संस्करण: 28अप्रेल-2008

राजनीति का एक विपरीत पक्ष
वोट के लिए जन भावनाएँ भड़काने का दूषित खेल
राजेन्द्र जोशी

राजनैतिक क्षेत्रों में यह आम धारणा बन गई है कि लोकसभा और विधानसभाओं के निर्वाचनों में मतदाताओं को झूठे आश्वासन देने, लोक लुभावन प्रलोभन देने और जन जन की आस्था और भावनाओं को उभारकर उन्हें प्रभावित करने के मामले में कोई भी राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी से होड़ नहीं कर पाता है। राजनैतिक समीक्षकों का मानना है कि विकास, निर्माण और जनकल्याण के कार्यों के क्रियान्वयन में पिछड़ने और भ्रष्टाचार, कमजोर प्रशासन, लचर ला एंड ऑर्डर की स्थिति के बावजूद भाजपा कतिपय मतदाताओं को अपने पक्ष में कर ही लेती है। भारत वर्ष धर्म, संस्कृति और परम्पराओं का देश है यहाँ के लोग भावना प्रधान हैं। लोगों में राष्ट्रप्रेम की भावना है। वे चाहते हैं कि भारत वर्ष दुनिया के तमाम देशों से अपने आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास में अव्वल रहे। किंतु इस पक्ष के अलावा भारतीयों में चाहे वह किसी भी धर्म का हो, उसमें यह गुण भी है कि वह धर्म, जाति, सम्प्रदाय, सांस्कृतिक परम्पराओं, रीति रिवाजों और सामाजिक बंधानों के प्रति भी अपनी प्रतिबध्दता से दूर नहीं रह सकता है।
भूमंडलीकरण के दौर में बढ़ रहे भौतिकवाद और बाज़ारवाद के चक्र में भारत का नागरिक इस तरह से फंस चुका है कि उसने अपने जीवन के रहन सहन के पैटर्न को पूरी तरह से बदल डाला है। खान-पान और पहनने-ओढ़ने के तरीकों में काफ़ी अंतर आ चुका है। यहाँ तक कि सामाजिक और पारिवारिक रीति-रिवाजों और संस्कारों के वे सब परम्परागत आचरण भी बदल गये है। पूरा का पूरा विश्व अर्धामय हो गया है। परिणाम स्वरूप अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार इससे प्रमाणित हो गया है और जीवनोपयोगी वस्तुओं पर महंगाई की मार पर मार पड़ती जा रही है। ऐसे में राज संचालन व्यवस्था चरमरा उठती है। राजनैतिक दलों के समक्ष यह एक भारी चुनौती होती है कि वह मतदाताओं को अपने अपने एजेंडों के अनुसार कैसे प्रभावित करे। कई राजनैतिक पार्टियों का आरोप है कि ऐसी स्थितियों में सत्ता पर काबिज होने के प्रयासों में मतदाताओं की भावना को उभारकर उनके निज़ी संस्कारों, उनकी धार्मिक भावनाओं, उनके पारिवारिक रीति-रिवाजों और उनके भी हृदय में छुपी आस्थाओं में दखलंदाजी कर बड़ी चतुराई से उन पर मोहिनी डालने का काम करती है। स्वच्छ प्रशासन, विकास, निर्माण और जन कल्याण की योजनाओं की असफलताओं को छुपाकर जन आस्थाओं से खिलवाड़ कर तथा अन्य दलों और नेताओं के खिलाफ़ घृणा और दुर्भावना फैलाकर यह दल जनहितैषी बनने के आडम्बर में निरंतर सक्रिय रहता आया है। इस तरह के लांछनों से यह पार्टी सदैव चर्चा में रहती आई है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कांग्रेस ने देश में सत्ता की बागड़ोर सम्हाली और उसने व्यवस्था संचालन के लिए अपनी कार्यसूची तैयार की। देश के चौतरफा विकास के लिए बनाये गये अपने एजेंडे में कांग्रेस ने जहाँ सामाजिक और आर्थिक उन्नयन के विषय शामिल किए, वहीं गरीबी हटाने जैसे कार्यक्रमों के साथ ही आर्थिक, औद्योगिक, वैज्ञानिक, तकनीकी सांस्कृतिक और शैक्षणिक विकास जैसे कार्यक्रमों को अपनी प्राथमिकता में रखा। जन की बुनियादी आवश्यकताओं, की पूर्ति बनाये रखने उसके स्वाभिमान की रक्षा करने और जन जन को आत्मनिर्भर बनाने मेंअपने कार्यक्रमों को अंजाम देने के लिए इस राजनैतिक पार्टी ने देश की सत्ता सम्हाली। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने प्रजातंत्र की सफलता के लिए इस बात को देश के समक्ष रखा कि सत्ता और सत्ताधीश कहीं भटक न जाय, अपने उद्देश्यों में भ्रमित न हो जाय और सत्ता के दम्य में जनता के प्रति अपने कत्तव्यों को किनारे नहीं कर दे, इस दृष्टि से सत्ता पर अंकुश बनाये रखने के लिए एक सशक्त, सक्षम कुशल और देश के प्रति निष्ठा रखने वाला विपक्ष होना ज़रूरी है। उनका मानना था कि देश के संचालन के लिए जितना समर्पित सत्ता पक्ष होना चाहिए उतना ही समर्पित विपक्ष भी होना चाहिए। हमारे देश में ऐसा हुआ भी। विपक्ष की भूमिका के इतने बेहतर और प्रभावी उदाहरण देखने को मिलते रहे हैं, जिससे सत्ता पक्ष को भी उचित सहयोग और मार्गदर्शन मिलता रहा। सत्ता पक्ष के कार्यों के सफल और असफल कार्यक्रमों पर पक्ष विपक्ष में खूब बहस चलती थी तकरारे चलती थी, किंतु उनमें व्यक्तिगत कटुता या राग द्वेष के भावों की प्रधानता नहीं होती थी।
सत्ता तक पहुँचने के लिए केन्द्र में लोकसभा और राज्यों में विधानसभाओं पर अधिकार जमाने की राजनैतिक दलों में प्रति स्पर्धा निर्वाचनों के दौरान अब जो रूप धारण करती जा रही हैं, वह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 4-5 आम निर्वाचनों तक नहीं देखी जाती थी। अव्वल तो राजनैतिक दलों की संख्या भी ज्यादा नहीं थी। अब तो पार्टियों के भीतर व्यक्तित्व के अहम् की टकराहटों और सत्तालोलुपता के कारण लोग अपनी मूल पार्टियों से टूट-टूटकर नई-नई पार्टियां बनाते जा रहे हैं। राष्ट्रीय और प्रादेशिक पार्टियों की भरमार हो गई है। अब सत्ता तक पहुँचने के लिए विकास और कल्याण के कार्यक्रमों एजेंडों से बाहर होते जा रहे हैं। आज़ादी के बाद में देश में जितनी भी विपक्ष की पार्टियां गठित होती जा रही हैं, उनके समक्ष साम, दाम, दण्ड, भेद से मतदाताओं को प्रभावित किया जाने लगा है।
धर्मनिरपेक्षता हमारे संविधान की महत्वपूर्ण शर्त हैं। किंतु देखा यह जा रहा है कि विभिन्न धर्मावम्बियों के बीच खाई बढ़ाकर कुछ कट्टरवादी ताकतें राजनैतिक दलों का माधयम बना रही हैं और धर्म विशेष के पक्ष या विपक्ष में माहौल बनाकर अपने राजनैतिक उल्लू को सीधा करने में चूक नहीं रही हैं। परिणाम स्वरूप धार्म, जाति और सम्प्रदायों के नाम पर सामाजिक विघटन की स्थिति बन जाती है। अनेक उदाहरण मिल जाते है जिसमें यह देखने को मिल रहा है कि भोले-भाले, सीध-सादे और धर्म पुराण लोग विकास, निर्माण और कल्याण के कार्यक्रमों को महत्व न देकर फैलाये जा रहे धार्मिक उन्माद के जाल में फंस जाते हैं इससे कट्टरवादी ताकतों के हौंसले बुलंद हो जाते हैं।
राजेन्द्र जोशी