संस्करण: 28 मार्च -2011

भारतीय राजनीति में

ईमानदारी की संभावना

? सुनील अमर

 

क पैंसठ साल पुराने संप्रभु राष्ट्र में अगर चारो तरफ से यह शंका उठे कि क्या देश की राजनीति में अब भी ईमानदारी की कोई गुंजाइश बची हुई है, तो नि:संकोच मान लेना चाहिए कि यह हताशा की पराकाष्ठा ही है। साथ ही यह भी मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि बीमारी इलाज की सामान्य सीमाओं को पार कर चुकी है। यह त्रासदी और मारक हो जाती है जब वह देश भारत जैसा तीव्र गति से विकास कर रहा देश हो! तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में भ्रष्टाचार भी उतनी ही तेजी से पॉव पसारता है, यह हम अपने देश में देख ही रहे हैं। बीते सप्ताह राजधानी दिल्ली में देश की एक अग्रणी साप्ताहिक पत्रिका द्वारा आयोजित उक्त विषयक संगोष्ठी में वक्ताओं द्वारा जो विचार व्यक्त किए गए, यद्यपि वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचाते, फिर भी समस्या का गंभीर विश्लेषण तो करते ही हैं।

हम एक लोकतांत्रिक देश हैं जहाँ राजनीतिक दल जनता से वोट प्राप्त कर सरकारें बनाते हैं। यह वोट प्राप्त करने की समूची प्रक्रिया जितनी साफ-सुथरी होती है, उतनी ही साफ-सुथरी और जबाबदेह सरकार हमें मिलती है। संगोष्ठी में भी वक्ताओं का ज्यादा जोर चुनाव सुधार और उसमें धन का प्रयोग कम करने पर ही था। लेकिन विचार करने की आवश्यकता यह है कि क्या राजनीति में बढ़ती बेईमानी या भ्रष्टाचार के लिए महज धन ही जिम्मेदार है? क्या दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों में, जहाँ कि भारत जितना भ्रष्टाचार नहीं है, चुनाव में धन का इस्तेमाल नहीं होता? इस बात पर भी चिन्ता जताई गयी कि तमाम बड़े औद्योगिक घराने अरबों रुपये का चंदा राजनीतिक दलों को विभिन्न प्रकार से देते हैं, और बाद में उसका प्रतिफल प्राप्त करते हैं।

जिस तरह की शासन प्रणाली और चुनाव व्यवस्था हमने अपना रखी है, उसमें धन के उपयोग से बचा नहीं जा सकता। आज जब यह कहा जाता है कि चुनाव सरकारी खर्चे से कराये जॉय तो यह वास्तव में समस्या को सिर्फ एक पहलू से देखना भर ही होता है। चुनाव सरकारी खर्चे से कराने का मतलब यही इतना तो है कि समस्त नामांकन प्रक्रिया, प्रचार सामाग्री, प्रचार वाहन और कार्यकर्ता खर्च को सरकार वहन करे। किसी भी छोटे-बड़े चुनाव में मोटे तौर पर यही खर्च आते हैं, लेकिन चुनाव जैसे कार्यों की थोड़ी बहुत भी जानकारी रखने वाले यह जानते ही होंगें कि ये सारे खर्च तो सिर्फ हाथी के दिखाने वाले दाँत भर हैं। असल में तो इससे कई गुना अधिक और बहुत से रहस्यमय प्रकार के खर्च होते हैं, जिन्हें न तो सरकार पूरा कर सकती है और न कोई प्रत्याशी सरकार को बताना ही चाहेगा। इस प्रकार सरकारी खर्च की व्यवस्था होने के बावजूद यह कह पाना कठिन है कि प्रत्याशी चोर दरवाजों से रहस्यमय खर्चों को नहीं करेंगें।

अमेरिका व ब्रिटेन समेत कई विकसित और पुराने लोकतांत्रिक देशों में भी इसी तरह चुनाव होते हैं और वहॉ भी बड़े औद्योगिक घराने राजनीतिक दलों को उनके आकार और भविष्य के अनुरुप चंदा देते हैं। विश्व के दो प्रमुख और प्राचीन लोकतांत्रिक देश अमेरिका और ब्रिटेन के चुनावों में भी चंदे और स्त्री-देह के धंधो सहित ऐसा कोई अनैतिक कार्य नहीं है जो हर बार न हो रहा हो। ऐसे में यह सोचना कि सरकारी खर्च पर चुनाव कराने से भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई क्रांतिकारी सुधार आ जाएगा, गलत ही है। किसी राजनीतिक दल के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ने वाला एक प्रत्याशी मान लीजिए कि पन्द्रह करोड़ रुपये खर्च करता है तो सरकार द्वारा चुनाव खर्च उठाने के बावजूद वह लगभग इतना ही पैसा खर्च करेगा और तब वह अनैतिक कार्यों पर ज्यादा खर्च करेगा।

तो क्या चुनाव सुधारों की चर्चा या कोशिशें की ही नहीं जानी चाहिए? राजधानी दिल्ली में सम्पन्न हुई उक्त गोष्ठी में हमेशा की तरह विश्व की कई नामचीन हस्तियों के अलावा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता सहित देशी फिल्म उद्योग के सितारे आदि भी मौजूद थे। इनमें से बहुत सारे व्यक्तित्व ऐसे थे जो ऐसी राजनीतिक समस्या के लिए उपयुक्त उपाय सुझा सकते थे, लेकिन एक बँधो-बॅधाए कार्यक्रम और एक तयशुदा फ्रेम में कुछ नपा-तुला भर देने के अलावा कोई कर ही क्या सकता है! और जिस समस्या पर इतने हाहाकारी ढ़ॅंग से आयोजन किया गया, उसे दूर करने के लिए प्रमुख रुप से जिम्मेदार देश की दोनों राजनीतिक पार्टियॉ-काँग्रेस व भारतीय जनता पार्टी वहाँ मौजूद थी। वे दोनों ही एकमत थीं कि चुनाव में धन बल का प्रयोग रोका जाना चाहिए। इस पर वहॉ मौजूद देश के प्रमुख उद्योगपति और पूर्व सांसद राहुल बजाज ने कहा भी कि जब दोनों प्रमुख राजनीतिक दल एक ही राय के हैं तो फिर इस चुनाव सुधार को लागू करने में कोई अड़चन होनी ही नहीं चाहिए, लेकिन जैसा कि सभी जानते हैं कि उक्त गोष्ठी में व्यक्त किये गये विचार मंचीय भाषण से अधिक कीमत के नहीं है।

वास्तव में देश में जिस राजनैतिक ईमानदारी की बात की जा रही है वह बहुआयामी है। ऐसा नहीं है कि अगर सिर्फ राजनेता सुधर जाऐगें तो भ्रष्टाचार और अनैतिकता दूर हो जाएगी। आज सबसे ज्यादा चिन्ता की बात यह है कि देष की जनता ने भी प्राय: भ्रष्टाचार को व्यवस्था के एक अंग की तरह स्वीकार कर लिया है। व्यवस्था के प्रति विद्रोह की भावना ही इस नयी पीढ़ी से खत्म होती जा रही है। यही कारण है कि आज राजनीति में बाहुबल और धनबल का इतना व्यापक प्रभाव हो गया है कि हमारी विधायिकाऐं अपने अपराधी सदस्यों के भार से कराह रही हैं। चुनाव के दौरान हम में से सभी जानते हैं कि कौन प्रत्याशी कैसा है, लेकिन हमारे प्रभावित हो जाने के अब बहुत से कारण हो जाते हैं। दुनिया के जो देश हमारे लोकतंत्र के लिए प्रेरणास्रोत रहे हैं, वहॉ से हम अब उन प्रतिरोधक तत्त्वों को नहीं ग्रहण कर रहे हैं जो इस जन-शासन को साफ-सुथरा रखते हैं। अमेरिका-ब्रिटेन सरीखे देषों मे मतदाताओं की जागरुकता के कारण अपराधी या दागी तत्त्वों को राजनीतिक दल प्रत्याशी बनाने की हिम्मत नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें पता होता है कि मतदाता न सिर्फ ऐसे प्रत्याशी को नकार देगें बल्कि ऐसे राजनीतिक दलों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। यह भय अपने देश के राजनीतिक दलों को नहीं है, इसलिए वे न सिर्फ अपराधियों को चुनाव जितवा रहे हैं बल्कि सार्वजनिक मंचों से उनकी शान में कसीदे भी पढ़ते हैं।

राजनीतिक दलों को धन मिलने का बड़ा स्रोत देश के उद्योगपति हैं। अभी गत दिनों संसद में पेश बजट में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने बताया कि चालू वित्त वर्ष में कार्पोरेट घरानों को पॉच लाख करोड़ रुपये की टैक्स छूट मिली है, और सरकार की इस मद मे प्राप्ति कुल पौने आठ लाख करोड़ की ही है! उद्योगपति राजनीतिक दलों को चंदे देकर बाद में उनसे तमाम प्रकार की सहूलियतें हासिल करते हैं। यही हाल नेताओं व नौकरशाहों के परिजनों द्वारा बनाए गये तथाकथित ट्रस्टों का भी है जो एक तरफ तो भारी भरकम चंदा पाते हैं और दूसरी तरफ चंदा देने वाले न सिर्फ छूट पाते हैं बल्कि नेताओं व नौकरशाहों का अनुग्रह भी। यह एक बड़ा खेल है जो न सिर्फ राजनीति को बल्कि पूरे देश और समाज को प्रभावित करता है।

भारतीय राजनीति में ईमानदारी की संभावनाऐं तभी बन सकती हैं जब स्वच्छ छवि वाले लोग चुनाव मैदान में आयें। सारा दोष पैसे का ही नहीं है। पैसा तो माध्यम तलाशता है। मतदाताओं के आग्रह जब तक नहीं बदलेंगे, बदलाव की संभावना क्षीण ही रहेगी। अपने देश में जनता के हल्ला-गुल्ला मचाने के लिए तमाम अवसर जान-बूझ कर शासकों ने छोड़ दिये हैं ताकि उसका गुस्सा इकठ्ठा न होने पाये। यही अवसर जिन देशों में नहीं हैं वहॉ इन दिनों बदलाव की क्रांति आई हुई है।


? सुनील अमर