संस्करण: 28अप्रेल-2008

राख का पानी पीने, पानी को कैद और पलायन को मज़बूर : बुंदेलखण्ड
राजेन्द्र श्रीवास्तव

बुन्देलखण्ड का भाग चाहे उत्तर प्रदेश का हो या मध्यप्रदेश का सभी जगह सूखे खेत और सूनसान गांव नज़र आते हैं। अरहर, गेहूं और सरसों के खेत सूखे पड़े हैं। पाले के बाद रही सही फसल भी बर्बाद हो चुकी है। बुंदेलखण्ड का किसान सूखा, कर्ज और भुखमरी के चलते बदहाल हो चुका है। गांव के बाहर खेतों की जमीन चटकती नज़र आती है। गांवों में ज्यादातर लोग बाहर जा चुके है। बूढ़े और बच्चों की असहाय आबादी पीछे छूट गई है। जो भूख और भूखमरी से संघर्ष कर रही है किसान अपनी जमीन औने-पौने दामों में बेच रहे हैं। किसानों के आगे बंजर होते खेतों के बाद जिंदा रहने का कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा बस एक ही दिशा दिखती है पलायन ! झांसी और महोबा रेलवे स्टेशन से 3-4 माह में 3 लाख से ज्यादा लोगों ने पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र के टिकिट बिके है। बांदा से 20 कि.मी. दूर बसा पंढुई गांव में कई किसान कर्ज के रहते खुदकुशी कर चुके हैं। यहाँ गांव के एक कोने में दलित बस्ती की एक बच्ची प्रभा से पुछा तब कुरेदने पर वह बोली- रोज-रोज खाना खाने को नहीं मिलता है। अम्मा चूल्हे की राख को गरम पानी में घोलकर कपड़े से छान देती है। सुबह से वही पिया है।'' उरई से राठ का रोड़ हो, या बांदा, झांसी-जालौन का रास्ता सभी जगह बुन्देलों की जमीन से पलायन बढ़ रहा है बचे लोग भूख से संघर्ष कर रहे हैं यहाँ पिछले चार साल से लगातार सूखे की चपेट में लोग हैं।
मध्यप्रदेश का टीकमगढ़, सागर, छतरपुर, पन्ना, दतिया, दमोह में लोगों को पानी कई-कई किलोमीटर दूर से लाना पड़ रहा है। स्थिति तो यह बनी है कि पानी की एवज में लोग कोई भी कीमत देने को तैयार हैं। पानी ढोने के लिए ट्रैक्टर, बैलगाड़ी, जीप से लेकर मारूति तक का उपयोग हो रहा है। टीकमगढ़ के पुलिस अधीक्षक अनुराग कुमार का कहना है कि पानी की समस्या के कारण तनाव की स्थिति बन गई है। इससे बचने के लिये ही उन्होंने टैंकरों के साथ दो-दो नगर सेना के जवानों की तैनाती की है। टीकमगढ़ की तरह अन्य जिलों की भी स्थिति ऐसी ही है। टीकमगढ़ के पानी के मुख्य स्त्रोत सूख चुके है नल में पानी सात दिन में एक बार बड़ी मुश्किल से आता है। नगर पालिका ने लोगों को पानी मिले इस लिये टैंकरों का इंतजाम किया है। हालात यह है कि जहाँ भी टैंकर पहुँचता है लोग लूट लेते हैं। इतना ही नहीं मार-पीट की नौबत भी आई है। शहर का प्रमुख तालाब महेन्द्र सागर सूख चुका है। एक बावड़ी खुदवाई उस पर लोग कब्जा न कर लेवें प्रशासन ने पुलिस बल तैनात कर रखा है जिससे पानी की लूट न हो सके। टीकमगढ़ के करमौरा गांव में मोहन यादव 75 वर्षीय मौत का इंतजार कर रहा है पूरे परिवार के लोग पलायन कर गये। वह पड़ौसियों से मांग-मांग कर खाना खाते शर्मिन्दा हो गया है। उसने आत्महत्या करने की कोशिश भी की। यह क्षेत्र दो दशकों से सूखे और अपर्याप्त वर्षा की चपेट में है इस वर्ष म.प्र. में 48 में से 39 जिले अपर्याप्त वर्षा और सूखे की चपेट में हैं। हालात यह है कि पानी बिकने लगा है। यहाँ के निकटवर्ती गांव छूरा की झीतबाई कहती है कि ''हमने सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी दिन हमें पानी खरीद कर पीना पड़ेगा।'' गांव के पास स्थित एक कुएं के मालिक 50 रुपये में दो लोटा पानी देता है। कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है, मज़बूरन पानी खरीदना पड़ता है। हिमारपुरा गांव में 8 हैंडपंपों में से एक भी काम नहीं करता। यहाँ के लोग केवट जाति के हैं पिछले चार वर्षों से लगातार सूखे के कारण क्षेत्र की नदियां सूख गई हैं। इन लोगों को आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। परिणामस्वरूप 60 प्रतिशत लोग पलायन कर चुके हैं। जतारा लाक के करमौरा गांव के 600 परिवारों में से 400 परिवार अपने घर छोड़कर जा चुके हैं। वे हरियाणा, दिल्ली.उ.प्र. में मेहनत करने को मज़बूर है। इसी प्रकार बैरबार खास में 894 परिवारों को रोजगार गारंटी योजना की आवश्यकता थी, लेकिन यहाँ सिर्फ़ 30 परिवारों को ही इसका लाभ मिला। योजना के अनुसार हर परिवार को दो साल में दो सौ दिन तक रोजगार दिया जाना था। लेकिन वर्ष 2006-07 के दौरान करमौरा गांव में 547 परिवारों में से केवल एक को 100 दिनों तक रोजगार मिला। ज्यादातर परिवारों को 100 दिन के बजाय मात्र 30-40 दिन का रोजगार ही मिला है। इस अपर्याप्त वर्षा और सूखे के कारण आदमी तो आदमी जानवरों की स्थिति भी बदहाल हो गई है। पानी के अभाव में नमक की कमी को पूरा करने के लिये बन्दर सड़कों को चाट रहे हैं। जंगलों में बिखरे कंकाल बताते है कि सैकड़ों बंदरों की मौत हो चुकी है। वन विभाग भी इसे स्वीकार करता है। जब पानी की कमी होती है, तब इंसान तो ओ.आर.एस. व अन्य दवाईयों का सेवन कर लेता है पर यहाँ बंदर सड़कों को चाट कर नमक की कमी को पूरा कर रहे है। जंगलों में पानी के अभाव से जानवर बस्तियों की ओर रूख कर रहे हैं, जहाँ पानी की तलाश उन्हें मौत दे रही है। यह वाकया ग्वालियर से सतना और कानपुर से सागर राष्ट्रीय राजमार्ग पर सड़कों पर देखा जा सकता है, इन मार्गों में सैकड़ों बंदरों के क्षत-विक्षत अवशेष बिखरे पड़े हैं। लोगों का कहना है कि इस बार जंगल में बंदरों को खाने की चीजों का अभाव है, इस कारण वह महुए का अधिक सेवन कर रहे हैं। चूंकि महुएं में नशे का असर होता है बंदर भी नशे में चूर होकर जब मुख्य मार्गों पर आकर सड़कों को चाटता है तभी दुर्घटनाओं का शिकार हो जाता है। अफसोस है भाजपा की सरकार इन रामभक्तों को बचाने का प्रयास नहीं कर रही है। जबकि बंदरों की मौत हज़ारों के रूप में हो चुकी है।
छतरपुर में भी बड़ा बुरा हाल है, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना के गरीबी रेखा के कार्ड वास्तविक हकदारों के न बनकर दबंगो और साहूकारों के बने है जिनके पास कई एकड़ जमीनें 3-3, 4-4 ट्रैक्टर के मालिक है वह इसके कार्ड बनाकर गरीबों का हक छीन रहे है जिसकी चर्चा शासन तक भी पहुँची है। किन्तु सुधार नहीं हुआ क्योंकि प्रशासन भ्रष्ट है। खजुराहों में भी पानी की कमी को देखा गया है यहा से कुछ दूरी पर खेतों में लोगों ने पम्प के माधयम से 30-41 हजार रुपयों में पानी बेचकर कमाई की है यहाँ के बड़े-बड़े होटलों की 3-3 लाख का पानी होटलों में इस वर्ष खरीदना पड़ा है। 10 रुपये की बाल्टी भरा पानी मिल रहा है।
छतरपुर जिले के लौंड़ी की चौरसिया बस्ती में रहने वाले छेदीलाल चौरसिया का कहना है कि वह 5 साल पहले के पान उत्पादन के अपने पारम्परिक पेशे के जरिए 60 डेसीमल जमीन के छोटे से टुकड़े से 50 हजार रुपये कमा लिया करते थे। परन्तु पर्यावरण के तेज़ी से बढ़ते तापमान और 4 सालों से लगातार सूखे ने छेदीलाल सहित बुन्देलखण्ड में छतरपुर जिले के 4 हजार पान लगाकर होठों को लाल करने वाली पूरी जमात के अस्तित्व पर वार कर दिया है। 3 हजार लोग इस काम को छोड़ चुके हैं। हर घर से 1-2 सदस्य पलायन कर चुका है। महाराजपुरा पान मंडी में यहाँ भी 60 प्रतिशत परिवारों ने इस काम को छोड़ दिया है। वह मज़दूरी जैसे विकल्प की खोज में पलायन कर चुके हैं। वर्ष 2002 में यहाँ पान 200 सौ रुपये प्रति किलो बिकता था, अब 60 से 70 रुपये प्रति किलो बिकता है। सूखे, बीमारी और पूंजीगत सहयोग के अभाव में यहाँ का पान बाजार में नहीं पहुँच पा रहा है। जबकि बाहरी पानों ने अपना बाज़ार बना लिया है। इस सूखे की मार से जहाँ मनुष्य और जानवर त्रस्त है वहीं पानी भी कराहता नज़र आ रहा है।

राजेन्द्र श्रीवास्तव