संस्करण: 28अप्रेल-2008

प्रचण्ड पथ पर नेपाल

अशोक कुमार पाण्डेय

लम्बी जद्दोजेहद के बाद हुए नेपाली चुनावों के नतीजों ने फिर एक बार साबित कर दिया कि इतिहास हम सबसे ज्यादा कल्पनाशील और रचनात्मक होता है और यह भी कि भविष्य के इतिहासबोध पर भरोसा करने वाले ही सही मायनों में इतिहास के रचयिता होते हैं। विशेषज्ञों के अनुमानों तथा सभी आशंकाओं को दरकिनार करते हुये नेपाल की जनता ने अपना भविष्य चुन लिया है। नेपाल की कम्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पक्ष में सुनाये गये इस स्पष्ट फैसले ने केवल नेपाल ही नहीं दुनिया भर की प्रगतिशील क्रांतिकारी ताकतों को एक और स्वर्णिम उदाहरण ही नहीं दिया है अपितु यह भी साबित किया है कि परिवर्तन हमेशा किसी बंधे बंधाये ढर्रे पर नहीं बल्कि ठोस परिस्थितियों के ठोस मूल्यांकन से ही होते हैं। साथ ही भारत सहित पूरी दुनिया में माओवादियों के खिलाफ चलाये गये दुष्प्रचारों और नेपाली जनता के बीच उनके समर्थन को लेकर उठाये गये सवालों पर भी इन चुनाव परिणामों ने पूर्णविराम लगा दिया है, खासकर तब जब इनमें पर्यवेक्ष अमेरिका के जाने माने कम्यूनिस्ट विरोधी पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर भी किसी प्रकार के व्यापक हेर फेर या गड़बड़ी का आरोप नहीं लगा पाये। पूरी दुनिया की मीडिया के सामने हुए इन चुनावों में जिन हिंसक वारदातों की ख़बरें आई भी उनमें माओवादियों नहीं नये उभरे सशस्त्र मधोशी ग्रुपों की तरफ ही उंगलियां उठीं। वैसे सच तो यह है कि वर्ष 2005 में नेपाली कांग्रेस तथा नेपाली कम्यूनिस्ट पार्टी (एकीकृत माले) के नेतृत्व वाले सात पार्टियों के गठबंधन के साथ किये गये समझौते और हिंसक प्रतिरोध के रास्ते के पूर्ण परित्याग के बाद से लगातार मीडिया के शक के घेरे में रहने के बावज़ूद माओवादियों द्वारा हथियार का सहारा लेने की कोई भी महत्वपूर्ण ख़बर अभी तक बाहर नहीं आई है। ऐसे में साफ़ है कि माओवादियों को जनता के बड़े तबके का समर्थन हासिल है।
इन चुनावों में तमाम दूसरे मुद्दों के अलावा जो मुद्दा सबसे स्पष्ट एजेण्डे पर था वह था राजशाही का भविष्य। वैसे तो कमोबेश सात पार्टियों का यह पूरा गठबंधन इस बात पर एकमत था कि अब नेपाल में राजशाही की वह भूमिका नहीं रहेगी जो अब तक थी लेकिन राजा और राजतंत्र की भावी भूमिका को लेकर स्पष्ट मतभेद थे। उदाहरण के लिए नेपाली कांग्रेस के भीतर भी एक तबका खुले तौर पर संवैधानिक राजतंत्र का समर्थन कर रहा था। खुद प्रधानमंत्री की पुत्री और तराई के सुनसारी क्षेत्र से नेपाली कांग्रेस की प्रत्याशी सुजाता कोईराला ने कई बार मंच से इस आशय के बयान दिये थे। इसके अलावा राजतंत्र समर्थक पार्टियां तो थीं ही, मधोशी पार्टियों का भी एक बड़ा हिस्सा राजतंत्र का खुला समर्थन कर रहा था। इस बार के स्पष्ट संकेत हैं भारत के तमाम दक्षिणपंथी दल तथा राजा द्वारा पूर्व में उपकृत राजनेता राजा के समर्थन में एक तरफ विरोधी काम कर रहे थे तो दूसरी तरफ सरकार पर पूरी चुनावी प्रक्रिया को राजा के पक्ष में प्रभावित करने का दबाव बना रहे थे, हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में भारत सरकार ने एक परिपक्व लोकतांत्रिक पड़ोसी की श्लाघनीय भूमिका निभाकर अपनी भविष्यदृष्टा छवि का ही परिचय दिया था जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव चुनावी जीत के बाद प्रचंड के बयानों में साफ़ दिखा। लेकिन नेपाली जनता ने इन सबको पूरी शक्ति से नकार कर राजतंत्र के ताबूत में अंतिम कील ठोंक दी। सुजाता कोईराला सहित प्रधानमंत्री का पूरा कुनबा इन चुनावों में बुरी तरह हारा और राजतंत्र समर्थक पार्टियों का तो खाता भी नहीं खुला। राजा के भारतीय शुभचिंतकों की बौखलाहट तो इसी बात से समझी जा सकती है कि गत उन्नीस तारीख को संसद में दिये गये अपने बयानों में गोरखनाथ पीठ के उत्तराधिकारी और सांसद आदित्यनाथ ने चुनावों में भारत सरकार के हस्तक्षेप न करने पर रोष व्यक्त किया और साथ ही माओवादियों पर भारत के नक्सलवादियों, इस्लामी आतंकवादियों वगैरह-वगैरह से संबंध होने का आरोप लगाकर इन चुनावों में उनके द्वारा हिंसा के प्रयोग का वह आरोप लगाया जो वहीं उपस्थित होने के बावज़ूद कार्टर साहब नहीं लगा पाये। वैसे इस मौके पर वह अपने यजमान और पूर्व नरेश के परिवार की हत्या की साजिश के आरोपी 'राजा' ज्ञानेन्द्र के गुणगान से भी नहीं चूके। उनके सुर में सुर मिलाने वालों में उत्तर प्रदेश में उनकी प्रबल विरोधी समाजवादी पार्टी के लोकसभा में मुख्य सचेतक मोहन सिंह और 1857 के नायक कुंअर सिंह के वंशज विनय कुमार सिंह भी थे, जो शायद उस महाविद्रोह में अपने पुरखे और नेपाल नरेश दोनों की भूमिकायें भूल चुके हैं।
दरअसल, नेपाल के चुनाव परिणामों के बाद उन लोगों का बौखलाना स्वाभाविक ही है, जिनके आर्थिक तथा राजनैतिक स्वार्थ नेपाल के राजतंत्र से सीधो जुड़े हुए हैं। साथ ही वामपंथ के विरोधियों और रूस के पतन तथा चीन के पूंजीवादी पथगामी हो जाने के बाद माक्र्सवाद के अंत की घोषणा कर चुके लोगों के लिए पड़ोस में एक क्यूबा नाकाबिले बर्दाश्त है। भारत के माओवादी दलों के एक अति पर पहुँच कर माओवाद को सशस्त्र संघर्ष का पर्याय बना देने से अभी तक इनके लिए माओवाद को लोकतंत्र दोनों तथा आतंकवादी बता देना सुविधाजनक था, लेकिन सीपीएन(माओवादी) द्वारा माओ की सतत क्रांति की अवधारणा को बिल्कुल नये परिप्रेक्ष्य में लागू कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा अपनी लोकप्रियता साबित करने से इनके लिए सैंध्दांतिक दुविधा उत्पन्न हो रही है। इसी बौखलाहट में भारत सरकार पर नेपाल की चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप न करने का आरोप लगाकर वे लोकतंत्र के प्रति अपनी खुद की पक्षधारताओं की सीमा ही बता रहे हैं। आदित्यनाथ जैसे कट्टर हिन्दूवादी नेता, जिसने पिछले कुछ सालों मे पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश को सांप्रदायिक दंगों की आड़ में झोंक दिया है, का माओवाद विरोधी सीधे-सीधे राजतंत्र के उस धार्मिक स्वरूप से जुड़ा हुआ है, जिसके पवित्र मठ के मठाधीश होने के उन्हें अनेक प्रत्यक्ष तथा परोक्ष लाभ अब नहीं मिल पायेंगे। इसीलिए भारतीय माओवादियों या अन्य आतंकवादियों से नेपाल की माओवादी पार्टी के संबंध का कोई प्रमाण न होने के बावज़ूद पूंजीवादी मीडिया तथा वामपंथ विरोधी बुध्दिजीवियों के एक समूह द्वारा गढ़े गये ये आरोप दक्षिणपंथियों से लेकर समाजवादी और संशोधानवादी वामपंथ के एक धड़े द्वारा एक स्वर में दोहराये जा रहे हैं।
लेकिन फिलहाल प्रचण्ड इन सबसे बेख़बर नेपाल में एक सर्वसमावेशी, लोकतांत्रिक तथा धार्मनिरपेक्ष व्यवस्था के निर्माण के अपने संकल्प को पूरा करने में लगे है। इस स्पष्ट जनादेश के बाद राजतंत्र का जाना तो तय है ही साथ ही यह भी तय है कि नये संविधान के निर्माण में माओवादियों की एक महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। नतीजों के बाद प्रचण्ड ने जिस जिम्मेदारी और दूरदर्शिता से बयान दिये हैं वह एक राजनेता के रूप में उनके परिपक्व होते जाने के संकेत हैं। राजा के खिलाफ़ अगर कोई कटुता दिखाये बिना वह उनसे बातचीत की पहल कर राजमहल खाली कर जनता की इच्छा की सम्मान की बात करते हैं तो मधोशियों द्वारा चलाये जा रहे अलगाववादी आंदोलन के दक्षिणपंथी रूझान पर भी यह सम्यक दृष्टि अपनाते हैं। भारत के माओवादियों से हथियार छोड़ राजनीति की मुख्यधारा में शामिल होने की उनकी अपील को भारतीय माओवादियों ने पहले भले ठुकरा दिया हो लेकिन अब इस सफलता के बाद वे भी शायद इस पर गंभीरता से सोचने को तैयार हों।
लेकिन इन सबके साथ यह भी सच है कि चुनावों में जीत नेपाली राजनीति पर माओवादियों की अंतिम जीत नहीं है। सदियों से राजशाही के चंगुल में पिसती रही नेपाली जनता के वंचित शोषित तबकों को माओवादियों ने विकास, समानता ओर सम्मान के जो सपने दिखाये हैं उन्हें पूरा आसान नहीं है। दूर दराज के क्षेत्रों में रहने वाली अनेकानेक राष्ट्रीयतायें जो अब तक राजनीति और समाज की मुख्यधारा से बाहर रही हैं निश्चित रूप से नये नेपाल में अपनी भूमिका को लेकर बेहद आशान्वित हैं। भूमिगत संघर्ष के दौरान अपनी मुख्य ताकत रही इन राष्ट्रीयताओं, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं की आकांक्षाओं को पूरा करना प्रचण्ड के सामने एक गंभीर चुनौती होगी तो चीन तथा भारत से घिरी भौगोलिक अवस्थिति और एकधारवीय पूंजीवादी विश्व में किसी विकसित समाजवादी देश की अनुपस्थिति में नेपाल जैसे छोटे और अल्पविकसित देश को आर्थिक प्रगति के रास्ते पर ले जाना उनके समक्ष सबसे महत्वपूर्ण कार्यभार होगा। साथ ही उनके समक्ष एक बड़ी चुनौती तराई क्षेत्र में मधोशियों के लगातार बढ़ते जा रहे हिंसक अलगाववादी आंदोलन की समस्या को सही तरीके से सुलझाने की भी है। तराई में नेपाल की सबसे घनी आबादी रहती है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि तराई में सिर्फ़ मधोशी ही रहते हैं। जहाँ पश्चिमी तराई क्षेत्र में यहाँ के मूल निवासी थारू बहुतायत में है वहीं पूर्व में बहुसंख्या लिंबूओं की है और इनके बीच में हैं मूलत: उत्तर प्रदेश और बिहार से आये मधोशियों की विशाल जनसंख्या जो कुल नेपाली आबादी का लगभग तीस प्रतिशत हैं। इसके अलावा इस पूरे क्षेत्र में पहाड़ी कहे जाने वाले नेपालीभाषी लोग भी अच्छी खासी संख्या में है। मधोशियों की मूल शिकायत यह रही है कि लम्बे समय से नेपाल में रहने और यहाँ का नागरिक होने के बावज़ूद नेपाल की सामाजिक तथा राजनैतिक धारा में उन्हें अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिला। दरअसल सशस्त्र संघर्ष के दौर में माओवादियों ने इस समस्या को स्वीकार करते हुए मधोशी मुक्ति मोर्चा बनाकर इस आबादी के दलित तथा पिछड़े तबके के स्वाभिमान की लड़ाई ही नहीं लड़ी संविधान सभा में इन्हें आनुपातिक प्रतिनिधित्व भी दिलाया। लेकिन कालांतर में इनके बीच से ऊंची जातियों और व्यापारिक वर्चस्व वाले दक्षिणपंथी अवसरवादियों का एक समूह उभरा जिसे भारत से आदित्यनाथ जैसे कट्टरपंथियों और नेपाल के भीतर राजतंत्र समर्थकों का पूरा समर्थन मिला। माओवादियों द्वारा हथियार त्यागने के बाद के माहौल में इन्हें हथियारबंद कार्यवाहियों और नफरत के अपने एजेण्डे को फैलाने का पूरा मौका मिला। हालत यह है कि चुनावों के ठीक पहले मधोशी टाईगर्स के गुण्डों ने सुनसारी और आसपास के जिलों के सौ से अधिक गरीब पहाड़ी परिवारों को अपने घर छोड़ने पर मज़बूर कर दिया। माओवादियों द्वारा अलग मधोश प्रदेश बनाकर उसे संख्या के आधार पर तीन उपप्रदेश बनाने के प्रस्ताव को ठुकरा कर मांगे न माने जाने की दशा में भारत के साथ जुड़ने की अपनी धमकी और इन चुनावों में राजतंत्र के अपने समर्थन से इन्होंने अपना असली अलगाववादी तथा प्रतिक्रियावादी चेहरा दिखा दिया है। उम्मीद की जानी चाहिये कि प्रचण्ड और भारत सरकार दोनों इस समस्या को चतुराई से हल करना चाहेंगे क्योंकि दोनों में से कोई भी अपने बीच एक कश्मीर नहीं चाहेगा।
अब यह तो भविष्य ही बतायेगा कि प्रचण्ड के नेतृत्व में नेपाल के माओवादी इन लक्ष्यों को किस हद तक प्राप्त कर पाते हैं लेकिन इतना तो तय है कि आज पूरी दुनिया की नज़र नेपाल पर है। अगर हर बार की तरह प्रचण्ड इस चुनौती का भी सफलतापूर्वक मुकाबला कर पाते हैं तो दुनिया भर के क्रांतिकारियों के लिये यह प्रेरणास्रोत बनेगा वरना यह तो प्रचण्ड भी जानते ही होगे कि इतिहास सबसे कल्पनाशील ही नहीं सबसे निर्मम भी होता है।
अशोक कुमार पाण्डेय