संस्करण: 28जुलाई-2008

सड़कों पर उतरा राज्य कर्मचारियों का असंतोष

अजय सिंह 'राहुल'

शासकीय अमला सरकार की रीढ़ की हड्डी होता है। मध्यप्रदेश में यह रीढ़ की हड्डी कितनी मज़बूत है, इसकी हकीकत अब खुलकर सामने आने लगी है। अपने मुँह, मियां मिट्ठूँ बनने वाली इस सरकार ने प्रदेश में विभिन्न स्तरों के कर्मचारियों को सब्ज-बाग तो खूब दिखाये, किंतु उनकी ज़मीनी हकीकत कुछ और ही तरह से जनता के सामने आने लगी है।

सभी सरकारें अपने कर्मचारियों के हितों के संरक्षण के लिए अपने खज़ाने की क्षमता के अनुसार तथा कर्मचारियों के कार्यों के महत्व के अनुसार उन्हें साधान और सुविधाएँ उपलब्ध कराने का यथासंभव प्रयास करती हैं। यह सरकार का दायित्व है और कर्मचारियों का हक भी बनता है। किंतु मध्यप्रदेश में विधानसभा के विगत आम चुनाव के घोषणापत्र में भाजपा ने समाज के विभिन्न वर्गों के हित-संरक्षण के जितने भी वायदे किए थे, उन्हें सत्ताधीशों ने सत्ता के मद के नशें में भुला दिया है। घोषणापत्र की प्रतियों को विमोचन के बाद लगता है, किसी ने देखा भी नहीं होगा। मंत्रिगणों और पार्टी के नेताओं को न तो अपने चुनावी वायदों को पलटकर देखने का समय मिल पाता है और न ही वे इसके थोड़ा-बहुत गंभीर नज़र आते हैं। भाजपा के मौजूदा शासनकाल के दौरान मुख्यमंत्रियों की अदला-बदली ने भी एक तो शासकीय अमले की सेवा की मानसिकता को बदल डाला है। आज कर्मचारियों पर भी भाजपा में अवतरित होते रहे मुख्यमंत्रियों के खेमों की मुहर लग चुकी है। इसके अतिरिक्त बहुत बड़ा भाग ऐसे शासकीय सेवकों का है जिनके चेहरों पर भाजपा की सत्ता को हाथ के पंजे के निशान दिखाई दे रहे हैं। हालाँकि कर्मचारी वर्ग को अपने प्रति वफादार बनाने के सरकारी हथकंडे कम नहीं हो रहे हैं। कर्मचारियों को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखाओं और उसकी गतिविधियों में भाग लेने की छूट देकर सरकार ने कट्टरपंथी विचारधारा के कर्मियों को वश में करने का पत्ता जरूर फेंका है, किंतु कुल मिलाकर वर्तमान परिदृश्य जो निर्मित हुआ है, उसके अनुसार सरकार के महत्वपूर्ण अंगों के प्रतीक ये कर्मचारी भाजपा की सत्ता की आत्मा और उसकी देह से विलग होते जा रहे हैं।

ऐसा कोई भी सरकारी महक़मा आज नहीं हैं, जिसमें मौजूदा सरकार के प्रति असंतोष न हो। राजधानी भोपाल के टिनशेड, रोशनपुरा, मुख्यमंत्री निवास, मंत्रालय विभागों के कार्यालय और मंत्रिगणों के निवास इस बात की गवाही दे रहे हैं कि वहाँ दिन-प्रति-दिन कर्मचारियों के धारने, चक्काजाम, रैलियां, भूख-हड़ताल जैसे विरोधा प्रकट करने के नज़ारे देखे जा रहे हैं। जिला मुख्यालय तहसील और विकासखंड मुख्यालयों पर भी कर्मचारियों के असंतोष के दृश्य अब तो आम हो गये हैं। आखिर, यह स्थिति क्यों निर्मित हुई हैं ? क्यों न हो, जब निष्ठा ईमानदारी, परिश्रम, अनुशासन और मर्यादा में काम करने वाले कर्मचारियों की भावनाओं के साथ अपनी ही सरकार खिलवाड़ कर रही हो।

कर्मचारियों के नाम पर राजनैतिक खेल खेलने वाली भाजपा सरकार ने कर्मचारियों को अब तक बहुत ही मुगालते में रखा है। मुख्यमंत्री, मंत्रिगण और भाजपा के तमाम नेतागण अपने भाषणों में कर्मचारियों के प्रति अपने आपको हितैषी घोषित करते हैं, किंतु मंच से उतरकर वे कर्मचारियों की तरफ पीठ फेर लेते हैं। विकास और निर्माण विभागों की उपलब्धियां जनता को कहीं दिख ही नहीं रही है। इन विभागों के लिपिकीय और तकनीकी कर्मचारी इतने ज्यादा असंतुष्ट हैं कि उन्हें न तो अपने कामों को अंजाम देने के लिए कोई साधान मिल रहे हैं, और न ही उनकी वेतन-विसंगतियों पर धयान दिया जा रहा है। परिणामस्वरूप सरकारी योजनाऐं फाइलों से जमीन पर नहीं उतर पाती हैं। लोक निर्माण, जल संसाधान, लोक स्वास्थ्य, यांत्रिकी, ग्रामीण विकास विभागों के तकनीकी कर्मचारियों की रैलियों और धारनों की तस्वीर समाचार पत्रों में खूब छप रही हैं। नारों की तख्तियाँ हाथ में लिए कर्मचारियों के जुलूसों को फाँदती मंत्रियों की गाड़ियाँ फर्राटे से आगे निकल जाती हैं। न तो सत्ता के कान इन विरोधा प्रदर्शनों की हकीकत पर जूं रेंग रही है और न ही कर्मचारियों में फैल रहे असंतोष के प्रति चिंता की लकीर दिख रही है। सत्ता प्रमुख तो मजे में हैं। निर्वाचन की नैया को पार लगाने के लिए कर्मचारियों से धाक्के तो खूब लगाये और अब जब वे अपने हकों को सामने रख रहे हैं तो सरकार मुँह छुपाती फिर रही है।

शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग ऐसे हैं जिनके माध्यम से जनता के बुनियादी अधिकारों का संरक्षण होता है। इन विभागों के कर्मचारीर् कत्तव्य निष्ठा के साथ जनसेवा के अपने दायित्वों का निर्वहन करना चाहते हैं किंतु इन विभागों के कर्मचारियों के साथ भी सरकार के वायदे धोखे साबित हो रहे हैं। शिक्षा विभाग के अमले के हितों के प्रति तो इतनी ज्यादा अनदेखी हो रही है कि उच्चशिक्षा और स्कूल शिक्षा विभाग में व्यापक पैमाने पर अराजकता फैल गई है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों और स्कूली अध्यापकों को संरक्षण मिलना तो दूर उन पर हो रहे जुल्मों को भी गंभीरता से लेने में सरकार रूचि नहीं ले रही है। छात्र-संगठनों की उपद्रवी हरकतों से समाज में अति सम्मानित गुरूजनों की प्रतिष्ठाएं धूल में मिला दी जा रही है। अध्यापन क्षेत्र के अमले में जितना असंतोष भाजपा शासनकाल में देखा जा रहा है उसकी मिसाल कहीं और नहीं मिलती है। उज्जैन के जिस माधाव महाविद्यालय में प्रो. सब्बरवाल की हत्या की घटना हुई थी उसी महाविद्यालय में हाल ही में प्राचार्य के कमरे में घुसकर जिस तरह से कैमरे के सामने मारपीट की गई उससे भी शासकीय सेवकों की हिफाजत पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। गुरूजनों के प्रति जितना अन्याय इस सरकार के समय में हो रहा है वह निंदनीय है। स्कूली स्तर पर शिक्षकों के विभिन्न वर्गों के साथ सरकार द्वारा घोर अन्याय किया जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश में सत्ता हासिल करने के लिए शिक्षकों के हितों के जितने भी वायदे किए थे, वे सभी वायदे झूठे साबित हो रहे हैं।

संविदा शिक्षकों, मानसेवी शिक्षकों के हितों के जितने भी वायदे किए थे, वे सभी वायदे झूठे साबित हो रहे हैं।संविदा शिक्षकों, मानसेवी शिक्षकों शिक्षाकर्मियों और गुरूजियों के पदों के भेदभाव को समाप्त कर उन्हें नियमित करने के आश्वासन थे, वे सब खोखले सिध्द हो रहे हैं। शिक्षकों के अंतर्मन का गुस्सा सामूहिक रूप धारण कर राजधानी की सड़कों पर आये दिन देखा जा रहा है। अपने वाजिब हकों के लिए जब ये शिक्षक मांग रखने के लिए प्रदर्शन करते हैं तो उन पर लाठियां बरसाई जा रही हैं। पंचायत कर्मियों को मुगालते में रखते हुए उनको आश्वासन दिया था कि वे नियमित कर दिए जायेगें, किंतु उन्हें भी ठेंगा दिखा दिया गया है। कर्मचारियों के साथ विश्वासघात पर विश्वासघात होते जा रहे हैं। केन्द्र के समान महंगाई भत्ता मिलना राज्य कर्मचारियों का हक है, किंतु उनके हकों को भी देते समय उन पर एहसान जताया जाता है। पूर्व की सरकारों में तो केन्द्र द्वारा घोषित महंगाई भत्ते जब जब दिए गये, उनका एरियर भी उन्हें दिया जाता रहा है किंतु भाजपा सरकार ने एरियर न देकर कर्मचारियों के साथ घोर अन्याय किया है।

दफ्तरों में बैठकर काम करने वाले, मैदानी डयूटी पर तैनात होने वाले तथा अध्यापन क्षेत्र में काम करने वाले सभी तरह के कर्मचारियों के साथ वायदे करने के बाद इतना अधिक विश्वासघात किया है कि उनकी भावनाओं को रौंधा डाला गया है। वाहन चालक सरकार के हाथ पाँव की तरह होते हैं किंतु इस सरकार में इनके हकों और हितों के प्रति भी कम बेरूखी नहीं रही। हाल ही में सरकारी वाहन चालकों का असंतोष हड़ताल के रूप में सामने आया। वाहन चालकों के असंतोष प्रदर्शन का यह परिणाम हुआ कि मुख्य सचिव, मंत्रालय और विभिन्न विभागों के अधिकारियों, डॉक्टरों और आवश्यक सेवा से जुड़े तमाम अधिकारियों को इधार-उधार से वाहन चालकों का इंतजाम करना पड़ा। दफ्तरों में कलमबंद है, वाहन बंद हो जाते हैं, पूरी की पूरी शासन व्यवस्था चौपट है। अस्पताल और शैक्षणिक संस्थाओं में अराजकता का नंगा नाच हो रहा है। डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्टॉफ में सरकार के प्रति बढ़ रहे असंतोष का ग्रॉफ नीचे नहीं आ रहा है और सरकार अपना ढोल पीटती जा रही है कि सब कुछ बेहतर हो रहा है।

भाजपा सरकार ने अपने इस शासन काल में अपने राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए कर्मचारियों को मोहरा तो बनाया किंतु अपना काम निकलते ही उनकी भावनाओं को पूरी तरह से कुचल डाला है। विधानसभा के आम चुनाव नजदीक आ ही गये हैं, और अब फिर शासकीय अमले को झूठे प्रलोभन देकर उनके जरिए अपने हित साधाने की जुगत में भाजपा जोर-शोर से लग गई है। राज्य, संभाग, जिला और निचले स्तर तक किए जा रहे तबादले इस बात के सबूत हैं कि भाजपा फिर कर्मचारियों को लोभ, लालच और वायदों के दाने फेंककर अपना निहित राजनैतिक स्वार्थ सिध्द कर रही है। तमाम झूठे प्रलोभनों के बावजूद कर्मचारियों में व्याप्त असंतोष अब सड़कों पर उतर आया है। यह है कर्मचारियों को धोखा देकर अपना उल्लू सीधा करने की फितरत में माहिर भाजपा सरकार की करतूत।

अजय सिंह 'राहुल'

(लेखक मध्यप्रदेश कांग्रेस चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष है)