संस्करण: 28अप्रेल-2008

घटता औद्योगिक उत्पादन और रोजगार
प्रमोद भार्गव

घटते औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े सामने आने के साथ सूचना तकनीक, कम्प्यूटर और निर्माण के साथ निर्यात के क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर रोजगार घटने के संकेत मिलने लगे हैं। पूंजीवादी अमेरिकी अर्थव्यवस्था की पिछलग्गू बनी भारतीय अर्थव्यवस्था का यही हश्र होना था। ग्यारहवीं योजना की सरंचना का आधार बढ़ती विकास दर की संभावनाओं को लेकर रची गई थी। योजनाकारों को उम्मीद थी कि अगली योजना के अंतिम चरण में दस प्रतिशत विकास दर का लक्ष्य आसानी से प्राप्त कर लिया जाएगा। लेकिन जो आंकड़े और सर्वेक्षण सामने आ हैं, वे दर्शाते हैं कि अर्थव्यवस्था ढोल में पोल साबित होने जा रही है। औद्योगिक उत्पादनों में जिस तेजी से गिरावट दर्ज की गई है उतनी ही तेजी से रोजगार के अवसर आधुनिक क्षेत्रों में घटने के संकेत हैं। ऐसे में भी कृषि को 'घाटे का सौदा न बनी रहे' इस संकट से उबारने की बजाय उसे कर्ज माफी और नये कर्ज देने के कुचक्र में उलझा दिया है। इससे कृषि की कोई स्वच्छ तस्वीर बनने वाली नहीं है। नीतिगत फैसलों के जरिए खुदरा व्यापार को जिस तरह से बड़ी कंपनियो के एकाधिकार का हिस्सा बनाए जाने की कोशिशें चल रही हैं उससे इस क्षेत्र में भी बड़ी तादात में रोजगार घटेंगे।
पिछले एक-डेढ़ दशक से भारतीय अर्थव्यवस्था की कृत्रिम तौर से पेश की जा रही गुलाबी तस्वीर फीकी पड़ने लगी है। औद्योगिक उत्पादन का जो सूचकांक जनवरी 2007 में 11.6 प्रतिशत था वह जनवरी 2008 में गिरकर 5.3 की वृद्धि दर पर अटक गया। यदि वित्तीय साल 2006-07 के प्रत्येक माह के औद्योगिक उत्पादन की पड़ताल की जाए तो उसकी तुलना में 2007-08 के प्रत्येक माह में वृद्धि दर घाटे के क्रम में ही रही है। इससे साफ होता है कि औद्योगिक उत्पादन में विकास की दर घटती जा रही है। यदि यही सिलसिला जारी रहा तो आर्थिक विकास की दर 8-10 फीसदी के बीच बनाए रखना संभव नहीं है। यह दर तभी संभव है जब औद्योगिक, वाणिज्यिक, निर्यात, खुदरा व्यापार और सेवा क्षेत्र में विस्तार के साथ निरंतर गतिशीलता बनी रहे।
औद्योगिक प्रगति को औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक (आईआईपी) से नापा जाता है। इनकी परस्पर अनुकूल सहभागिता आर्थिक विकास की वृद्धि दर दर्शाती है। लेकिन एक स्थापित मानव संसाधन सलाहकार संस्था के सर्वे से जो हकीकत सामने आई है उसने स्पष्ट किया है कि सूचना तकनीक, उद्योग और विनिर्माण के क्षेत्रों में रफ्तार शिथिल पड़ गई है इसलिए नये रोजगार उपलब्ध कराए जाने के अवसर बड़ी संख्या में घटेंगे। मुक्त बाजार व्यवस्था और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन के साथ भारतीय व्यवसाय की पारंपरिक व्यवस्थाओं को ढकोसला साबित करते हुए ढांचागत संरचना विकसित किए जाने पर ज्यादा जोर दिया गया। सरकारी हस्तक्षेप क मार्फत गैर ढांचागत व्यवस्थाओं को छिन्न-भिन्न करने के कुत्सित प्रयास भी जारी रखे गए। खुदरा व्यापार में बेजा दखल और लघु व कुटीर उद्योगों की पीठ पर पूंजीपतियों के उद्योगों की स्थापना व व्यापार का एकाधिकार इसके उदाहरण हैं। यही कारण रहे कि उत्पादन व रोजगार के क्षेत्र में हालात बेहतर होने की बजाय और खस्ताहाल हुए। मसलन विद्युत के क्षेत्र में जो वृद्धि दर 8.3 फीसदी थी, उसमें पांच प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। उत्खनन के क्षेत्र में यह गिरावट 6 प्रतिशत तक है। पूंजीगत सामान के क्षेत्र में हालात बेहद चिंताजनक हैं।
ये हालात एक ओर निवेश में कमी को दर्शाते हैं, वहीं दूसरी ओर नौकरियों में नये सृजन के अवसरों को नकारते हैं। सर्वेक्षण पर विश्वास करें तो कई बड़ी कम्प्यूटर और सूचना तकनीक कंपनियां इस साल शैक्षिक संस्थानों में परिसर चयन करने नहीं जा रही हैं। इस कारण अभियांत्रिकी, प्रबंधन व वाणिज्य स्नातकों में बेरोजगारी बढ़ेगी। दूसरी तरफ बंगलूर स्थित कंपनियों ने अभियांत्रिकियों के औसत वेतनमान तीन प्रतिशत घटाने का निर्णय भी ले लिया है। प्रबंधन परामर्श फर्म जिनोव के एक सर्वेक्षण ने यह खुलासा किया है कि सॉफ्टवेयर कंपनियां कनिष्ठ स्तर पर और अधिक लोगों को रोजगार देने जा रही हैं इसलिए वेतनमान घटा रही हैं, ऐसा सर्वेक्षण का निष्कर्ष है। औसत वेतनमान में गिरावट को वेतन स्तर में स्थिरता के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। हो सकता है कंपनियां ऐसा अपने परिचालन के विस्तार और औसत लागत को नियंत्रण में रखने की दृष्टि से कर रही हों। वेतनमान यदि नियंत्रित हो रहे हैं तो यह एक अच्छी खबर है क्योंकि उच्च वेतनमान पूंजीवादी-भोगवादी संस्कृति को बढ़ावा देने के साथ पर्यावरण को दूषित करने का कारक भी बन रहे हैं।
सूचना तकनीक और कम्प्यूटर उद्योग को हमने रोजगार के अवसर बड़ी संख्या में उपलब्ध कराने का कारक मान लिया था, यह हमारा भ्रम था और हम दिग्भ्रिमित बने रहें यह कंपनियों की कुटिल चालाकी। सूचना तकनीक और कम्प्यूटर कंपनियां इसलिए परवान चढ़ीं क्योंकि इन्हें केन्द्र और राज्य स्तर पर भरपूर संरक्षण तो मिला ही इनकी खरीद के लिए करोड़ों-अरबों रुपयों के बजट प्रावधान भी रखे गए और कम्प्यूटर प्रशिक्षण से भी लोगों को जोड़ा गया। अंतत: कम्प्यूटर तकनीक सरकारी व निजी संस्थानों में चरमोत्कर्ष पर पहुंच गई। उपलब्धि की कोई भी सौगात चरम पर पहुंचने के बाद ठहराव धारण कर लेती है। अब कम्प्यूटर तकनीक भी इसी ठहराव की गिरफ्त में है। वैसे भी यह तकनीक उत्पादन की बजाय प्रबंधन कौशल से जुड़ी हुई थी इसलिए इसके दूरगामी परिणाम यही निकलने थे और इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर घटने ही थे ?
उत्पादन और रोजगार के अवसर घटने की आशंकाओं की वाणिज्य मंत्री कमलनाथ ने भी पुष्टि की है। उनका मानना है कि भारतीय निर्यात में कमी होने के कारण 20 लाख रोजगार घटेंगे। इसके विपरीत भारतीय उद्योग संगठनों का दावा है कि वाणिज्य मंत्री का आंकड़ा गलत है, 80 लाख लोग बेरोजगार होंगे। ऐसी भयावह शंकाओं के बावजूद हम बड़े और उत्पादन-रहित उद्योगों के पक्षधरता की शर्त पर लघु, कुटीर, कृषि और अन्य विविध किस्मों के घरेलू उद्योग-धंधों को उजाड़ते चले जा रहे हैं। मानवीय श्रम आधारित गांधवादी आग्रह व प्रांसगिकता को उद्योगों से बेदखल करते जा रहे हैं, जबकि हमें एक बड़ी आबादी वाले देश में मानवश्रम, मशीनी दक्षता और कम्प्यूटर के प्रबंध कौशल के बीच एक ऐसा संतुलन बनाने की जरुरत थी जो परस्पर जुड़े रहकर एक दूसरे के हित साधक बने रहें।
कृषि संकट के बुनियादी कारणों की पड़ताल किए जाने के बजाय हमने सतही कारणों को महत्व दिया और किसान को ऋणमुक्ति व नये ऋण की उपलब्धता के मृगतृष्णा के भ्रम में डाल दिया। यदि हम वाकई किसान के हितचिंतक बनना चाहते हैं तो किसान की पेंशनभोगियों की तरह नियमित आय सुनिश्चित की जाए। खेत में खड़ी फसल की उत्कृष्टता एवं पैदावार की बढ़त, खाद, पानी व बिजली की बुनियादी जरुरतों की समयबद्ध उपलब्धता से जुड़ी है। इनकी उपलब्धता के अभाव में फसल तो फसल किसान की हाड़मांस की काया भी सूखती चली जाती है। इसलिए खेती को खाद, पानी व बिजली की सुलभता तो प्रदाय हो ही, इनकी निर्भरता स्थायी न रहे, इसलिए प्रकृति से तादात्म्य स्थापित किया जाए। कृषि यदि प्रकृति से जुड़ती है तो दुग्ध उत्पादन से भी जुड़ेगी। दूध उत्पादन से किसान जुड़ा रहेगा तो दूध के नगदीकरण से भी जुड़ा रहेगा। ऐसे में उसकी साहूकारों पर कर्ज की निर्भरता धीरे-धीरे तिरोहित होगी। वैसे भी देखा गया है कि जिन-जिन क्षेत्रों में दुग्ध उत्पादक समितियों की व्यापक संरचना है, वहां-वहां किसानों की आत्महत्यायें देखने में नहीं आई हैं और वे कमोवेश ऋण ग्रस्तता से भी मुक्त हैं। ग्रामीण, रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर पलायन न करें इसके लिए ग्रामीण स्तर पर ही कृषि उत्पादनों को प्रसंस्करित किए जाने के सयंत्र भी लगाए जाने जरुरी हैं।
यदि उद्योग और रोजगार को गांधीवादी श्रम आधारित अवधारणा से जोड़ा जाता है तो विकास के कथित आंकड़े निवेशकों और रोजगारधारियों को झकझोरेंगे नहीं। विश्वव्यापी मंदी भी भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने में अक्षम रहेगी। लेकिन सोच को नीतिगत स्वरूप में बदलने के लिए सरकार को पूंजीवादी सोच की दुविधा और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की पूंछ पकड़े रहने की मानसिकता से भी निजात पानी होगी। भारत के नीति निर्माताओं को यह सोचना चाहिए कि सांस्कृतिक बहुलता वाले इस देश में विशाल आबादी के जीविकोपार्जन के साधन स्थानीयता से जुड़े रहे हैं, इस नाते लघु, कुटीर व कृषि उद्योगों से जुड़ी विविध उत्पादकता तो है ही जल, जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधन मानव-जीवन के लिए वरदान बने रहे हैं, इसके लिए इन्हें अक्षुण्ण बनाए रखने की सांस्कृतिक-व्यावहाकिर समझ भी भारतीय ज्ञान परंपरा में है। यदि ऐसा संभव होता है तो न उत्पादन घटेगा और न ही रोजगार !
प्रमोद भार्गव