संस्करण: 28अप्रेल-2008

खाद्यान्न उत्पादन में वृध्दि से संभव है मँहगाई से मुक्ति
डॉ. सुनील शर्मा

आई.एम.एफ और विश्व खाद्य संगटन के अनुसार अब दुनिया में कुछ ही हफ्तों का खाद्यान्न शेष है और सारी दुनिया भयानक खाद्यान्न संकट की ओर बढ़ रहीं है। आज सारी दुनिया में खाद्यान्नों की कीमतें चरम पर हैं। गरीब और कम आय वर्ग के लोग गेंहूँ और चावल जैसे जरूरी खाद्यान्न खरीदनें में कठिनाई महसूस कर रहे हैं। सारी दुनिया के साथ-साथ हमारा देश भी इस संकट से सुरक्षित नहीं हैं। आज देश में मुद्रास्फीति की दर 7 फीसदी से भी ऊपर हो गई है। अनाज, दाल और तेल के साथ दूध के भाव भी आसमान को छू रहे हैं। जहां तक वैश्विक खाद्य संकट की बात है तो कनाडा, आस्ट्रेलिया का सूखा तथा अमेरिका सहित विकसित राष्ट्रों द्वारा मक्के जैसे मोटे अनाजों तथा खाद्यतेलों द्वारा जैव ईधन का निर्माण कर इंजनों को चलाने के कारण इनमें कमी को इस संकट का कारण माना जा रहा है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका अपने उत्पादन का 20 प्रतिशत मक्का बायोईधन के निर्माण में उपयोग करता है तथा ब्राजील गन्ने के कुल उत्पादन का 50 प्रतिशत हिस्सा इसमें उपयोग करता है। यूरोपीय संघ के देश अपने यहां उत्पादित वनस्पति तेलों का 68 प्रतिशत हिस्सा जैव ईधन के रूप में उपयोग कर रही है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण भी सकल वैश्विक अनाज उत्पाद भी घट रहा है। हमारा देश भी इनके प्रभावों से अछूता नहीं है। देश में लगातार खाद्यान्न के उत्पादन में हो रही गिरावट के कारण आयात पर बढ़ती निर्भरता मूल्यवृध्दि के इस संकट को और बढ़ा रही है। वास्तव में हमारे देश का विस्तृत कृषि क्षेत्र देश की आबादी को भरपेंट भोजन उपलब्ध कराने के साथ-साथ निर्यात के लिए भी सक्षम है। परंतु कृषि क्षेत्र में लगातार अनदेखी के कारण आज हमारी खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ गई है।
देश कें कुल क्षेत्रफल 32 लाख 87 हजार वर्गकिलोमीटर में सें मात्र 14 करोड़ 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही खेती हो पा रही है। यह कृषि भूमि भी धीरे-धीरे कम हो रही है। नेशनल काउंसिल फॉर एग्रीकल्चरल एकॉनॉमिक्स एंड पॉलिसी की रिपोर्ट के अनुसार हरित क्रांति की उपलब्धियां अब खत्म हो रही हैं, और इसके दुष्प्रभाव हमारे सामने आ रहे हैं। पंजाब और हरियाणा जैसे उपजाऊ राज्यों में लगभग 3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की मिट्टी खारेपन के कारण बंजर हो गई है जिसके कारण गेंहूँ और धान के उत्पादन में भारी गिरावट आई है। विश्व बैंक के अनुसार देश के कुल कृषि क्षेत्र में 8.3 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में मिट्टी की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है। मिट्टी में सल्फर, नाइट्रोजन, जिंक जैसे तत्वों की कमी हो गई है। इसके कारण उपज में गिरावट ओंर उत्पादन लागत में भारी वृध्दि हो गई है जिससे खेती घाटे का सौदा बन गई है। उत्पादन में बढ़ती लागत के कारण घटते लाभ से किसान खेती से मुँह मोड़ रहे हैं। देश में खाद्यान्न में कमी का कारण उत्पादकता में कमी आना तो प्रमुख है ही साथ ही नगदी फसलों का क्षेत्रफल बढ़ना भी इसका एक महत्वपूर्ण कारक है। 1950-51 में जहां कुल कृषि योग्य भूमि का 76.7 फीसदी हिस्सा खाद्यान्न फसलों के लिए तथा 23.3 प्रतिशत भाग नगदी फसलों के लिए उपयोग किया जाता था वहीं वर्तमान में खाद्यान्न फसलों का प्रतिशत घटकर 64 हो गया है जबकि 35 फीसदी र्हिस्से पर नगदी फसलें बोई जाने लगी हैं। नगदी फसलों के प्रति किसानों का बढ़ता मोह भी खाद्यान्न संकट को जन्म दे रहा है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान लगभग 1.25 लाख हेक्टेयर उपजाऊ भूमि को वनीकरण के लिए सामाजिक वानिकी के हवाले किया गया है जिसमें अनाज उत्पादन की बजाय पेड़ों की खेती हो रही है। हमारे नीति निर्माताओं और कृषि विशेंषज्ञों ने अन्न सुरक्षा को धयान में ना रखते हुए फूलों और वनोषधियों को उपजाने पर ज्यादा जोर दिया इससे भी हजारों हेक्टेयर उपजाऊ भूमि का ह्रास हुआ है। आज का अन्न संकट अचानक ही उत्पन्न नहीं हुआ है, कई संस्थान और कृषि विशेषज्ञ समय-समय पर इसकी चेतावनी देते रहे हैं। आज से 10 वर्ष पूर्व गैर सरकारी संगठनों के अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान एंटॉनियो क्विजान ने कहा था कि ''पश्चिम और दक्षिण पूर्व एशिया की अर्थव्यवस्था सर्वाधिक तेजी से बढ़ रही है परंतु इस क्षेत्र में अन्न का संकट भी लगातार बढ़ेगा जो आर्थिक उदारीकरण की देन है'' वास्तव में आर्थिक उदारीकरण ने हमारे खेतों और सामाजिक वातावरण को बदला है अब हम खेतों को फेक्ट्री जैसा समझ बैठे हैं। हमने मिट्टी वनस्पति और बीज जैसी मूलभूत बातों को अनदेखा किया है जिसका परिणाम आज हमारे सामने है।
आज का यह खाद्यान्न संकट एकदम से खत्म होने वाला नहीं है। हमें समग्र कृषि नीति में ही परिवर्तन करना होगा। हमें अन्न सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना होगा। सवा अरब आबादी वाले देश की खाद्यान्न सुरक्षा आयात के हवाले नहीं की जा सकती, हमें आत्मनिर्भरता के तमाम रास्तों को सोचना होगा। वास्तव में हरित क्रांति के दौरान हमने ज्यादा खाद, ज्यादा पानी और कीटनाशकों के प्रयोग का रास्ता चुना था वो हमारी खाद्यान्न सुरक्षा को बरकरार नहीं रख पाया है। आज खेती में सतत विकास की जरूरत है जो जैविक खेती से संभव है जिसमें खेती के परंपरागत तरीकों को अपनाकर मिट्टी, पानी, बीज और पेड़ को सुरक्षा देकर लगातार अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। वर्तमान में हमारी विकास योजनाओं में मिट्टी संरक्षण के लिए कोई स्थान नहीं है। लेकिन मिट्टी वह आधार है जिस पर दुनिया की तमाम फसलें खड़ी होती है। हमें खेतों की उपजाऊ मिट्टी बचाने के लिए खेतों की मेड़बंदी के साथ-साथ रासायनिक खादों से भी परहेज करना होगा। अगर मनुष्य को रोटी की बजाय सिर्फ प्रोटीन, विटामिन, वसा की गोलियां दी जाये तो वह शीघ्र ही मर जायेगा इसी तरह मिट्टी को जैविक तत्वों की बजाय रासायनिक खादें ही दी जाये तो वह रेत में बदल जायेगी। एक सेंटीमीटर उपजाऊ मिट्टी बनाने में प्रकृति को कम से कम 400 वर्ष लगते हैं और हम रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग कर उसे बंजर बना रहे हैं। जल जीवन का आधार तत्व होता है इसका उपयोग पीने व सिंचाई के लिए किया जाता है हमने पानी की भयंकर लूट की है नदियों पर बड़े-बड़े बाँध बनाकर उपजाऊ भूमि को डुबोया है तथा शहरों को बिजली पहुँचाई है जबकि खेत अभी सूखे हैं। सिंचाई के साधन तालाब अब पुरानी बात हो गई है। हरित क्रांति के बाद हमने परंपरागत बीजों को बोना छोड़ दिया औंर ऐंसे बीज बोने लगे जिनके विषय में हमें नहीं पता कि वे किस मिट्टी में बोये जाते हैं तथा कैसी जलवायु में उगते हैं। ये उन्नत बीज निरंतर अच्छी उपज देने में सक्षम नहीं हैं। सड़कों, कारखानों और नगरीकरण के लिए वृक्षों को लगातार काटा जा रहा है। जिससे वारिश का आंकड़ा कम हुआ है तथा भूमि बंजर हो रही है। इससे खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट आ रही है। वृक्षारोपण के नाम पर फर्जी आंकड़े तथा यूकेलिप्टस के पेड़ हैं जो मिट्टी के लिए उपयोगी नहीं है। वास्तव में भविष्य की खाद्यान्न सुरक्षा के लिए हमें इन बातों पर गौर करना होंगा। तथा इस बात को धयान में रखना होगा कि खेती में सतत विकास के जरिए खाद्यान्न सुरक्षा व मँहगाई से छुटकारा पाया जा सकता है।
डॉ. सुनील शर्मा