपी नहीं हैं। अगस्त में आन्तरिक मूल्यांकन परीक्षा होनी है। विद्यार्थी क्या पढ़ें ?

 

सारा भार शिक्षकों पर है। विद्यार्थी को तनावमुक्त कर दिया गया है, वह सिर्फ़ कक्षा में उपस्थिति पत्रक पर हस्ताक्षर करेगा। उसकी सफलता का दायित्व शिक्षक पर है। वह हाज़िरी ले, कागज़ पर हिसाब-किताब रखे, साल भर प्रश्नपत्र बनाता रहे, कॉपियाँ जांचता रहे, प्रोजेक्ट तैयार करवाता रहे और इन सबको सम्भालकर अपने घर में रखे क्योंकि कॉलेज में रखने के लिए जगह नहीं होती। शिक्षक के लिए अधयापन महत्वपूर्ण होता है। लेकिन इस पध्दति में सिर्फ़ परीक्षा के लिहाज से टुकड़ों में पाठयक्रम पढ़ाना होगा, सन्तोषजनक अध्यापन के लिए समय नहीं होगा। इससे स्पष्ट है, विद्यार्थी को कैसी शिक्षा मिलेगी ? शिक्षक को ही स्वाधयाय, चिन्तन-मनन, सृजन के लिए समय नहीं मिलेगा तो शिक्षा में कहाँ से गुणवत्ता आयेगी ? क्या सिर्फ नियम थोप देने से शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ायी जा सकती है ? इसके लिए संसाधानों की आपूर्ति, शिक्षकों की सुविधाओं और व्यावहारिक कठिनाइयों की ओर समुचित ध्यान दिया जाना आवश्यक नहीं है ?

 

तकनीकी शिक्षा-पध्दति को सामान्य शिक्षा के लिए लागू करते समय सरकार भूल गयी कि उक्त दोनों शिक्षाओं में पर्याप्त भिन्नता है और यह भी उच्च शिक्षा में स्कूल की तरह पध्दति नहीं अपनायी जानी चाहिए क्योंकि इसमें स्वाध्याय का अत्यधिक महत्व होता है और मात्र परीक्षा ज्ञान की कसौटी नहीं होती।

 

डॉ. गीता गुप्त