संस्करण: 28 मार्च -2011

थमता नहीं आनुवंशिक

बीजों का सिलसिला

? प्रमोद भार्गव

 

देश की जिस संप्रग सरकार की प्रतिबध्दता किसान और खेती से जुड़े स्थानीय संसाधनों के प्रति दिखाई देनी चाहिए वह विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति दिखाई दे रही है। इस मानसिकता से उपजे हालात कालांतर में देश की बहुसंख्यक आबादी की आत्मनिर्भरता को परावलंबी बना देने के उपाय हैं। बीते साल फरवरी में जब पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन की खेती के जमीनी प्रयोगों को बंद करते हुए भरोसा जताया था कि जब तक इनके मानव स्वास्थ्य से जुड़े सुरक्षात्मक पहलुओं की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हो जाती, इनके उत्पादन को मंजुरी नहीं दी जाएगी। इस भरोसे से यह उम्मीद जगी थी कि बीटी बीजों के सिलसिले में अब इकतरफा फैसले नहीं लिए जाएंगे। इसके बावजूद गोपनीय ढंग से मक्का के संकर बीजों का प्रयोग बिहार में किया गया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जब इस वादाखिलाफी की खबर लगी तो उन्होंने सख्त आपत्ति जताते हुए केन्द्रीय समिति में राज्य के प्रतिनिधि को शामिल करने की पैरवी भी की।

नतीजतन पर्यावरण मंत्रालय ने बिहार में बीटी मक्का के परीक्षण पर रोक लगा दी। लेकिन यहां यह आशंका जरुर उठती है कि ये परीक्षण उन प्रदेशों में जारी होंगे, जहां कांग्रेस और संप्रग के सहयोगी दलों की सरकारें हैं। गुपचुप जारी इन प्रयोगों से पता चलता है कि अमेरिका परस्त मनमोहन सरकार विदेशी कंपनियों के आगे इतनी दयनीय है कि उसे जनता से किए वादे से मुकरना पड़ रहा है।

नीतिश कुमार ने पर्यावरण मंत्रालय की कार्य प्रणाली पर न केवल ऐतराज जताया बल्कि एक व्यावहारिक पहलू सामने लाते हुए सलाह दी कि आनुवंशिक अभियांत्रिकी की मंजूरी समिति में राज्य के प्रतिनिधि को भी शामिल किया जाए। बिहार में बीटी मक्का के और धारवाड़ में बीटी बैंगन के प्रयोगों से पहले राज्य के किसी प्रतिनिधि को समिति में लेना जरुरी नहीं समझा गया। राज्य सरकार को प्रयोग की न सूचना दी गई और न ही जरुरी सावधानियां बरती गईं।

भारत के कृषि और डेयरी उद्योग पर नियंत्रण करना अमेरिका की पहली प्राथमिकताओं में है। इन बीजों की नाकामी साबित हो जाने के बावजूद इनके प्रयोगों का मकसद है मोंसेंटो, माहिको बालमार्ट और सिंजेटा जैसी कंपनियों के कृषि बीज और कीटनाशकों के व्यापार को भारत में जबरन स्थापित करना। बिहार में मक्का-बीजों की पृष्ठभूमि में मोंसेंटों ही थी। इसके पहले धारवाड़ में बीटीबैंगन के बीजों के प्रयोग के साथ इसकी व्यावसायिक खेती को प्रोत्साहित करने में माहिको का हाथ था। यहां तो ये प्रयोग कुछ भारतीय वैज्ञानिकों को लालच देकर कृषि विश्व विद्यालय धारवाड़ और तमिलनाडू कृषि विश्व विद्यालय कोयंबटूर में चल रहे थे। जीएम बैगन पहली ऐसी सब्जी थी जो भारत में ही नहीं दुनिया में पहली मर्तबा प्रयोग में लाई जाती। इसके बाद एक-एक कर कुल 56 फसलें वर्ण संकर बीजों से उगाई जानी थीं। लेकिन बीटी बैंगन खेती का देश भर में जबरदस्त विरोध के कारण पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसके प्रयोग व खेती पर प्रतिबंध लगा दिया था। साथ ही यह भरोसा भी जताया था कि इसके मानव स्वास्थ्य से जुड़े सुरक्षात्मक पहलुओं की जब तक वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हो जाती तब तक इसके उत्पादन को इजाजत नहीं देगी। लेकिन राजनेताओं के चेहरे कितने दोमुंहे हैं यह गुपचुप मक्का बीज प्रयोगों से पता चलता है।

दरअसल आनुवंशिक बीजों से खेती को बढ़ावा देने के लिए देश के शासन - प्रशासन को मजबूर होना पड़ रहा है। 2008 में जब परमाणु- करार का हो हल्ला संसद और संसद से बाहर चल रहा था तब अमेरिकी परस्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कृषि मंत्री शरद पवार और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की तिगड़ी ने अमेरिका से एक ऐसा समझौता गुपचुप कर लिया था, जिस पर कतई बहस-मुवाहिशा नहीं हुआ था। इसी समझौते के मद्देनजर बीटी बैंगन को बाजार का हिस्सा बनाने के लिए शरद पवार और जयराम रमेश ने आनुवंशिक बीजों को सही ठहराने के लिए देश के कई नगरों में जन-सुनवाई के नजरिये से मुहिम भी चलाई थी। लेकिन जनता और स्वयं सेवी संगठनों की जबरदस्त मुहिम के चलते राजनेताओं को इस जिद् से तत्काल पीछे हटना पड़ा था।

बीटी बैंगन मसलन संकर बीज ऐसा बीज है, जिसे साधारण बीज में एक खास जीवाणु के जीन को आनुवंशिक अभियांत्रिकी तकनीक से प्रवेश कराकर बीटी बीज तैयार किए जाते हैं। बीज निर्माता कंपनियों की ऐसी दलील है कि कीटाणु इन्हें भोजन नहीं बनाते और इनसे पैदावार अधिक होती है। देश की खाद्य-सुरक्षा को प्रोत्साहित व सुनिश्चित करने की दृष्टि से जीएम खेती की बड़ी आबादी के चलते भारत को सख्त जरुरत है। लेकिन कृषि और स्वास्थ्य से जुड़े भारतीय वैज्ञानिकों का दावा है कि ये बीज आहार की दृष्टि से तो उत्तम हैं ही नहीं स्थानीय और पारपंरिक फसलों के लिए भी खतरनाक हैं। राष्टीय पोषण संसथान, हैदराबाद के प्रसिध्द जीव विज्ञानी रमेश भट्ट ने बीटी बैंगन के हल्ले के समय चेतावनी दी थी कि बीटी बैंगन की खेती शुरु होती है तो इसके प्रभाव से बैंगन की स्थानीय किस्म मट्टूगुल्ला प्रभावित होकर लगभग समाप्त हो जाएगी।

इसके बावजूद हमारे देश की सरकार विदेशी कंपनियों के व्यापारिक हित साधने में लगी हैं। जबकि हम अपने ही देश में बीटी कपास के दुष्परिणाम आज तक भुगत रहे हैं। बीटी कपास के उत्पादन का सिलसिला 2002 में शुरु हुआ था। इस बीज की अब तक खपत लगभग दस हजार करोड़ रुपये की हो चुकी है। यदि यही धन किसानों के हाथ में होता तो देश के ढाई लाख किसानों को आत्महत्या करने की मजबूरी नहीं झेलनी पड़ती। जाहिर है यह धन विदेशी कंपनियों की तिजोरियों में गया और देश का अन्नदाता कंगाल बना।

जीन रुपांतरित बीजों के इस्तेमाल में शर्त होती है कि यदि बीज खराब निकलते हैं तो प्रयोग कर रही कंपनी को किसान को पर्याप्त मुआवजा देना होगा। लेकिन बिहार में इन बीजों से उत्पादित फसल जब कमजोर निकली तो कंपनी के प्रयोगकर्ताओं ने मुआवजा देने की जबावदेही से पल्ला झाड़ लिया। आखिर में इस नुकसान की भरपाई नीतीश कुमार ने राज्य सरकार के खजाने से कराई। मसलन बीटी बैंगन से होने वाली कमाई पर तो विदेशी कंपनियों का पूरा अधिकार है, लेकिन हानि में कोई भागीदारी नहीं ? क्या कंपनियों की इसी चालाकी से किसान और देश के हित सधोंगे ? ऐसे प्रयोगों पर अंकुश लगे, इस दृष्टि से नीतीश कुमार की इस मांग को तरजीह देने की जरुरत है कि आनुवंशिक अभियांत्रिकी समिति में राज्य के प्रतिनिधि को जगह देने के साथ, जन-सरोकारों से जुड़े विशेषज्ञों को भी शमिल किया जाए।


? प्रमोद भार्गव