संस्करण: 28 मार्च -2011

विज्ञान और तकनीकी विषयों में

भारतीय भाषाओं का प्रयोग

? राजेंद्र जोशी

 

कनीकी और विज्ञान के चमत्कारों ने जो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय आयाम दिए हैं उनमें भाषा की हिस्सेदारी की अपनी एक अहम भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। ज्ञान के विस्तार और अभिव्यक्ति की सार्थकता के लिए भाषा एक सशक्त माध्यम है। आज संपूर्ण विश्व में विकास के क्षेत्र में एक नई क्रांति का प्रवेश हुआ है। इस नई क्रांति से व्यक्ति तभी जुड़ सकता है, जब वह उसे अपनी भाषा में उतार सके। विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में विश्व में अपना दबदबा कायम रखने के लिए हमें हमारी संस्कृति की मूल भाषा हिन्दी के व्यापक विस्तार और प्रचार की आवश्यकता पर अधिक बल देना है। इस दिशा में हिन्दीतर प्रदेशों ने भी अपने कदम आगे बढ़ाना शुरू कर दिए है।

सूचना क्रांति और इलेक्ट्रॉनिक के विस्तार के इस युग में भारत की युवा-पीढ़ी ने विश्व के अनेक देशों में अपनी प्रतिभा का जो परिचय दिया है वह इस युग का महत्वपूर्ण अध्याय है। इस दृष्टि से तकनीकी शिक्षा में हिन्दी के अधिकतम उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में हमारे देश में विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। राजभाषा विभाग और विज्ञान और तकनीकी शब्दावली आयोग ने तकनीकी क्षेत्रों में हिन्दी शब्दों की उपयोगिता को बढ़ाने की दिशा में कुछ कारगर कदम उठाये हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिए हिन्दी शब्दों की शब्दावली तो तैयार की ही जा रही है, साथ ही शाब्दिक और भावात्मक अनुवाद पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

आजादी के बाद भारत में तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में काफी उन्नति हुई है। आज देश में लगभग साढ़े चार लाख इंजीनियरिंग कॉलेज और 1750 से अधिक पॉलिटेक्निक महाविद्यालय हैं। इसके साथ ही कम्प्यूटर, एप्लीकेशन, आर्किटेक्चर, फार्मेसी, होटल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में लाखों की तादाद में छात्र अध्ययन कर रहे हैं। एक ओर यह माना जाता है कि बिना अंग्रेजी भाषा के तकनीकी शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाई संभव नहीं है, वहीं दूसरी ओर पॉलिटेक्निक महाविद्यालय में अंग्रेजी के साथ हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग भी होने लगा है। मध्यप्रदेश में हिन्दी तथा गुजरात में गुजराती भाषा के माध्यम से पॉलिटेक्निक डिप्लोमा की शिक्षा दी जा रही हैं। तकनीकी शिक्षा में हिन्दी भाषा के प्रयोग में कुछ दिक्कतें जरूर आती हैं, किन्तु यदि सार्थक प्रयास किए जायें तो इन दिक्कतों को दूर किया जा सकता हैं। इसके लिए भाषा के प्रयोग के प्रति दृढ़ संकल्पित होना बहुत जरूरी है। साथ ही भाषा के क्षेत्र में मानसिक गुलामी को त्यागकर हिन्दी भाषा के प्रति आस्था और विश्वास की भावना जगाना जरूरी है। जब चीन, जर्मनी, जापान और रूस जैसे देश आण्विक अनुसंधान जैसे विषयों के प्रचार-प्रसार के लिए अपनी-अपनी राष्ट्रभाषा का प्रयोग कर रहे हैं तो भारत में भी तकनीकी विषयों के विकास और विस्तार के लिए हिन्दी भाषा और अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों का प्रयोग क्यों नहीं किया जा सकता।

आज विज्ञान और तकनीकी का क्षेत्र अत्यंत विकसित होता जा रहा है। इन क्षेत्रों में इतने अधिक नये विषय ईजाद हो रहे हैं कि अंग्रेजी भाषा को भी ऐसे विषयों के लिए नये शब्द गढ़ना पड़ रहा है। इस स्थिति में तकनीकी क्षेत्र के नये शब्द गढ़ने की हिन्दी के सामने बड़ी चुनौती है। हिन्दी के संबंध में आज जरुरत इस बात की है कि लोगों का दृष्टिकोण वैज्ञानिक होना चाहिए। यह एक विचारणीय प्रश्न है कि क्या हमारे देश में अंग्रेजी भाषा के आने के पूर्व तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में कोई विकास नहीं हुआ था ? हमारी प्राचीन इमारतें, वास्तुशिल्प और इतिहास साक्षी है कि तकनीकी के क्षेत्र में भारत पुरातन काल में भी कभी पीछे नहीं रहा। तकनीकी उपलब्धियों और ज्ञान की भारत में पुरातन काल से निरंतरता बनी हुई है। आधुनिक काल तक तकनीकी को लाने में भाषा ही माध्यम बनी रही। यह अलग बात है कि गुलामी के समय में भाषाएं बदलती रहीं। आज स्वतंत्र भारत की जनभाषा हिन्दी है अत: ज्ञान के विस्तार में हिन्दी के प्रयोग के लिए शब्दों का अनुसंधान लाजिमी हो गया है। तकनीकी शब्दावली में हिन्दी के विशाल भंडार में अन्य भारतीयों भाषाओं के शब्दों का प्रयोग सुगमता से किया जा सकता है।

तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी के प्रयोग के लिए अनुवाद के साथ-साथ मौलिक रुप से तकनीकी पुस्तकें हिन्दी में लिखी जायें तो ज्यादा उपयोगी साबित होंगी। देश में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने तकनीकी शिक्षण के लिए राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान केन्द्रों की स्थापना की है। इन केन्द्रों के माध्यम से तकनीकी शिक्षा में हिन्दी के प्रयोग के लिए कार्ययोजना बनाई जा सकती हैं इस कार्ययोजना के तहत हिन्दी शब्दकोष तैयार करने, हिन्दी में पाठयक्रम तैयार करने और विद्यार्थियों के लिए पठन सामग्री का कार्य प्रारंभ किया जाना चाहिए। इन केन्द्रों के विशेषज्ञों और अनुभवी अध्यापकों के ज्ञान को देखते हुए यह कार्य असंभव नहीं लगता है।

विज्ञान एवं तकनीकी शब्दावली आयोग ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्र में भाषागत समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुए जो सिध्दांत निर्धारित किए हैं उनमें एक सिध्दांत यह भी अपनाया गया है कि अंतर्राष्ट्रीय शब्दों को यथा संभव उनके प्रचलित अंग्रेजी रुपों में ही स्वीकार करना और उनका भारतीय भाषाओं में लिप्यांतरण करना। इसी सिध्दांत के अनुरूप जब अंग्रेजी भारतीय भाषा के शब्दों को ग्रहण कर सकती है, तब हम क्यों अपने ही शब्दों को क्लिष्ठ मानकर उनका समुचित उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। यदि विज्ञान और तकनीकी विषयों में मानक शब्दों के पर्यायों का प्रयोग मूलरूप से करते हुए हम हिन्दी में लेखन को महत्व देंगे तो हम विदेशी भाषा के दुष्चक्र से मुक्त होकर एक नया सार्थक विहान देने में कामयाब होंगे।

उद्योग और व्यवसाय के क्षेत्र में भारत किसी देश से प्रतिस्पर्धा में उन्नीस नहीं बैठता है। सूचना प्रौद्योगिकी ने भी भारत के तकनीकी भविष्य को पहचाना है और नयी पीढ़ी इस दिशा में निरंतर अग्रसर है। जहां तक इन क्षेत्रों के विकास में भाषा की हिस्सेदारी का प्रश्न है, भारत के तकनीकी विशेषज्ञों, भाषाविदों, विभिन्न हिन्दी सेवी संस्थाओं और शासकीय उपक्रमों ने हिन्दी के तकनीकी ज्ञान को विकास के आयामों से जोड़ने का विहान छेड़ दिया है। विशेषज्ञों और भाषाविद जहां तकनीकी शब्दों को हिन्दी में ढाल रहे हैं वहीं हिन्दी सेवी संस्थाएं भी कार्यशालाएं, संगोष्ठियां, प्रशिक्षण के माध्यमों से हिन्दी की उपयोगिता के विस्तार में सक्रियता प्रदर्शित कर रहे हैं। तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में हिन्दी के प्रयोग के बारे में व्यापक स्तर पर लेख आ रहे हैं और पुस्तिकाएं प्रकाशित हो रही हैं। संवाद और परिचर्चाओं के आयोजन से हिन्दी के शब्द भंडार बढ़ाये जाने के लिए सार्थक सुझाव और मार्गदर्शन मिल रहे हैं। पूरे देश में यहां तक कि हिन्दीतर क्षेत्रों में भी उचित माहौल तैयार करने के विभिन्न स्तरों पर प्रयास हो रहे हैं ताकि तकनीकी विषयों में हिन्दी के प्रयोग के मार्ग प्रशस्त हो सकें। इन प्रयासों से तकनीकी विकास के कार्य में हिन्दी के प्रति सम्मान पैदा हो रहा है।


? राजेंद्र जोशी