संस्करण: 28जनवरी-2008

हम समवेत परिवार की ओर से आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

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क्या संवैधानिक मूल्यों की प्रासंगिकता समाप्त हो गयी ?
 इस वर्ष 26 जनवरी को हम एक और गणतंत्र दिवस मनाएंगे। 1950 में 26 जनवरी के ही दिन हमने अपने आपको एक सर्वशक्तिमान गणतंत्र घोषित किया था। उस दिन हम सही मायने में आज़ाद हुए थे। वैसे आज़ादी तो हमें सन् >एल.एस. हरदेनिया


                    


     

गठबंधन राजनीति और न्यूनतम साझा कार्यक्रम
vkजकल यह वाक्य बार बार सुनने को मिल रहा हे कि गठबंधन राजनीति हमारे समय की सच्चाई है व इसे सभी दलों को स्वीकारना चाहिये। भारतीय जनता पार्टी तो अपनी संकीर्णताओं के कारण अपनी >वीरेन्द्र जैन


भाजपा मोह से गिरती उमा भारती की साख
साध्वी उमाश्री भारती, देखने, सुनने में भले ही तेज तर्रार लगती है, लेकिन दिल दिमाग से वे बड़ी भोली और भावुक हैं। वे भारतीय जनता पार्टी में रहकर उसकी रीतिनीति और उसके नेताओं के रवैये के खिलाफ जब तब खुलकरे>विनय दीक्षित


               


       

वाह री भाजपा सरकार, चारों ओर हाहाकार, शासकीय दफ्तर खाली बाबू कर रहे हैं दलाली, नेता बने मवाली
भाजपा के राज में फैले कुशासन और भ्रष्टाचार से चारों ओर चीत्कार व हाहाकार है इस बहरी, गूंगी, अंधी सरकार में चौकीदार से लेकर कलेक्टर तक अपने कर्तव्यों >अनिल उत्साही


संगठन और सत्ता में समन्वय की तस्वीर
संगठन के बगैर सत्ता की कल्पना को साकार करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए मुश्किल है। यही कारण है कि सभी राजनीतिक दल, नेता अपने संगठन की मज़बूती पर जोर देते हैं। संगठन तभी मज़बूत होता है जब कार्यकर्ता नेतृत्व से अपने  >अमिताभ पाण्डेय


        


            


न्यायपालिका की अवमानना का सवाल
पिछले कुछ सालों से एक ओर जहाँ न्यायपालिका अत्यधिक सक्रिय दिखाई दे रही है, वहीं उसकी मानहानिक के मामलों में भी अपेक्षाकृत वृध्दि हुई है, जो चिंताजनक है। पिछले दिनों अंगरेज़ी दैनिक मिड डे के पत्रकारों को    >महेश बाग़ी


दोषपूर्ण है जलप्रबंधन अभी से पड़ने लगा पेयजल का टोटा ''अल्ला जाने क्या होगा आगे ?''
महान नदियों का पावन देश है भारत। विश्व की प्राचीन संस्कृतियों में विश्व गुरू की भूमिका से जिसकी अपनी एक अलग आधयात्मिक, धार्मिक और   > राजेन्द्र जोशी


               


 

अब आटोमोबाइल बाजार में भी क्रांति
इतिहास के पन्नों में शीघ्र ही एक और क्रांति दर्ज हो जाएगी। जिसका नाम होगा आटोमोबाइल। टाटा मोटर्स ने लखटकिया कार नैनो का निर्माण कर इस ओर कदम भी बढा दिया है। अगर रतन टाटा जनता की इस ड्रीम कार क  >मंतोष कुमार सिंह


''प्रशासनिक सुधार-विकास की पहली शर्त''
विकास की किसी भी अवधारणा अथवा आदर्श पर सहमति आसान नहीं है। विकास एक ऐसा शब्द है जो प्रत्येक स्थिति, व्यक्ति, समाज तथा संगठन की दृष्टि से अलग-अलग अर्थ रखता है। इसे एक ऐसी प्रक्रिया मानना उपयुक्त होगा >स्वाति शर्मा


         


       


शिक्षा के ढाँचे में हो बदलाव
भारतीय शिक्षण पध्दति में युगानुकूल बदलाव न आने के कारण कई विसंगतियों और विभ्रमों के पुंज ने इसकी दीवार को आज़ादी के साठ साल भी मज़बूत नहीं किया। राजनीतिक पूर्वाग्रहों और वाद से यह अब भी नहीं उबर पाय > अंजनी कुमार झा


साम्यवादी सोच का पूंजीवादी में विलय
ज्योति बसु द्वारा समाजवादी सोच के परिप्रेक्ष्य में पूंजीवादी वकालात राष्ट्रीय हित की दृष्टि से अच्छी घटना नहीं है। वैचारिक असहमतियों के बावजूद एक स्वस्थ्य लोकतंत्र में विचारधारायें और उनके प्रति प्रतिबद्धता समान्तर गतिमानै   >प्रमोद भार्गव


                  


 


मुस्लिम समाज के लिए एक तरक्कीयाना फतवा
हमारे यहां मुसलमानों की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था दारूल उलूम देवबंद की इस बिना पर हमेषा आलोचना होती रहती है कि इसके जरूरी और गैर जरूरी फतवों के असर से ही मुस्लिम समाज पिछड़ा हुआ है. जब भी वह दुनिया की चाल से चाल > ज़ाहिद खान


''घास की रोटी, आत्महत्या को मज़बूर : बुन्देलखण्ड''
''किसानों की व्यथा, दशा देखकर मुझे लगता है मैं इस्तीफा दे दूँ। भोपाल जाकर नीचे के खुदाओं से कहुंगा कि वे किसानों के लिए कुछ करें।''  > राजेन्द्र श्रीवास्तव


                   


          


पोलियो और बर्ड फ्लू- फिर खतरे की आमद
पिछले दिनो देश के लिए खतरे की घंटियां सुनाई दी।स्वास्थ्य के क्षेत्र में दो बुरी खबरों ने सबको हिलाकर रख दिया। इन खबरों पहली है पोलियों के नये मामले सामने आने की तो दूसरी है बर्ड फ्लू की दस्तक।अमिताभ बच्चन, >अखिलेश सोलंकी


आज़ादी के छ: दशक और भारतीय नारी
पिछले दो-ढाई दशक से भारतीय नारी स्वयं को पुरुष के समकक्ष स्थापित करने की पुरज़ोर कोशिश कर रही है। आज़ादी के साठ बरस बाद भी उसे ऐसा प्रतीत होता है कि वह जितने की अधिकारिणी है, समाज में उतना सम्मान > डॉ. गीता गुप्त


                    


                    


आम आदमी से दूर होती रोटी
विशेषज्ञों का आंकलन है कि वर्तमान मूल्यों के आधार पर एक आदमी के दैनिक आहार का न्यूनतम व्यय 128 रूपये पड़ता है, अर्थात एक आदमी के आहार व्यय की पूर्ति के लिए 3840रूपये प्रतिमाह आवश्यक है। इस प्रकार चार >डॉ. सुनील शर्मा


 
                  28 जनवरी  2008
 

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