संस्करण: 28अप्रेल-2008

राजनीति व भ्रष्टाचार की शिकार " नरेगा "
सुनील अमर

ग्रामीण बेरोजगारों के लिए बहुप्रचारित राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना अपने तीसरे और अन्तिम चरण में गत एक अप्रैल से पूरे देश में लागू हो गई है। जहाँ तक उत्तर प्रदेश की बात है 'नरेगा' नामक इस योजना ने व्यावहारिक खामियों के चलते बेरोजगारों को निराश ही किया है। शुध्द रूप से शारीरिक श्रम आधारित होने के कारण भी इस योजना से पढ़े-लिखे या कथित उच्च वर्ण के बेरोजगारों का जुड़ाव नहीं हो पा रहा है। दूसरी तरफ, जिस आपाधापी और बिना तैयारी के योजना क्रियान्वित की गई उससे न सिर्फ श्रमिकों का उत्पीड़न हो रहा है बल्कि योजना के बारे में गलतफहमी भी फैल रही है। प्रदेश सरकार ने केन्द्र को स्पष्ट कर दिया है कि पर्याप्त धनराशि उपलब्ध न कराए जाने के कारण 21 जिलों में नरेगा के कार्य बन्द करा दिए जायेंगे।
कुछ तकनीकी प्रावधानों को यदि छोड़ दिया जाय तो नरेगा नामक इस रोजगार योजना ने वास्तव में अपनी पूर्ववर्ती जवाहर रोजगार योजना का स्थान ले लिया है तथा लगभग वही फण्ड भी इसमें इस्तेमाल हो रहा हैं प्रदेश में प्रथम चरण में जिन जनपदों में यह योजना लागू की गई थी उनकी खामियों से कोई सबक न लेते हुए दूसरा और अब तीसरा चरण भी शुरू कर दिया गया है। अब स्थिति यह है कि जहाँ जॉब कार्ड बन गये हैं वहाँ काम नहीं है और जहाँ काम है वहाँ जॉब कार्ड बनाने में व्यापक धाँधली की गई है। नरेगा के उद्देश्य, क्रियान्वयन तथा प्रावधानों के बारे में बेरोजगारों को न तो जानकारी दी गई और न उन्हें जागरूक बनाने का प्रयास किया गया। इसका नतीजा यह है कि ग्राम प्रधान व पंचायत सेक्रेटरी जिस तरह चाहते हैं, श्रमिकों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
जनपद अम्बेडकरनगर के विकास खण्ड-कटेहरी की ग्रामसभा बंदनडीह में लगभग चार माह पूर्व नरेगा के तहत मजदूरों ने तालाब की खुदाई की। दिसम्बर के आखिरी सप्ताह में शुरू तालाब खुदाई जनवरी भर चली। लेकिन भुगतान अभी तक नहीं किया गया है। प्रधान का कहना है कि विकास खण्ड कार्यालय के बाबू नरेगा का धान देने के एवज में एडवान्स कमीशन मांगते हैं। इसलिए मजदूरी नहीं दी जा रही है। जिलाधिकारी अजय उपाधयाय ने इस सम्बन्ध में मुख्य विकास अधिकारी को जाँच करने हेतु कहा है। रोज कुऑं खोदकर पानी पीने वाले मजदूरों के समक्ष अब रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है।
उधार नरेगा में की जा रही धांधालियों के खिलाफ अम्बेडकरनगर मुख्यालय पर प्रदर्शन कर रहे इंकलाबी नौजवान सभा के उ0प्र0 अधयक्ष बाल मुकुन्द धारिया तथा खेत मजदूर सभा के संयोजक राम भरोस ने इन पंक्तियों के लेखक से कहा कि इस जनपद के ऊँचे गाँव, बेवाना, सिकन्दरपुर, खुलासपुर, रामनगर, अरिया व भुवनपुर आदि दर्जनों गाँव में जॉब कार्ड बनाने व मजदूरी का भुगतान करने में न सिर्फ बड़े पैमाने पर धांधाली है बल्कि तालाबों की खुदाई ट्रैक्टर या जे.सी.बी. मशीनों से कराई जा रही है।
नरेगा में धांधाली की यह कहानी सिर्फ अम्बेडकरनगर की ही नहीं है। शासन ने गम्भीर शिकायतों वाले चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर, बाँदा, उन्नाव, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, हरदोई, बाराबंकी, आजमगढ़, मिर्जापुर, सोनभद्र व कौशाम्बी आदि जनपदों में जाँच कराने का निश्चय किया। मिर्जापुर व सोनभद्र में जाँच कार्य शुरू भी है। कमीशनखोरी को लेकर प्रशासनिक तंत्र में कितनी खींचतान है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर, बांदा, कौशाम्बी आदि सूखाग्रस्त बुन्देलखण्डी इलाकों में नरेगा हेतु जितनी धनराशि दी गई थी, वह वित्तीय वर्ष बीतने के बावजूद सिर्फ एक तिहाई ही खर्च की जा सकी है जबकि इस इलाके में भुखमरी फैली है।
दूसरी तरफ, प्रदेश के ग्राम्य विकास मंत्री दद्दू प्रसाद नरेगा के तहत पर्याप्त धन उपलब्ध न कराए जाने की शिकायत लेकर केन्द्रीय ग्राम विकास मंत्री डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह से अभी हाल ही में दो बार मिल चुके हैं। श्री दद्दू प्रसाद ने केन्द्रीय मंत्री से सूखाग्रस्त 21 जनपदों में नरेगा चलाने के लिए 935 करोड़ रुपयों की माँग गत वित्तीय वर्ष में की थी जिसके एवज में केन्द्र ने सिर्फ 116 करोड़ रुपया ही जारी किया। श्री दद्दू प्रसाद का कहना है कि जिन 21 जिलों के लिए 116 करोड़ दिया गया है उनमें इस धनराशि से एक माह भी काम नहीं चलाया जा सकता। केन्द्र को भेजे आंकड़े में प्रदेश सरकार ने दिखाया है कि उक्त सूखाग्रस्त 21 जिलों में एक महीने रोजगार के लिए 148 करोड़ रुपया चाहिए। यह विरोधाभास बताता है कि जहाँ धन है वहाँ खर्च नहीं किया जा रहा है और जहाँ कम है वहाँ का ढिंढोरा पीटा जा रहा है।
यह तो हुई नरेगा में व्याप्त राजनीति और भ्रष्टाचार की कहानी। महत्वपूर्ण योजना के क्रियान्वयन को लेकर भी मजदूरों में असन्तोष है। नरेगा के प्रावधानों के तहत श्रमिक को जॉब कार्ड बनने के बाद ग्राम प्रधान को काम के लिए प्रार्थनापत्र देना पड़ता है। प्रार्थना पत्र देने के 15 दिन के भीतर या तो उसी गाँव में या फिर 5 किमी दूरी के अन्दर आवेदनकर्ता को मजदूरी मिलेगी। मजदूरी न मिलने पर भी उसे दिहाड़ी घर बैठे दी जाएगी, क्योंकि इस योजना में पंजीकृत होने पर वर्ष में 100 दिन के रोजगार की सरकारी गारन्टी है। नरेगा में समस्त कार्य दिवस में से 1/3 कार्य महिला श्रमिकों के लिए है। महिलाओं के लिए 5 किमी दूर जाकर कार्य करना मुश्किल है क्योंकि अपने गांव में मजदूरी करते समय वे सुबह-दोपहर-शाम के बचे समय में घर का कार्य भी निपटा लेती है। मजदूरी भी बिल्कुल निश्चित न होकर कार्य के आधार पर है। नरेगा में मुख्यतया मिट्टी का कार्य है। 10 फुट लम्बा, 10 फुट चौड़ा तथा 1 फुट गहरा गङ्ढा यानि 100 घनफुट मिट्टी निकालने पर 100 रुपया दैनिक मजदूरी निश्चित है। इससे कम खोदने पर कम पैसा तथा ज्यादा खोदने पर ज्यादा पैसा भी मिल सकता है। तालाब खुदाई या मिट्टी दूर फेंकने के काम में समय ज्यादा लगने के कारण 100 घनफुट खुदाई दिन भर में हो नहीं पाती।
जॉब कार्ड भी मनमाने ढंग से बनाए गए हैं जिनकी जाँच करना आवश्यक है। तमाम वांछित बेरोजगारों का कार्ड बन नहीं पाया है। कार्य स्थल पर एक भी घोषित सुविधा कहीं नहीं दिखाई पड़ती। शारीरिक रूप से कमजोर श्रमिकों व महिलाओं को ज्यादा परेशानियाँ हैं। एक विचित्र बात यह देखने में आ रही है कि अत्यधिक गरीब होने के बवजूद कथित सवर्ण या अगड़ी जातियाँ सामाजिक संकोचवश नरेगा में अन्य मजदूरों के साथ काम नहीं कर रही हैं। नरेगा में कार्य की विविधता की जानी चाहिए। यह योजना भी जवाहर रोजगार योजना तथा काम के बदले अनाज योजना की तरह प्रधानों व ब्लाक कर्मियों की लूट व भ्रष्टाचार का शिकार हो रही है।
वास्तव में जो क्षेत्र सूखा या आपदाग्रस्त हैं वहाँ तो यह योजना काफी प्रासंगिक है जैसे उ.प्र. के बुन्देलखण्ड या विन्धय क्षेत्र। वहाँ निजी निर्माण कार्यों के लगभग बन्द हो जाने के कारण नरेगा के कार्यों ने श्रमिकों को सहारा दिया हुआ है। नरेगा का मूल लक्ष्य भी गाँवों में रोजगार देकर ग्रामीणों का शहरों की तरफ पलायन रोकना ही है। साथ ही साथ महिलाओं को एक तिहाई रोजगार देकर उन्हें आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बनाना भी है। नरेगा की मजदूरी श्रमिक के बैंक खाते में जमा होती है। अब देखने में यह आ रहा है कि नरेगा के बजाय सामान्य मजदूरी या ग्रामसभाओं द्वारा कराए जा रहे रु. 80 दैनिक मजदूरी के कार्य श्रमिकों को ज्यादा आकर्षित करते हैं। पहली अप्रैल से देश भर के कुल 604 जिलों में नरेगा लागू हो गई है। इस योजना के लिए रु. 40000 करोड़ का प्रावधान किया गया जिसमें से प्रत्येक राज्य की भागीदारी सिर्फ 10 प्रतिशत ही है। हालाँकि देश के छोटे और गरीब राज्यो के लिए यह 10 प्रतिशत भागीदारी भी कठिन है।
'नरेगा' निश्चित ही लाभकारी योजना है। इसे राज्यों व श्रमिक संगठनों से राय-मशविरा कर संशोधित कर लिया जाय तथा इसके अमल में सख्ती लाई जाय। कार्यों में विविधता लाकर इसका आच्छादन बढ़ाया जा सकता है ताकि कार्य थोपे जाने की शिकायतें खत्म हों। नरेगा को वास्तव मे चरणबध्द ढंग से लागू किया जा रहा था लेकिन कांग्रसे महासचिव राहुल गांधी के कारण इसे अचानक पूरे देश में लागू कर दिया गया है। केन्द्र सरकार ने यद्यपि पारदर्शिता लाते हुए 29 लाख लाभान्वित नरगा श्रमिकों की सूची को इन्टरनेट पर जारी किया है तथापि अभी और पारदर्शिता तथा निगरानी की आवश्यकता है।

सुनील अमर