संस्करण: 28 मार्च -2011

मानव अंगों का अवैध व्यापार रोकेगी सरकार

संदर्भ : अंग प्रत्यारोपण अधिनियम

? डॉ. गीता गुप्त

 

भारत तेज़ी से मानव-अंगों की ख़रीद-फरोख्त का एक बाज़ार बनता जा रहा है। तीन वर्ष पूर्व जब गुड़गांव का किडनी-काण्ड उजागर हुआ था तभी यह सत्य सामने आया था। एक डॉक्टर और उसके साथी पांच सौ से अधिक लोगों के गुर्दे निकालकर मोटी रकम वसूलते हुए गुर्दा प्रत्यारोपण का व्यापार करते रहे और पुलिस को ख़बर तक न हुई। हाल ही में दिल्ली नगर निगम के सबसे बड़े अस्पताल बाड़ा हिन्दू राव में मानव अंगों के कथित अवैध व्यापार का मामला प्रकाश में आया है। अस्पताल के डॉ. अमरेन्द्र पाठक पर आरोप है कि उनके द्वारा सन्त नगर (बुराड़ी) के निवासी 82 वर्षीय एक मरीज़ की किडनी धोखे से निकाल ली गई है। जबकि मरीज़ को पेशाब की थैली में कैंसर की तकलीफ़ है। सच्चाई चाहे जो भी हो किन्तु ऐसे मामलों में सिर्फ़ डॉक्टर ही दोषी नहीं होता। कभी-कभी अंग प्रत्यारोपण के लिए ज़रूरतमंद समृध्द व्यक्तियों द्वारा मानव अंगों की कीमत चुकाने की ख़बर भी मिलती है। लेकिन अपनी आर्थिक मजबूरी के कारण अपने अंगों का सौदा करने वालों की भी कमी नहीं है। इसके अलावा दलालों द्वारा निर्धन और लाचार वर्ग के अंगों के बदले मोटी रकम वसूलने के बावजूद उन्हें मामूली रकम देकर मामला निपटाने की ख़बरें भी पढ़ने-सुनने में आती है। ऐसे सभी मामलों के लिए हमारी व्यवस्था और क़ानून दोनों जिम्मेदार हैं।

वस्तुत: चिकित्सा-पध्दति में अंग-प्रत्यारोपण का बहुत महत्व है। जिन मानव अंगों का प्रत्यारोपण संभव है वे हैं-हृदय, यकृत, गुर्दा, फुफ्फुस, अग्नाशय, अंतड़ी, ऊतक में हड्डियां, नस, कार्निया, त्वचा, हृदय का वाल्व और शिराएं। सर्वाधिक प्रत्यारोपण गुर्दे का होता है। किडनी, हृदय और यकृत की गंभीर बीमारी से जूझने वालों के लिए मस्क्यूलों स्केलेटर प्रत्यारोपण कहलाने वाला यह उपचार प्राय: जीवनदायी सिध्द होता है जो कि समूचे विश्व में प्रचलित है। लेकिन प्रत्यारोपण के लिए अंगों की उपलब्धता एक जटिल समस्या है। भारत में 1960 में अंग प्रत्यारोपण आरंभ हुआ लेकिन कालान्तर में यहां मानव अंगों के क्रय-विक्रय ने व्यापार का रूप ले लिया। फलत: इसे नियंत्रित करने के लिए सरकार द्वारा अंग प्रत्यारोपण अधिनियम 1994 बनाया गया। तदनुसार सिर्फ़ सगे माता-पिता, भाई-बहन और पति-पत्नी ही आवश्यक होने पर एक दूसरे को अंग दान कर सकते थे।

सन् 1999 में इस अधिनियम में संशोधन कर चाचा-चाची, मौसा-मौसी और बुआ आदि को भी अंग दान के लिए स्वीकृति दी गई। 2001 में भावनात्मक लगाव वाले संबंधों को भी मान्यता दी गई। लेकिन निकट संबंधियों के अंगदान हेतु जो औपचारिकताएं हैं वे इतनी जटिल हैं कि मरीज़ को लंबे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। उदाहरणार्थ यदि रिश्तेदार किसी दूसरे ज़िले या राज्य में सेवारत् हो तो उसे अंगदान के लिए संबंधित संभाग की समिति से अनुमति लेनी होगी। दोनों ज़िलों से अनुमति लेने में ही काफ़ी समय बीत जाता है अत: मरीज़ को यथा समय उपचार नहीं मिल पाता।

भारत ही नहीं वरन् समूचे विश्व में ऐसे रोगियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है जिन्हें अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता है। हमारे देश में कागज़ी कार्रवाईयों की जटिलता के कारण मरीज़ के रिश्तेदार अंगदान नहीं कर पाते। ऐसे चिकित्सालयों की संख्या भी बहुत कम है जहां अंग प्रत्यारोपण की सुविधा हो। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से संबंधित लोकसभा की स्टेंडिंग कमेटी वर्ष 2010 की रिपोर्ट पर आधारित जानकारी के अनुसार हमें 1 5 लाख किडनी, पांच हज़ार हृदय, पचास हजार लीवर और एक लाख आंखों की आवश्यकता हर वर्ष होती है। मगर उपलब्धता मात्र चार हज़ार किडनी और अढ़तीस हज़ार आंखों की है। लीवर और हृदय की उपलब्धता एकदम नगण्य है। इसका एक कारण भारतीय समाज में देहदान और अंग-दान के प्रति जागरूकता का अभाव भी है।

उल्लेखनीय है कि यदि मरणोपरांत अंगदान की परंपरा विकसित हो जाए तो ज़रूरतमंदों को अंग सहज सुलभ हो सकते हैं। ऋषि दधीचि ने प्राणोत्सर्ग कर अपनी अस्थियां सृष्टि के कल्याण हेतु समर्पित की थीं। सभी धर्मों में मृत्यु के बाद अन्त्येष्टि की अलग-अलग परंपरा है। तदनुसार पंच तत्वों से निर्मित देह पंच तत्वों में ही विलीन कर दी जाती है किन्तु यदि पहले से मरणोपरांत देहदान या अंगदान का संकल्प व्यक्त कर दिया जाए तो मृत्यु के बाद भी सच्चे मानव धर्म का निर्वाह संभव है। एक शव जहां चिकित्सा-विज्ञान के अध्ययन में विद्यार्थियों के लिए उपयोगी होगा, वहीं अन्य अंगों के दान से मानव-अंगों के अवैध क्रय-विक्रय को रोकने में मदद मिलेगी। अतएव समाज में मरणोपरांत अंगदान और देहदान के लिए संकल्प अभियान चलाने की आवश्यकता है।

यह भी विडंबना है कि इस विशाल देश में किडनी प्रत्यारोपण की सुविधा लगभग एक सौ अस्पतालों तथा लीवर प्रत्यारोपण की सुविधा मात्र दस अस्पतालों में ही है। फ़िलहाल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सन् 2005 में जारी दिशा-निर्देशानुसार अंग-प्रत्यारोपण की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन मानव अंगों के बढ़ते अवैध व्यापार ने सरकार को चिंतित कर दिया है। अंग प्रत्यारोपण अधिनियम में अब तक किये गए संशोधनों से भी इस समस्या का हल नहीं हो सका हैं। सन् 2004 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने अंग प्रत्यारोपण अधिनियम 1994 की समीक्षा हेतु एक समिति गठित की थी जिसकी रपट मई 2005 में प्रस्तुत की गई। इस रपट और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंग प्रत्यारोपण्ा संबंधी सिध्दांतों के प्रारूप को ध्यान में रखते हुए सरकार ने मानव अंग प्रत्यारोपण बिल 2009 प्रस्तावित किया। उस पर संसदीय समिति ने कई दौर की सुनवाई के बाद पिछले वर्ष कुछ सिफ़ारिशें की थीं। जिन्हें मान लिया गया है और अब 17 मार्च 2011 को उक्त अधिनियम को स्वीकृति दे दी गई है।

ग़ौरतलब है कि उक्त संशोधित अधिनियम तीसरी बार लोकसभा में रखा जा रहा है। यदि यह लागू हो सका तो प्रति वर्ष तीन लाख से अधिक मरीजों की जीवन-रक्षा संभव हो सकेगी। वर्ष 2008 में हुए संशोधनों के अनुसार दस्तावेजों की औपचारिकता इतनी अधिक थी कि मरीज़ों को राहत नहीं मिल सकी। 2009 में भी जब स्वास्थ्य मंत्री द्वारा उक्त अधिनियम लोकसभा में प्रस्तुत किया गया तो स्टेंडिंग कमेटी ने उसे स्वीकृति नहीं दी। इस बार सरकार अंग-प्रत्यारोपण की क़ानूनी प्रक्रिया को सरल बनाने के अलावा जटिल कागज़ी कार्रवाइयों से मुक्ति दिलाने हेतु भी प्रतिबध्द दिख रही है। अतएव आशा है कि प्रस्तावित अधिनियम 2009 को मंजूरी मिल जाएगी और यह लागू हो सकेगा। यह गोवा, पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और सभी केन्द्रशासित राज्यों में लागू होगा। अन्य राज्य भी अपनी विधानसभाओं में एक संकल्प पारित कर इसे लागू कर सकेंगे।

प्रस्तावित अधिनियम में कुछ महत्वपूर्ण संशोधन समाहित हैं। जैसे-

n तदनुसार पड़दादा-दादी और पड़पोता-पोती भी अंगदान हेतु निकट संबंधी माने जाएंगे।

n अस्पतालों में प्रत्यारोपण से संबंधित मामलों का समन्वय करने के लिए प्रत्यारोपण समन्वयक नियुक्त किए जाएंगे।

n अभी तक अंगदानकर्ता मृत्यु से पूर्व अपने अंगों को निकालने का अधिकार दे सकता था। यदि उसके द्वारा ऐसा कोई अधिकार न दिया गया हो और कोई आपत्ति भी न जतलायी गई हो तो वह व्यक्ति जिसके अधिकार में कानूनी रूप से मृतक का शरीर है, मृतक के संबंधियों की सहमति से उसके अंगों को निकालने की अनुमति दे सकता था। प्रस्तावित बिल में यह प्रावधान भी जोड़ा गया है कि डॉक्टर आईसीयू में भर्ती प्रत्येक रोग और उनके संबंधियों से अंगदान के बारे में जानकारी लेंगे और अंगदान का अधिकार देने का विकल्प खुला रहेगा।

n जीवित अवस्था में अंगदान के लिए राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों द्वारा प्राधिकरण समितियां गठित की जाएंगी, जिनकी संरचना केन्द्र सरकार तय करेगी। निकट संबंधियों को तो नहीं मगर अन्य व्यक्तियों को जीवित अवस्था में अंगदान हेतु समिति की स्वीकृति लेना अनिवार्य होगा।

n विदेशियों को अंग-प्राप्ति हेतु प्राधिकरण समिति की पूर्व स्वीकृति लेनी होगी।

n मृत्यु से पूर्व अवयस्कों के अंग या ऊतक दान हेतु नहीं निकाले जा सकेंगे।

n अब तक जो उपयुक्त प्राधिकरण अस्पतालों के पंजीयन को स्वीकृत या निरस्त करते थे, अस्पतालों के लिए मानकों का निर्धारण और उनके उल्लंघन की दशा में शिकायतों की जांच तथा अस्पतालों का निरीक्षण करते थे, उन्हें अब किसी व्यक्ति को पेश होने का समन भेजने, कागज़ात प्रस्तुत करने और सर्च वारंट जारी करने हेतु सिविल कोर्ट की शक्तियां भी प्राप्त होंगी।

n ब्रेन-डेड मरीज़ों के अंग लेने को कानूनी मान्यता मिलेगी। सर्जन, फिजीशियन, एनस्थेटिस्ट भी ब्रेन-डेड का प्रमाणपत्र दे सकेंगे।

n प्राधिकरण समिति की सहमति से स्वैप डोनेशन संभव हो सकेगा। यानी अंगदाता एक-दूसरे के मरीज़ को रक्त ग्रुप के हिसाब से अंगदान कर सकेंगे।

n पंजीकृत अस्पतालों में मरीजों से अंगदान के बारे में पूछा जाना अनिवार्य होगा। इसके अलावा अस्पतालों को अंग-प्रत्यारोपण संबंधी जागरूकता लाने हेतु

n प्राधिकार के बिना अंग निकालने की सजा पांच वर्ष से बढ़ाकर दस वर्ष तथा जुर्माने की राशि दस हज़ार से बढ़ाकर पांच लाख करने का प्रावधान है।

n मानव-अंगों की ख़रीद फरोख्त में भी सजा की अवधि दस वर्ष होगी। अर्थदण्ड भी सेक्शन 19 के तहत दस हज़ार से बढ़ाकर पांच लाख और बीस हज़ार से बीच लाख करने का प्रावधान है।

इन सबके अलावा केन्द्र सरकार 'राष्ट्रीय मानव अंग एवं ऊतक पृथक्करण नेटवर्क' की स्थापना भी करेगी और अंगदाताओं एवं प्राप्तकर्ताओं का रिकॉर्ड रखेगी। निश्चय ही संशोधित अंग प्रत्यारोपण अधिनियम के लागू होने की प्रतीक्षा चिकित्सा-जगत ही नहीं आम जनता को भी है क्योंकि इससे जहां मरीजों को जीवनदान मिलेगा, वहीं मानव अंगों के अवैध व्यापार पर नियंत्रण की आस भी जगी है।


? डॉ. गीता गुप्त