संस्करण: 28 मार्च -2011

किसका हित-संरक्षण कर रही है शिवराज सरकार ?

? महेश बाग़ी

 

ध्यप्रदेश की शिवराज सरकार किसानों के हित-संरक्षण के दावे कर रही है। अख़बारों में बड़े-बड़े विज्ञापन प्रकाशित हो रहे हैं, जिनमें मुख्यमंत्री एक किसान को गले लगाए हुए हैं, लेकिन क्या वास्तव में यह सरकार किसानों का हित-संरक्षण कर रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह सरकार बड़े उद्योग घरानों को लाभ पहुंचा कर किसानों का सरेआम शोषण कर रही है। फिर वह चाहे धान ख़रीदी का मामला हो, या फिर किसानों को कृषि विभाग से दी जाने वाली सब्सिडी का। दोनों मामलों में किसान लुटने को मज़बूर हैं और उद्योगपति तथा अफ़सरान मालामाल हो रहे हैं। ख़ास बात यह है कि इन मामलों की विधानसभा में गूंज होने के बाद भी सरकार ने अपनी नीतियों में कोई बदलाव नहीं किया है।

सोयाबीन के साथ-साथ मध्यप्रदेश धान उत्पादन के मामले में भी लगातार प्रगति कर रहा है। कलाघाट जिले के बाद होशंगाबाद, रायसेन आदि ज़िले भी रिकार्ड धान उत्पादन कर रहे हैं। इन धान उत्पादन किसानों का शोषण कर चंद बड़े घरानों को लाभ पहुंचाने में भाजपा सरकार ने नियमों में संशोधन करने से भी परहेज नहीं किया। गत वर्ष धान का ख़रीदी मूल्य 2800 से 3200 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया था। बाज़ार गवाह है कि महंगाई के कारण हर चीज़ की क़ीमत में इज़ाफा हुआ है, किंतु धान उत्पादक किसान अपनी उपज का सही दाम पाने से वंचित हैं। सरकार ने इस साल धान का ख़रीदी मूल्य 1600 से 1900 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया है। कहने की ज़रूरत नहीं कि किसान धान मिल मालिकों के हाथों लुटने के लिए छोड़ दिए गए हैं। ख़ास बात यह है कि 16 से 19 रुपए प्रति किलो की दर से ख़रीदे गए इसी धान से चावल निकाल कर 60 से 80 रुपए प्रति किलो में बेचा जा रहा है। इसमें भी अधिकांश चावल निर्यात कर दिया जाता है।

यह तो हुई किसानों के शोषण की एक बानगी, अब बड़े धान-मिल मालिकों की भी सुध ली जाए। शिवराज सरकार ने पंजाब और हरियाणा के दो बड़े धान मिल मालिकों को प्रवेश कर, वृत्ति कर और मंडी कर से छूट दे दी है। इसके लिए कैबिनेट में बाकायदा प्रस्ताव पारित किया गया है। इन दो धान मिल मालिकों को करों में ग्यारह प्रतिशत छूट देने का यह बहाना खोजा कि इनकी धान मिलों की अधोसंरचना दस हज़ार करोड़ से ऊपर है। सरकार से मिली छूट का लाभ उठा कर उक्त दो धान मिले प्रदेश के कुल धान उत्पादन का तीन चौथाई हिस्सा ख़रीद कर भारी मुनाफ़ा कूट रही हैं। यहां यह सवाल सहज ही उठता है कि मात्र दो बड़ी धान मिलों पर शिवराज सरकार ने मेहरबानी क्यों दिखाई ? क्या इसमें बड़े पैमाने पर मिली भगत की बू नहीं आती है ? जो सरकार किसानों के हित-संरक्षण का दावा कर रही है, वह सरकार मात्र दो धान मिलों को मंडी शुल्क में छूट क्यों दे रही है ? क्या इससे किसानों का शोषण नहीं हो रहा है ? ग़ौरतलब है कि मंडी शुल्क से प्राप्त राशि किसानों के कल्याण पर ख़र्च की जाती है ? फिर इस शुल्क में छूट देकर किसानों का कौन-सा कल्याण होगा ?

इसी सरकार के राज में किसानों को सब्सिडी देने के नाम पर भी ठगा जा रहा है। याद रहे कि राज्य का कृषि विभाग किसानों को कृषि उपकरण ख़रीदने के लिए सब्सिडी प्रदान करता है, जैसे-कृषि उपकरण, सिंचाई पंप, विद्युत-डीज़ल पंप, दवा छिड़काव यंत्र आदि की ख़रीदी पर यह सब्सिडी दी जाती है। विद्युत-डीजल पंप पर 50 फ़ीसदी तथा कृषि सिंचाई पंप पर 80 फीसदी अनुदान दिया जाता है। इस सब्सिडी के नाम पर किसान ठगी के शिकार हो रहे हैं। कृषि विभाग द्वारा किसानों को सब्सिडी के नाम पर जो उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं, उनकी दर और बाज़ार मूल्य में भारी अंतर है। यानी कृषि विभाग द्वारा सब्सिडी के साथ दिए गए उपकरण का बाज़ार मूल्य कम है।

उदाहरण के लिए विभिन्न ब्रांडेड कंपनियों के विद्युत पंप (1 1/2 ग 2 एचपी) का बाज़ार मूल्य 6500 से 7500 रुपए है, किंतु कृषि विभाग द्वारा यही विद्युत पंप किसानों को 7900 रुपए में दिया जा रहा है। मोटर पंप में 50 फ़ीसदी अनुदान देने के बावजूद उनकी क़ीमत बाज़ार मूल्य से अधिक क्यों है ? जब किसान को बाज़ार में सस्ती दर पर यही यंत्र मिल रहा है, तो सब्सिडी का क्या औचित्य रह जाता है ? इसी प्रकार सिंचाई के पाइप में 80 फ़ीसदी अनुदान का प्रावधान है, यदि एक किसान 20-20 फीट की लंबाई वाले 40 पाइप ख़रीदता है, तो उसे आठ हज़ार रुपए ख़र्च करना पड़ते हैं। इस प्रकार सब्सिडी मिलने के बाद उसे प्रत्येक पाइप एक हज़ार में मिलता है, जबकि खुले बाज़ार में यही पाइप 180 से 220 रुपए में आसानी से मिल रहा है। होना तो यह चाहिए कि किसान जो भी कृषि उपकरण ख़रीदना चाहता है, उसे उसके हिसाब से सब्सिडी का लाभ देकर खुले बाजार से ख़रीदने की स्वतंत्रता होना चाहिए, किंतु ऐसा नहीं हो रहा है। कृषि विभाग के अधिकारी कृषि उपकरणों की मनमानी क़ीमत आंक कर उसमें सब्सिडी कम करने का दिखावा करते हैं। इससे किसानों को तो सब्सिडी का लाभ नहीं मिल पाता है, उल्टे अधिकारी और सप्लायर एजेंसी मालामाल हो जाती है। सब्सिडी का यह गोरखधंधा पूरे प्रदेश में खुले आम चल रहा है और इसे रोकना तो दूर, इस ओर नज़र डालने की किसी को फुर्सत ही नहीं है।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद को किसान-पुत्र कहते नहीं अघाते हैं और खेती को लाभ का धंधा बनाने के दावे करते हैं, जबकि उन्हीं के राज में भोले भाले किसानों को सरकार के ही संरक्षण में सरेआम शोषण हो रहा है, मुख्यमंत्री वास्तव में किसानों के कितने बड़े हित-रक्षक हैं, यह इसी से समझा जा सकता है कि उनकी सरकार ने राज्य किसान आयोग को ही भंग कर दिया है, जबकि भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में इस आयोग को और अधिक अधिकार संपन्न बनाने की बात कहीं गई थी। सरकार की इन किसान-विरोधी नीतियों के खिलाफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुषांगिक संगठन भारतीय किसान संघ ने दो दिनों तक राजधानी को बंधक बनाए रखा था। दुर्भाग्य से सरकार की नींद आज तक नहीं खुली है। यह है शिवराज सरकार के किसान-हितैषी होने की असली सच्चाई।


? महेश बाग़ी