संस्करण: 28अप्रेल-2008

1 मई- श्रम दिवस पर विशेष दशा और दिशा में उलझे बाल श्रमिक
एम.के.सिंह

बारह वर्षीय राजू रोज सुबह सात बजे उठता है, होटल पहुंचता है और दिनभर टेबिल साफ करने, पानी लाने, जूठी थालियां धोने में लगा रहता है। पढाई करने या दोस्तों के साथ खेलने की बजाए दिनभर में 20 से 30 रुपए कमा लेता है। इस बीच उसे मालिक के कोप का भी भागी बनना पडता है। उसकी जिंदगी इसी तरह से अविराम चल रही है। यहां तक की सप्ताह में कोई छुट्टी भी नहीं मिलती है। यह कहानी मात्र राजू की ही नहीं है, बल्कि राजू की तरह करोडों बच्चे अपने बचपन की बलि चढा रहे हैं। उनकी भावनाएं और संवेदनाएं दशा और दिशा में दबकर रह गई हैं।
भारत विकास के हर क्षेत्र में प्रगति कर रहा है, पर आजादी के छह दशक बाद भी बाल श्रमिकों की दशा पहले से बदतर हुई है। बच्चों का एक वर्ग कुपोषण तथा बीमारी का अभिशाप भोग रहा है तो दूसरा वर्ग पूंजीपतियों के जूते के नीचे दबा कराह रहा है। अल्पायु में ही इनके बचपन की कीमत लग जाती है तथा कागज के चंद टुकडों पर खरीद लिए जाते हैं। समय और परिस्थिति की चक्की में पिसते ये बच्चे कागज-कलम, स्लेट-पेंसिल, खिलौने आदि के स्थान पर पालिश-ब्रश, हथौडा, दरी बुनने के धागे सहज स्वीकार कर लेते हैं। भारत में कई उद्योग बाल मजदूरों की मेहनत एवं शोषण पध्दाति पर आधारित हैं। माचिस उद्योग, बीडी उद्योग, कांच उद्योग आदि में काम करने वाले बच्चों की संख्या लाखों में है। विश्व में लगभग 25 करोड से भी अधिक बाल मजदूर हैं।
भारत में जनगणना के आंकडों के अनुसार 1971 में बाल श्रमिकों की संख्या 10758985 थी जो 1981 में बढकर 13640870 हो गई। 1991 में यह यह संख्या 11285349 थी। वर्तमान में भारत में लगभग डेढ करोड बाल कामगार हैं। इनमें से दो लाख से ज्यादा घरेलू नौकर के तौर पर या फिर चाय की दुकानों, रेस्तरां, होटल और अन्य विश्राम स्थलों में काम करते हैं। सेवा दी चिल्ड्रेन संस्था के एक अधययन में कहा गया है कि बहुत से बाल कामगारों को भरपेट खाना नहीं मिलता और उनकी पिटाई की जाती है। आग से जलाया जाता है। दिल्ली में ही लगभग दस लाख बच्चे घरों या ढाबों में काम करते हैं। हैदराबाद में इनकी संख्या 40 हजार और कोलकाता में 50 हजार है। दिल्ली में काम कर रहे बच्चों में 99 प्रतिशत लडकियां हैं। इनमें बडी संख्या वेश्याओं के बच्चों की है जो गली-कूचों में कूडा बीनने व भीख मांगने में लगे हैं। यह अत्यंत हृदय विदारक किन्तु सत्य है कि बालक एवं बालिका श्रमिकों का यौन शोषण मालिकों, ठेकेदारों, एजेंटों, अपराधियों द्वारा किया जाता है। अधिकांश समस्याओं की तरह बाल मजदूरी की समस्या भी राष्ट्र की आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों से जुडी है। सामाजिक परिस्थितियों एवं आर्थिक विषमताओं से विवश होकर ही बाल श्रमिक कम मजदूरी के निम्न स्तर पर काम करते हैं। अगर इस समस्या की तह में जाएं तो पहला महत्वपूर्ण कारण सामने आता है वह है प्राथमिक शिक्षा। आजादी के बाद हमारे राष्ट्र के पथ प्रदर्शकों ने संविधान के सामने यह संकल्प दोहराया था कि संविधान के लागू होने के 10 सालों के अंदर 14 साल अथवा उससे कम उम्र के सभी बच्चों के लिए मुफ्त व अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का बंदोबस्त कर दिया जाएगा, पर आज तक इस पर अमल तो दूर इसके पास तक भी नहीं पहुंचा जा सका है।
भारत में दस लाख बच्चे प्राथमिक शिक्षा पूरी करने पूर्व ही स्कूल छोड देते हैं। स्कूल त्यागने वालों में दलित एवं आदिवासी बच्चों का प्रतिशत भी सर्वाधिक है। सामान्य बच्चों के मुकाबले 17 प्रतिशत वेश्याओं के बच्चे स्कूल छोडते हैं। प्राथमिक शिक्षा की दृष्टि से उडीसा, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश सबसे अधिक पिछडे हैं। आजादी के पश्चात बाल श्रमिकों की समस्या के समाधान के लिए कानूनी प्रयास किए गए हैं। संविधान की धारा 24 के अनुसार 14 वर्ष से कम उम्र के किसी भी बच्चे को कारखानों अथवा खानों या किसी ऐसे काम में नहीं लगाया जा सकता है जो जोखिम भरा हो। संविधान की धारा 39 में बच्चों के शोषण तथा दमन के विरुध्द संरक्षण की व्यवस्था की गई है। फैक्ट्री कानून 1952, खदान कानून 1952, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, वितरण संरक्षण नियम 1971, बीडी व सिगार श्रमिक कानून 1961 तथा एंप्रेटिशशिप नियम 1962 में बाल मजदूरों के हित में अनेक प्रावधान हैं। 1986 में बाल श्रमिक अधिनियम पारित किया गया, जिसके तहत बीडी उद्योग, कालीन उद्योग, माचिस उद्योग, सीमेंट उद्योग, कपडा छपाई, चमडा रेजिंग तथा अभ्रक उद्योग में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के काम करने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई। उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद 10 अक्टूबर 2006 से बालश्रम पर कानूनी रोक लगा दी गई लेकिन दो साल बाद भी स्थिति जस की तस है। सरकार द्वारा बनाए गए ये कानून भी इस समस्या का निदान करने में असफल रहे हैं और न ही बाल श्रमिकों के शोषण को रोक पाए हैं।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग बालश्रम कानून को नाकाफी मानता है। आयोग का कहना है कि इस कानून से सभी प्रकार के बालश्रम को खत्म करना मुश्किल है। असंगठित क्षेष और खेती के कामों में बाल श्रमिकों की संख्या में इजाफा हो रहा है। लिहाजा आयोग इस कानून की जगह नया कानून बनाने की वकालत कर रहा है। इसके लिए कार्यसमिति भी बना दी गई है। श्रम कल्याण् के लिए केंद्र सरकार करोडों रुपए खर्च कर रही है। 7वीं पंचवर्षीय योजना में 5 करोड, 8वीं में 15 करोड, 9वीं में 249 करोड, 10वीं में 602 और 11वीं में 377 करोड रुपए का प्रवधान किया गया। बाल श्रमिकों के उत्थान के लिए लगभग 1800 बाल श्रमिक विद्यालय खोले गए हैं। फिर भी बाल श्रमिकों की संख्या प्रतिदिन बढती ही जा रही है।
एम.के.सिंह