संस्करण: 28अप्रेल-2008

हॉकी में भ्रष्टाचार व गिल की जिद
अंजनी कुमार झा

भ्रष्टाचार रिश्वत और भाई-भतीजेवाद के चरम पर पहुँचने के साथ स्टिंग ऑपरेशन के जरिये आई एच एफ के महासचिव को रंगे हाथ पकड़ने पर राष्ट्रीय खेल पर हम गौरव नहीं कर सकते। रिश्वत लेकर चयन हो, तो हम ओलंपिक क्या प्रक्रिया से भी बाहर ही रहेंगे। लगातार हार की श्रृंखला में हम वर्ष 2006 के मोंशेग्लैडबैरव विश्व कप में 11 वें स्थान पर रहे। विश्व कप, ओलंपिक में हम चौथे स्थान पर भी डेढ़ दशक से नहीं हैं।
भारतीय हॉकी महासंघ के महासचिव के. ज्योतिकुमारन ने अजलान शाह हॉकी प्रतियोगिता के लिए पांच लाख रुपये की मांग खिलाड़ी से की। दो लाख अग्रिम देकर सूची में नाम दर्ज़ हो गया। चैनल की खोजपरक रिपोर्ट व बाइट से शर्मनाक परिदृश्य देख पूरा देश स्तब्ध है। साउंड व पिक्चर के कारण इसे झुठलाया नहीं जा सकता। गिल की मनमानी से पहले ही हॉकी संघ स्टिक के बदले पूर्वाग्रह का शिकार हो चुका है। फेडरेशन के अधयक्ष के.पी. एस. गिल को अब नवनियुक्त खेल राज्यमंत्री गिल, ओलंपिक संघ घेर रहा है। उनसे इस्तीफे को कहा गया, पर भारत की करारी हार के बाद जब इस्तीफा नहीं दिया तो चयन के बदले धन के खुलासे के बाद भी गिल पल्ला झाड़ लेंगे। नैतिकता व कर्तव्य जब बचा ही नहीं तो अंतरात्मा की बात बेमानी है। अब राजनीतिक परिदृश्य से भी ऐसे भावनात्मक शब्दों का लोप हो गया। अप्रत्यक्ष रूप से ज्योति कुमारन का पक्ष लेने के कारण बुरी तरह घिरे गिल ने जांच समिति गठित कर दी। बताते चलें कि जांच आयोग की रिपोर्ट कितने सालों बाद आती है और क्या सच्चाई रहती हैं, यह श्रीकृष्ण आयोग, नानावती आयोग की रिपोर्ट व कार्यकलापों से पता चलता है। गिल पर हमेशा चयन में दखलंदाजी, योग्य ट्रेनरों की उपेक्षा, वरिष्ठ खिलाड़ियों को अपमानित करने का आरोप लगता रहा है।संताप व आश्चर्य हो रहा है कि भारतीय हॉकी संघ की लापरवाही पर नकेल डालने के लिए अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ को कड़ा तेवर अपनाना पड़ा। उसने कहा कि भारतीय हॉकी प्रोमोशनल प्लान को ठीक से लागू नहीं कर रहा है। यही स्थिति रही तो आगामी विश्व कप के आयोजन का दायित्व भारत से वापस लिया जा सकता है। हॉकी के विकास पर विमर्श, रणनीति, उन्नत तकनीक आदि पर चर्चा की फुर्सत भाई-भतीजावाद और रिश्वतखोरी से मिले तभी तो सकारात्मक सोच पर ये गौर कर पायेंगे। नये खेलमंत्री मनोहर सिंह गिल ने पुरुष हॉकी को नया जीवन दान देते हुए इसे सरकार की 'प्राथमिक खेलों की श्रेणी' में शामिल करने का निर्णय किया है। इससे हॉकी के पुनरुध्दार की उम्मीदें जगी हैं। गत वर्ष जून में प्राथमिक सूची से यह 'राष्ट्रीय गौरव' बाहर था। निरंतर गर्त में जा रहे राष्ट्रीय खेल को राष्ट्रीय शर्म खेल न बनने देने के लिए आई.पी.एस. गिल की छुट्टी के साथ इसे पुनर्जीवित करने के लिए कई कठोर निर्णय लेने चाहिए। खेल मंत्री श्री गिल में यह अदम्य क्षमता है, वे ही अहिल्या को शाप से मुक्ति के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तरह बाधा तोड़ हॉकी को राष्ट्रीय गौरव का पुन: प्रतीक बना सकते हैं। गिरते स्तर और लगातार राष्ट्रीय खेल की अस्मिता पर चोट पहुँचाने का मुद्दा संसद में भी गुंजा। उत्तेजित सांसदों ने महासंघ पर प्रतिबंध, गिल के इस्तीफे के साथ फाँसी तक की मांग कर डाली। आत्ममंथन और समीक्षा के दौर में हॉकी के बलात्कारियों को नहीं बख्शने की अपील की जा रही है। चक दे इंडिया के स्याह होते रंग को बदरंग तथाकथित रक्षकों ने ही की।
उल्लेखनीय है कि लोन अयप्पा, गगन अजीत सिंह, दीपक ठाकुर जैसे दर्जनों शानदार खिलाड़ी आईएचएफ की सियासत की बलि चढ़ गये। पूर्व ओलंपियन बलजीत सिंह ढिल्लो के मुताबिक, गत 14 वर्षों में गिल एंड कंपनी ने भारतीय हॉकी का बेड़ा गर्क कर दिया है। अकेले ज्योतिकुमारन को बॉय-बॉय करने से कुछ नहीं होगा। पूर्व ओलंपियन असलम शेर खान, अर्जुन हलप्पा, धनराज पिल्ले जैसे अनेक खिलाड़ी लंबे काल से गिल की तानाशाही और भ्रष्टाचार की शिकायतें कर रहे हैं। देश की धरोहर खिलाड़ी हैं, पर उनका ही सम्मान कहीं नहीं हो रहा है, किंतु खिलाड़ी के नाम पर सब कुछ हो रहा है। गैर खिलाड़ी संघ के अधयक्ष के अतिरिक्त, कई पदों पर उनके उत्थान के लिए होते हैं। खेल व खिलाड़ी से दूर-दूर तक संबंध न रखने वाले इसकी दिशा चयन प्रक्रिया, स्थल आदि तय करते हैं। नौकरशाहों व नेताओं के चंगुल से बचाये बिन 'राष्ट्रीय गौरव' मिलना कठिन है। क्रिकेट में हो रहे धनवर्षा से हॉकी के खिलाड़ियों में नैतिक साहस का तेज़ी से -हास हो रहा है। लोकप्रियता, भौतिक सुख, क्रिकेटरों की भांति न मिलना उन्हें कुंठित कर रहा है। पुरुष वर्ग की भांति महिला हॉकी भी फिसड्डी की सूची में शामिल हो गई। विश्व में 12 वीं रैंकिंग की भारतीय टीम को टूर्नामेंट में बने रहने के लिए 23वीं रैंकिंग के बेल्जियम के खिलाफ़ हर सूरत में जीत हासिल करनी थी, किंतु वह औंधो मुंह दूसरे हाफ में गिर गई। जाहिर है, खेल में अनाप-शनाप पैसों ने नौकरशाहों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद भी रास्ते खोल दिये। अच्छी जगह न मिलने पर एडजस्टमेंट के लिए खेल महासंघ, ओलंपिक संघ पर कब्जा कर प्रचार की खुराक नेता पाते हैं। ऐसे में खेल के प्रति प्रतिबध्दता न होने के कारण ऐसी विसंगतियाँ पैदा हो रही हैं। धन के दुरुपयोग का ही नतीजा है कि खेल राज्यमंत्री एम.एस. गिल के फरमान के बाद भी आई.एच. एफ. के अधयक्ष के.पी. एस.गिल ने इस्तीफा देने से इंकार कर दिया। उल्टे पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी ने केंद्रीय मंत्री से इस्तीफे की मांग कर खेल जगत को सन्न कर दिया। गिल के अड़ियल रवैये का ही नतीजा है कि हॉकी का उनके कार्यकाल में सबसे खराब प्रदर्शन रहा। वर्ष 1994 के सिडनी विश्व कप में भारत पांचवे, 1995 के बर्लिन चैम्पियन ट्राफी में पांचवें, 1996 के अटलांटा ओलंपिक में आठवें, 2002 व 2004 के ओलंपिक में सातवें, वर्ष 2006 के विश्वकप में ग्यारहवें पायदान पर रहा। गिल की उपलब्धि बस यही है कि वे तानाशाह, निरंकुश, खिलाड़ियों से दूर रहने वाले अफसर हैं। वर्षों से धनराज पिल्ले, अशोक कुमार नेगी जैसे वरिष्ठ खिलाड़ी उत्कृष्ट प्लेयर के हाथ नेतृत्व की मांग करते आये हैं। अगर ऐसा हुआ तो लूट रूक जायेगी, जिसे नेता-अफसर कदापि नहीं चाहेंगे।... तो फिर 'राष्ट्रीय गौरव' हम कैसे कर पायेंगे।
अंजनी कुमार झा