संस्करण: 28 मार्च -2011

आका चिंता न करे हमारे खाने और
दिखाने के दांत अलग है : आडवानी

? एल.एस.हरदेनिया

 

जो भाजपा दो दिन पहले तक जोर-जोर से चिल्लाकर, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और उनकी पूरी सरकार का त्यागपत्र मांग रही थी, उसपर ऐसी मार पड़ी कि उसकी आवाज निकलनी ही बंद हो गयी।

अमरीका के राजनयिक संदेशों में कांग्रेस पर आरोप लगाया गया था कि उसने कुछ सांसदों को रिश्वत देकर अपनी सरकार को बचाया। परंतु उन संदेशों में इस बात का उल्लेख नहीं था कि रिश्वत की धनराशि किसने दी और किसे दी। इस तरह, इन संदेशों की विश्वसनीयता संदेहास्पद है परंतु 19 मार्च 2011 को प्रकाशित विकीलिक्स के संदेशों में भाजपा के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवानी के नाम का उल्लेख है। उन अमरीकी राजनयिकों का भी उल्लेख है जिनके साथ आडवानी की बातचीत हुई थी।

लीक किये गये संदेशों के अनुसार, जो दैनिक द हिन्दू में 19 मार्च को प्रकाशित हुये है, आडवानी की 13 मई 2009 को अमरीकी दूतावास के चार्ज-ड अफेयर पीटर बर्ले से बातचीत हुई थी। इसके अगले दिन, लोकसभा के चुनाव के नतीजे घोषित होने वाले थे। यदि चुनाव में भाजपा की जीत होती तो आडवानी प्रधानमंत्री बनते। चार्ज-ड अफेयर ने आडवानी से मुलाकात कर उनसे भारत-अमरीकी संबंधों के संबंध में कुछ स्पष्ट आश्वासन मांगे थे। आडवानी ने कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर भाजपा की स्थिति स्पष्ट करते हुए साफ शब्दों में कहा कि जहां तक उनकी पार्टी की विदेश नीति, वह भी विशेषकर अमरीका के संदर्भ में, का सवाल है, उनकी  पार्टी के खाने के और दिखाने के दांत अलग हैं। 

आडवानी ने कहा कि जहां तक भारत-अमरीका अणुशक्ति करार का सवाल है, हमने दिखावे के लिए अपना विरोध अवश्य प्रगट किया है परंतु हम आपको आश्वासन देते हैं कि हम  समझौते में रंचमात्र भी परिवर्तन नहीं करेंगे। हमारा हस्ताक्षरित हो चुके समझौते में परिवर्तन करने का कोई इरादा नहीं है।  आडवानी के अतिरिक्त, भाजपा के एक प्रमुख प्रवक्ता शेषाद्री चारी ने अमरीकी दूतावास के प्रमुख अधिकारियों को आश्वस्त किया कि उनकी पार्टी के विदेश नीति संबंधी प्रस्ताव में अमरीका के संबंध में जो आलोचनात्मक हिस्से हैं, वे सिर्फ दिखावा हैं। प्रतियोगी राजनीति की खातिर हम ऐसा करते है। आप उसे गंभीरता से न लें।

इसी तरह, एक अन्य गुप्त संदेश में बताया गया कि 26-27 दिसंबर 2005 को भाजपा कार्यकारिणी ने एक प्रस्ताव पारित कर तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर यह आरोप लगाया था कि उसकी विदेशी नीति अमरीका-परस्त हैं। जब इस प्रस्ताव के बारे में अमरीकी राजनयिक ने चर्चा की तो भाजपा की तरफ से यह आश्वासन मिला कि वे इसे गंभीरता से न लें। भाजपा के असली रवैये का विश्लेषण करते हुए अमरीकी राजनयिक रार्बट ब्लेक ने बताया कि भाजपा की ओर से बार-बार यह आश्वासन मिलता रहा है कि उसका अमरीका-विरोध केवल देशवासियो को दिखाने के लिए है। हमें यह भी आश्वासन दिया जाता रहा है कि अमरीकी नीतियों की आलोचना, वास्तव में भाजपा के अनुयायियो का उत्साह कायम रखने के लिए की जाती है  ताकि उनका यह भ्रम कायम रहे कि विदेशी नीति के मामले में भाजपा की सोच पूरी तरह स्वतंत्र है। 

कुल मिलाकर, अमरीकी दूतावास के प्रतिनिधियों को बार-बार यह समझाया जाता रहा कि भाजपा जब विरोधी दल की भूमिका में होती है तो अमरीका के प्रति उसका रवैया विरोधात्मक रहता है परंतु सत्ता में आते ही उसका रवैया अमरीका-परस्त हो जाता है। इस तरह का आश्वासन जिन भाजपा नेताओं ने दिया, उनमें लालकृष्ण भी शामिल थे। आडवानी ने बार-बार यह आश्वासन दिया कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद भी भारत के अमरीका के साथ संबंध वैसे ही बने रहेंगे। उनमें कोई अंतर नहीं आयेगा।

अमरीकी राजनयिकों ने आडवानी से बातचीत के दौरान जानना चाहा कि जुलाई 2008 में भाजपा की तरफ से यह कहा गया था कि भारत-अमरीकी अणुसंधि भारत के बुनियादी हितों के विरूध्द है और चुनाव के बाद सत्ता में आने पर भाजपा उसका पुनर्मूल्यांकन करेगी। इस पर आडवानी ने यह टिप्पणी की कि विदेशी नीति रोज बदलने वाली चीज नहीं है। जहां तक अन्तर्राष्ट्रिय समझौतों का सवाल है, उन्हें हल्के-फुल्के ढंग से नहीं लिया जाना चाहिए। 

इस संबंध में आडवानी ने एक उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि सन् 1972 के भारत-पाकिस्तान समझौतों का हमने जमकर विरोध किया था परंतु सन् 1977 में सत्ता में आने के बाद हमने उस संधि को नहीं तोड़ा। आडवानी ने यह भी स्पष्ट किया कि सारी दुनिया, भारत-पाकिस्तान संबंधों को कश्मीर के चश्मे से देखती है। वास्तव में कश्मीर तो अनेक मुद्दों में से एक मुद्दा है जिस पर भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेद हैं। उन्होंने कहा कि मेरे जीवन के प्रारंभिक 20 वर्ष कराची में बीते हैं इसलिए मुझे भारत-पाक संबंधों की समझ है। मेरी राय में भारत-पाकिस्तान  के बीच मतभेदों का एक मुख्य कारण यह है कि हमारे यहां वास्तविक प्रजातंत्र  है जबकि पाकिस्तान में ऐसी स्थिति नहीं है।

 अमरीकी राजनयिकों से आडवानी समेत अन्य भाजपा नेताओं की बातचीत से यह स्पष्ट है कि भाजपा किस हद तक अमरीका परस्त है। यह साफ है कि भाजपा को सदा यह चिंता रही है कि उसके संबंध अमरीका से मधुर बने रहें भले ही ऐसा करने के लिए देश के हितों को बलाये ताक रखना पडे। 

यदि हम इतिहास पर नजर ड़ालें तो स्पष्ट होता है कि भाजपा (और उसका पूर्ववर्ती जनसंघ) शुरू से ही इसी नीति पर चलती आ रही है। आजादी के बाद से, सोवियत संघ और अन्य समाजवादी देशों से हमारे  दोस्ताना संबंध थे। अनेक नवस्वतंत्र देशों की विदेशी नीति के निर्धारण में भारत और जवाहरलाल नेहरू की प्रमुख भूमिका थी। इन तमाम देशों ने भारत के नेतृत्व में गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई थी। गुटनिरेपक्षता की नीति नवस्वतंत्र देशों के हित में थी। इसके बावजूद, भाजप एवं उसके पहले जनसंघ इस नीति का विरोधी रहा। जब वियतनाम पर अमरीका का हमला हुआ उस समय भी जनसंघ की सहानुभूति अमरीका के साथ थी। हमारी सरकार फिलस्तीनियों का समर्थन करती थी परंतु जनसंघ इजराइल का समर्थक था।

इस तरह, जनसंघ और बाद में भाजपा के अमरीका-परस्त होने के एक नहीं सैकड़ों उदाहरण दिये जा सकते हैं। जिन अमरीकी संदेशों के आधार पर आडवानी, डॉ. मनमाहेन सिंह का त्यागपत्र मांग रहे हैं, उन्हीं संदेशों के आधार पर क्या आडवानी को भाजपा संसदीय दल के नेता के पद से त्यागपत्र नहीं दे देना चाहिए?


? एल.एस.हरदेनिया