संस्करण: 28 फरवरी -2011

प्राथमिक शिक्षा में महिला शिक्षक आगे !

? अंजलि सिन्हा

 

मानव संसाधन विकास मन्त्रालय की एजेन्सी न्यूपा के ताजा सर्वेक्षण के अनुसार प्राथमिक विद्यालयों में महिला शिक्षकों की संख्या बढ़ रही है। देश में पहली से 8 वीं कक्षा तक के लगभग 58 लाख शिक्षक हैं जिनमें 45 फीसद महिलायें हैं। कुल जनसंख्या में भी महिलाओं की हिस्सेदारी 48 प्रतिशत है। सर्वेक्षण के मुताबिक 12 राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों में महिला शिक्षकों का प्रतिशत आधो से अधिक है। सबसे अधिक 83 फीसदी चण्डीगढ़ में , 78 फीसदी गोवा में , 77 फीसदी तमिलनाडु में, 74 फीसदी दिल्ली में , 65 फीसदी पंजाब में , 55 फीसदी कर्नाटक में आदि। उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश , बिहार , झारखण्ड में इनका फीसद आधो से कम है।

इस सर्वेक्षण रिपोर्ट से पहले ही हम सहजबोध के आधार पर यह अन्दाजा लगा सकते थे कि इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी अच्छी-खासी है। यदि निजी स्कूलों की भागीदारी जोड़ लें तो और आगे हो सकता है क्योंकि सरकारी में फिर भी पुरुषों की नियुक्ति हो जाती है लेकिन प्राइवेट स्कूलों में उनकी संख्या काफी कम होती है। बड़ी कक्षा में जाकर विज्ञान, गणित या स्पोर्टस आदि के क्षेत्र में पुरुष शिक्षकों को फिर भी स्थान मिल जाता है लेकिन संख्या कम होती है।

इस सन्दर्भ में एक बात तो यह कही जा सकती है कि वजह चाहे जो हो लेकिन कमसे कम प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र ने महिलाओं को सार्वजनिक दायरें में तथा परिवार में ''कमाने'' वाले सदस्य का स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। शिक्षिका बनने के लिये घर-परिवार तथा समाज से ज्यादा प्रतिरोध का सामना भी नहीं करना पड़ता है।

हमारे समाज में प्राथमिक शिक्षा का क्षेत्रा एक तरह से परिवार का ही एक्स्टेन्शन माना जाता है। चूंकि घर के अन्दर बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी औरत की मानी जाती है और दाखिले के समय भी बच्चे छोटे ही होते हैं लिहाजा यह स्वाभाविक मान लिया गया कि महिलाएं इसे बेहतर निभा सकती हैं। कम उम्र के बच्चों की पढ़ाई में ज्ञान कम और भावनात्मक रूप से बच्चों की देखरेख करने की जरूरत को सभी समझते हैं। यह काम जेण्डर स्टीरियोटाइप सोच के तहत माना गया कि महिलाएं अच्छा करेंगी। सम्भव है कि वाकई वे अच्छा करती हों लेकिन उसका कारण यह नहीं कि वहीं अच्छा कर सकती हैं और पुरुष नहीं कर सकते बल्कि यह काम वहीं करती आयी हैं और पुरुष ने इसे अपना काम समझा नहीं।

सवाल यह है कि यदि प्राथमिक स्तर पर वे इस जिम्मेदारी को सम्भाल रही हैं और आगे है तो उच्च स्तर के शिक्षा में क्यों पीछे है? क्या उच्चस्तरीय ज्ञान हासिल करने और फिर यह सेवा देने में वे अक्षम साबित हुई है ? ऐसा कोई भी अध्ययन रिपोर्ट नहीं आया है। बल्कि समाज में उनके लिये अवसर उपलब्ध नहीं कराया गया है। हाल में विज्ञान के क्षेत्र में महिला वैज्ञानिकों की कम होती संख्या पर चिन्ता व्यक्त की गयी है। खुद इंड़ियन कौन्सिल फॉर सायन्स एण्ड रिसर्च ने अपने अगले 11 वी काँग्रेस को महिलाओं को समर्पित किया है। सर्वेक्षण में यह स्थिति रोजगार के दूसरे क्षेत्रों में भी है जहां स्त्री-पुरुष अनुपात में अभी भारी अन्तर है। उच्च पदों पर महिलाओं की नियुक्तियों में क्या अवरोध आ रहा है इसे समझने तथा उसे दूर करने के गम्भीर प्रयासों की जरूरत भी नहीं समझी जा रही है। सेना जैसे क्षेत्रा में तो उन्हें नियुक्ति के बराबर नियम के लिये कानूनी जंग लड़नी पड़ती है। स्थायी कमिशन का विकल्प अभी भी सेना में हर स्तर पर महिलाओं को नहीं मिला है।

भारत में महिलाओं की उच्च पदों पर अनुपस्थिति या कुछ अहम क्षेत्रों में उनकी घटती संख्या बरबस दो साल पहले आयी अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट की याद ताजा करती है। 2008 में प्रकाशित उपरोक्त रिपोर्ट में बताया गया था कि महिलाओं के लिये गरिमामय काम की कमी है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 सालों में कामकाजी महिलाओं की संख्या 20 करोड़ बढ़ी है। इसके बाद भी 2007 तक काम करनेवाली महिलाओं की संख्या 120 करोड़ थी जबकि काम करने वाले पुरुष 180 करोड़ थे। कार्यक्षेत्र में भेदभावपूर्ण स्थिति के साथ ही अवैतनिक काम का अधिक हिस्सा उन्हीं के जिम्मे होता है जैसे गृहकार्य या अनुत्पादक कार्य। विशेष तौर पर गरीब इलाके की गरीब महिलाओं के कार्यक्षेत्र में असुरक्षा बढ़ी है। रिपोर्ट में यह बताया गया था कि अभी भी महिलाओं की श्रमशक्ति में तब्दील होने की सम्भावना बची है। उन्हें काम का गरिमामय अवसर उपलब्ध करा कर समाज में भी जेण्डर गैरबराबरी को कम किया जा सकता है। रिपोर्ट में आंकड़ा प्रस्तुत किया गया था कि दुनिया में पुरुषों की बेरोजगारी दर 5.7 प्रतिशत थी जबकि महिलाओं का 6.4 प्रतिशत था। अक्सर उनका रोजगार कम उत्पादकता वाला, कम  आयवाला तथा अधिक असुरक्षित होता है। यह भी बताया गया है कि विश्व के श्रमबाजार मे 100 पुरुषों पर 70 कामगार महिलायें है। दक्षिण एशिया में काम करने वाली उम्र की महिलाओं का 59 प्रतिशत श्रमबाजार में है जबकि कामकाजी उम्र के पुरुष 82.8 प्रतिशत श्रमबाजार में हैं।

इस अन्तर्राष्ट्रीय रिपोर्ट को सामने रखकर अगर हम अपने देश की स्थिति को समझें तो क्या चित्र दिखता है। अपने यहां आज भी कुशल श्रमिक के रूप में महिलाएं कुल श्रमशक्ति में बराबर का हिस्सेदार नहीं बन पायी है। श्रम मन्त्रालय की एक रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती है। रिपोर्ट के मुताबिक सन 2001 की जनगणना के अनुसार महिला श्रमिकों की संख्या 12 करोड़ 72 लाख है जो उनकी कुल संख्या 49 करोड़ 60 लाख का चौथा ( 25.60 प्रतिशत) हिस्सा ही हुआ। इनमें भी अधिकांशत: ग्रामीण क्षेत्र में है और उनका प्रतिशत ऊपर दी हुई कुल महिला श्रमिकों की संख्या का तीन हिस्से से भी ज्यादा (87 प्रतिशत) कृषिसम्बन्धी रोजगार में हैं। रिपोर्ट के अनुसार शहरी क्षेत्र के रोजगार में तीन हिस्से से भी ज्यादा(80 प्रतिशत) महिला श्रमिक घरेलू उद्योग , लघु व्यवसाय सेवा तथा भवननिर्माण में लगी हैं। कहा गया है कि सरकार ने महिला श्रमिकों के काम की गुणवत्ता में सुधार लाने तथा उनकी स्थिति बेहतर बनाने के लिये कई कानून बनाये हैं लेकिन व्यवहार में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है। देश में महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश तथा उत्तर प्रदेश को छोड़कर, जहाँ क्रमश: महिला श्रमिकों की संख्या 11.90, 10.34 और तथा 10.07 है बाकी अधिकतर राज्यों में कुल श्रमिकों की तुलना में महिला श्रमिक एक फीसदी से भी कम है।

निश्चित ही एक बड़ी चुनौती हमारे समक्ष खड़ी है। सामाजिक बराबरी स्त्री और पुरुष के बीच तभी सम्भव है जब कि अवसर भी बराबर का उपलब्ध हो। इसके लिये जरूरी है कि एक तो सरकार द्वारा कानूनन हर क्षेत्रा में बराबर का अवसर दिया जाय तथा दूसरे सामाजिक स्तर पर ऐसे प्रयास हो तथा अभियान चले कि महिलायें अधिक से अधिक सार्वजनिक दायरे में प्रवेश कर कुशल कामगार का दर्जा हासिल करें।


? अंजलि सिन्हा