संस्करण: 28 फरवरी -2011

 

माननीय, मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश के नाम

दिग्विजय सिंह का दूसरा खुला खत

(उपवास के नाटक के बाद ?)
 

? दिग्विजय सिंह

 

श्री शिवराज सिंह चौहान

माननीय मुख्यमंत्री,

मध्यप्रदेश शासन, भोपाल

 

दिनांक 21.02.2011

प्रिय श्री शिवराज सिंह जी,

आखिरकार उपवास का नाटक पिछले 15-20 दिनों के प्रचार-प्रसार के उपरांत बिना मंचन के ही समाप्त हो गया। भारतीय जनता पार्टी में तो आपको सदबुध्दि देने वाला कोई नहीं था। माननीय प्रधानमंत्री जी एवं महामहिम राज्यपाल महोदय की सलाह से आपको वास्तविकता, लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक परंपराओं तथा संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के द्वारा की जाने वाली ऐसी नौटंकी से होने वाले भविष्य के खतरों का संभवत: ज्ञान हो गया है और आपने उपवास प्रारंभ करने के पूर्व ही उपवास समाप्त कर दिया, लेकिन यह सोचने का विषय है कि करोड़ों रुपये खर्च करने की क्या जरूरत भी थी ? यह आप ही जानते होंगे कि सविनय आग्रह नाम दिये जाने का विचार आपको किसने दिया। सविनय आग्रह महात्मा गांधी के विदेशी शासन के विरुध्द किये गये दो जन आंदोलन सविनय अवज्ञा एवं सत्याग्रह से मिलाकर बना दिखता है जो सत्याग्रह तो था ही नहीं और यदि सविनय अवज्ञा थी तो सांविधानिक परंपराओं एवं लोकसेवक के कर्तव्यों की अवज्ञा मात्र ही थी। यदि भारत सरकार के मंत्री भोपाल में प्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा केन्द्र से मिले धन के दुरुपयोग एवं अक्षम उपयोग के लिये धरने पर बैठे तो इसे भारतीय जनता पार्टी और आप इसे किस तरह से लेते ?

मुख्यमंत्री के रूप में आपको अपने राज-काज के संबंध में आत्ममंथन करना चाहिये। आप केवल मुख्यमंत्री ही नहीं है वरन् भारतीय जनता पार्टी के वर्ष 2003 से अब तक प्रदेश में सरकार बनाने वाले तीसरे मुख्यमंत्री है। इस दौरान भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष 2003 एवं 2008 में आम जनता को जनसंकल्पों के माध्यम से वायदे किये थे। वर्ष 2003 के वायदे 2008 में आम जनता को जनसंकल्पों के माध्यम से वायदे किये थे। वर्ष 2003 के वायदे 2008 के संकल्प में बदल गये और वर्ष 2011 आने तक न तो 2003 के जनसंकल्प के वादे पूरे हुये और न ही 2008 के। मुख्यमंत्री एवं भारतीय जनता पार्टी के जिम्मेदार नेता के रूप में आपकी यह जिम्मेदारी है कि उपवास आदि चोचले जिनमें शासकीय समय, धन एवं श्रम बेकार जाते हैं, के स्थान पर किये गये वायदों को पूरा करने एवं जनकल्याण की ओर प्रशासनतंत्र को प्रतिबध्द करने के लिये समय दें।

माननीय मुख्यमंत्री जी पाले से नुकसान एवं मुआवजा वितरण में प्रदेश सरकार के दो प्रमुख विभाग राजस्व एवं कृषि पूरी तरह से अक्षम प्रमाणित हुये। यदि पाले से फसलों को नुकसान हुआ था तो राजस्व पुस्तक परिपत्र के अनुसार सात दिवस के भीतर राजस्व अमले को सर्वे कार्य पूर्ण कर लेना चाहिये एवं 15 दिन के भीतर मुआवजा राशि निर्धारित कर बांट देना चाहिये। मेरे कार्यकाल तक राहत राशि कोषालय से आहरण के लिये बजट आवंटन की भी आवश्यकता नहीं रखी गई थी और कलेक्टर आवश्यतानुसार कितनी भी राशि आहरित कर सकते थे तथा शासन बाद में इसके लिये आवंटन जारी कर देता था। यदि अभी भी यही प्रावधान है तो 15 दिवस के भीतर पीड़ित किसानों को मुआवजा राशि का वितरण क्यों नहीं किया गया और वितरण योग्य आवश्यक धनराशि का अंतिम आकलन क्यों नहीं संभव हो सका।

मध्यप्रदेश की रबी की मुख्य फसल गेहूं है, जो कुल रबी रकबे के 60 प्रतिशत क्षेत्र में बोई जाती है। मध्यप्रदेश सरकार के एक राज्यमंत्री ने केन्द्र सरकार को इस तथ्य से अवगत कराया है कि कृषि वैज्ञानिकों ने इस साल की ठंड को गेहूं के लिये आदर्श मान्य किया है और गेहूं की अच्छी पैदावार की उम्मीद जताई है। यदि गेहूँ में इस वर्ष शीत के कारण गतवर्ष के मुकाबले ज्यादा उपज आना संभावित है, तो रबी में पाले से नुकसान गेहूं को छोड़कर अन्य फसलों में ही हो सकता है। एक तरफ आपके राज्यमंत्री केन्द्र सरकार को बता रहे हैं कि रबी में गेहूं की गत वर्षों से अच्छी फसल इस वर्ष आने की उम्मीद है, दूसरी ओर आप केन्द्र सरकार को रबी फसल में हुये भारी नुकसान के कारण केन्द्र सरकार से ढाई हजार करोड़ के राहत पैकेज की मांग कर रहे है। केन्द्र सरकार किसी बात मानें-आपकी अथवा आपके राज्य मंत्री जी की ?

माननीय, ऐसा नहीं है कि प्रदेश के कृषि अधिकारियों को पाले से फसल बचाने के तरीके न मालूम हों। देश के उत्तरी राज्यों में प्राय: प्रतिवर्ष रबी की फसलों में पाला गिरता है, लेकिन पाले का प्रभाव फसल पर न्यूनतम पड़े, इसके लिये रात में धुऑं करना और खेतों में आवश्यक पानी देकर अशिक्षित एवं छोटे किसान बहुत कम व्यय से हानि को रोकने में सफल होते हैं। कृषि विभाग के अधिकारियों द्वारा पाले से फसलों को बचाने के लिये किसानों को ऐसी जानकारी समय पर क्यों उपलब्ध नहीं कराई ? जिस प्रदेश की 75 प्रतिशत आबादी गांव में रहती हो और 65 प्रतिशत आबादी मुख्य खेती पर निर्भर हो, वहाँ राजस्व एवं कृषि विभाग के निष्क्रिय एवं असफल होने को क्या कहा जाये ?

किसान को चाहे आम जन, व्यापारी हो अथवा शासकीय कर्मचारी, सभी राज्य सरकार के उदासीन रवैये से दु:खी है। इसके लिये ज्यादा विचार करने की आवश्यकता नहीं है। प्रत्येक वर्ग के हित में किये गये चुनावी वादे बिना किसी निर्णय के सचिवालय की फाइलों में बंद हैं। उदाहरण के लिये कुछ नीचे दिये जा रहे हैं :-

1. किसानों को तीन प्रतिशत ब्याज दर पर कृषि ऋण।

2. पशुपालन के लिये कृषि की भांति तीन प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण।

3. किसानों के 50 हजार रुपये तक के कृषि ऋण की माफी।

4. किसानों को सिंचाई के लिये 10 हार्सपावर तक के जनरेटर खरीदने पर सबसिडी।

5. प्रत्येक ग्राम पंचायत को पटवारी हल्का बनाकर पटवारी पदस्थ किया जाना।

6. खेतों की सही पैदाइश के लिये टूटे एवं नष्ट सीमाचिन्हों को पुन: निर्मित करना।

7. विकासखण्ड स्तर पर कृषि भंडारण हेतु शीतगृह की स्थापना।

8. किसानों को कृषि भूमि क्रय करने पर स्टाम्प शुल्क दरों में 5 प्रतिशत तक की कमी।

9. डीजल, पेट्रोल और रसोई गैस पर राज्य सरकार का टेक्स कम करना।

10. मण्डी टैक्स कम कर 1 प्रतिशत करना।

11. महिला उत्पीड़न शिकायतों के निराकरण के लिये तहसील स्तर पर महिला पुलिस थानों की स्थापना।

12. शिक्षा, योग्यता एवं क्षमता के आधार पर हर युवा को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जायेंगे एवं रोजगार सृजन आयोग बनाया जायेगा।

13. एम्स की तर्ज पर 6 बड़े सर्वसुविधायुक्त चिकित्सालयों की स्थापना।

14. सड़क परिवहन निगम की दुर्दशा को समाप्त करने की योजना बनाई जायेगी।

15. ग्रामीण अंचलों में पंचायतों द्वारा संचालित नल-जल योजना में रखरखाव पी.एच.ई. को दिया जायेगा।

16. वृत्तिकर पूर्णतया समाप्त कर दिया जायेगा। शराब पाउच और तंबाकू के गुटकों पर रोक लगाई जायेगी।

17. अनुसूचित जाति/जनजाति के रिक्त पदों को एक वर्ष में भर लिया जायेगा।

18. केन्द्रीय कर्मचारियों के समान राज्य शासन के कर्मचारियों को वेतन एवं महंगाई भत्ता।

19. ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों के लिये विकासखण्ड स्तर पर आवास निर्माण।

 प्रदेश के नागरिक के रूप में मेरी यह जिम्मेदारी है कि मैं प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में आपकी जिम्मेदारियों की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करूं-

  1. प्रदेश का किसान प्राकृतिक आपदा से तो इस बार पीड़ित हुआ है। पिछले 7-8 वर्षों से गरीब किसान खराब खाद-बीज के कारण खेती-किसानी में कर्ज के जाल में फंस रहा है और आपका प्रशासन तंत्र भ्रष्टाचार में लिप्त होकर अच्छे खाद-बीज की कालाबाजारी में पैसा कमा रहा है। किसी तरह खाद-बीज किसान को उपलब्ध भी हो जाये तो बिजली के अभाव में सिंचाई न होने पर सारी पूंजी बेकार हो जाती है और किसान विवश होकर कर्ज के दुष्चक्र में आत्महत्या करने को मजबूर हो रहा है। आपकी सरकार ने न तो किसानों का 50 हजार रुपये कर्जा माफ किया और न ही चुनाव घोषणा के अनुसार 3 प्रतिशत की दर पर ऋण उपलब्ध कराया बल्कि पाले से प्रभावित किसानों से वसूली के नाम पर उनकी गाय, भैंस, विद्युत एवं पंप एवं रिहायशी मकान कुर्क किये जा रहे है। तो क्या ऐसी चुनाव घोषणाएं किसानों से वोट कमाने मात्र की कुत्सित योजना थी ? किसान होकर योजनाबध्द तरीके से किसान का शोषण ? प्राकृतिक आपदाओं एवं भ्रष्टाचार से पीड़ित किसान के द्वारा की गई आत्महत्याओं को आपके मंत्रीमंडल के एक हृदयहीन मंत्री किसानों के द्वारा किये गये पापों का परिणाम निरूपित करते हैं और आप ऐसे मंत्री के विरुध्द कुछ नहीं करते ?

  2. प्रदेश में महिलाओं और बच्चों की हालत देश में निम्नतम स्थिति पर आ गई है। शिशु मृत्युदर एवं मृत्युदर के मामले में प्रदो की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में सबसे नीचे हैं। प्रदेश में प्रतिवर्ष पोषण आहार के नाम पर 250 करोड़ से भी अधिक रुपये खर्च किये जा रहे हैं, लेकिन सर्वे के अनुसार 25 प्रतिशत बच्चों को पोषण आहार पहुंच ही नहीं पा रहा और प्रदेश के 50 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। बच्चियों के कुपोषण की स्थिति तो और भी गंभीर है, जिसका दुष्परिणाम आगे अधिक मातृ मृत्युदर दिखता है।

  3. उद्योगों में निवेश आकर्षित करने के नाम पर पिछले 5-6 वर्षों में अनेक इन्वेस्टर्स मीट, रोड शो और विदेश भ्रमण किये गये किंतु करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद प्रदेश में औद्योगिक निवेश में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं आ सका है, जबकि प्रत्येक इन्वेस्टर्स मीट में लाखों करोड़ों रुपये के निवेश के सरकारी प्रेस नोट जारी किये गये हैं। माननीय मुख्यमंत्री जी क्या आप प्रदेश की जनता को बतायेंगे कि कितने लाख करोड़ रुपयों के कितने एम.ओ.यू. पिछले 5-6 वर्षों में राज्य सरकार द्वारा हस्ताक्षरित किये गये और उनमें से कितने करोड़ रुपये का निवेश कितने मामलों में अभी तक प्रदेश में संभव हो चुका है। निवेश के नाम पर प्रदेश में जमीनें हड़पने का गोरखधंधा जरूर चल रहा है। प्रदेश में शिक्षित युवा बेरोजगार घूम रहा है। मैंने अपने कार्यकाल में इंदौर भंवरकुओं में सॉफ्टवेअर पार्क एवं ज्वेलर्स पार्क विकसित कराने प्रारंभ किये थे। वह भवन जिस हालत में वर्ष 2003 में था, आज भी उसी हालत में हैं, और पिछले 7 वर्षों में भवन में एक ईंट भी नहीं लगी। अशिक्षित बेरोजगार के लिये तो केन्द्र की हमारी सरकार ने संपूर्ण विश्व में अकेली ''रोजगार गारंटी योजना'' अधिनियम के माध्यम से जारी की हुई है, लेकिन औद्योगिक निवेश के नाम पर प्रदेश के शिक्षित युवाओं को मध्यप्रदेश सरकार ने क्यों भ्रम में डाला हुआ हैं ?

  4. प्रदेश में कानून व्यवस्था इस बदतर स्थिति में आ चुकी है कि इसे नियंत्रण में रखने वाले कार्यपालिक मजिस्ट्रेट पुलिस की उपस्थिति में असामाजिक तत्वों के दुव्यर्वहार के शिकार हो रहे हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेताओं द्वारा उज्जैन में प्राचार्य के साथ किया गया दुर्व्यवहार, जिसके कारण उनकी मृत्यु तक हो गई, आपको याद ही होगा। राजधानी भोपाल में शायद ही कोई दिन ऐसा होगा जिसमें किसी महिला की चेन न लूटी गई हो। संपूर्ण देश में मध्यप्रदेश बलात्कार के मामले में सबसे ऊपर है और यही स्थिति मध्यप्रदेश की बच्चों के विरुध्द अपराधों के मामले में भी है। देश के 35 बड़े शहरों में इन्दौर और भोपाल अपराध दर के मामले में 860.3 एवं 836.4 की अपराध दर के साथ पहले एवं दूसरे स्थान पर हैं। अनुसूचित जाति के खिलाफ अपराधों में मध्यप्रदेश पहले तीन स्थानों में है, जबकि अनुसूचित जनजाति के विरुध्द अपराधों के मामलों में मध्यप्रदेश दूसरे स्थान पर स्थापित है। बात मात्र अपराधों तक ही सीमित नहीं है, पुलिस के विरुध्द शिकायतों के मामले में मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा है। यह जानकारी मैं बिना किसी आधार के नहीं दे रहा बल्कि राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो द्वारा वर्ष 2009 के लिये जारी आंकड़ों के आधार पर कह रहा हूं। ऐसी स्थिति में मध्यप्रदेश की जनता किस बुरे हाल में हैं, इसे आप स्वयं समझ सकते हैं।

  5. प्रदेश के शासकीय कर्मचारियों को भारतीय जनता पार्टी ने केन्द्र सरकार के समान महंगाई भत्ता दिये जाने की घोषणा वर्ष 2003 में की थी किन्तु किसी भी वर्ष राज्य की भाजपा सरकार ने अपने इस वादे को पूरा नहीं किया। आपके वित्त मंत्री जी ने तो यह भी स्पष्ट कर दिया है कि केन्द्र सरकार के समान महंगाई भत्ता दिये जाने के लिये मध्यप्रदेश सरकार बाध्य नहीं है। वित्तीय कठिनाइयों के बावजूद मेरे मुख्यमंत्रित्वकाल में राज्य के कर्मचारियों को महंगाई भत्ता एवं उसका एरियर नियमित रूप से दिया गया, चाहे नगद दिया गया हो अथवा उनके भविष्यनिति खाते में जमा कराया गया हो। आपकी सरकार तो महंगाई भत्ते के एरियर देने के मामले में सो ही गई है और हजारों करोड़ रुपये का कर्मचारियों को दिया जाने वाला महंगाई भत्ते का एरियर कर्मचारियों से छीन लिया गया है। आपकी पार्टी के जनसंकल्प में कर्मचारियों एवं आम जनता के वोट पाने के लिये ही क्या ऐसी घोषणाएं की जाती है या आप और भारतीय जनता पार्टी वायदों को पूरा करने के लिये प्रतिबध्द है। मेरे मुख्यमंत्रित्वकाल में कर्मचारियों द्वारा शासकीय कार्य से यात्रा के दौरान उन्हें देय दैनिक भत्ता आदि सुविधाएं लगभग 10 वर्ष पूर्व बढ़ाई गई थी। क्या आज भी चतुर्थ एवं तृतीय श्रेणी कर्मचारी 32 रुपये में शासकीय दौरे के समय परिवहन एवं दो समय का भोजन आदि सम्मानपूर्वक कर सकते है ? जब केन्द्रीय वेतन आयोग द्वारा अपना प्रतिवेदन केन्द्र सरकार को उपलब्ध करा दिया था तब राज्य वेतन आयोग का गठन क्या कर्मचारियों को केन्द्रीय वेतनमान नहीं दिये जाने का षडयंत्र नहीं था ? विधानसभा निर्वाचन 2008 एवं लोकसभा निर्वाचन 2009 के कारण आपने केन्द्र सरकार के समान काफी हद तक वेतन निर्धारित कर दिया किन्तु कर्मचारियों के अन्य भत्तों के मामलों में प्रदेश की भाजपा सरकार मौन क्यों है ? राज्य वेतन आयोग की अनुशंसाएं राज्य सरकार को प्राप्त होने के बावजूद इन्हें सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा है ? और उसकी अनुशंसाओं को प्रदेश सरकार कब तक कर्मचारियों के हित में लागू करेगी ? दु:खी एवं कुंठित कर्मचारियों के माध्यम से आप आम जनता के लिये सुशासन की क्या उम्मीद कर सकते है ?

  6. प्रदेश में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। प्रदेश के मंत्री लोकायुक्त एवं आयकर विभाग के घेरे में हैं और प्रदेश के अधिकारी एवं कर्मचारी अघोषित संपत्ति के मामले में रिकार्ड बना रहे हैं। ईमानदार एवं कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी कुंठित एवं सहमे हुये है। भाजपा कार्यकर्ताओं एवं नेताओं के दबाव एवं कमीशनखोरी के चलते ईमानदार अधिकारी मैदानी पदस्थापनाओं से बच रहे हैं और भ्रष्ट अधिकारी ऊंची बोली पर मैदानी महत्वपूर्ण पदस्थापनाएं पाने में सफल है। ऐसी स्थिति में प्रदेश में सुशासन की क्या उम्मीद की जा सकती है ?

प्रदेश में किसान दु:खी है, महिलाएं एवं व्यापारी आतंकित है, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोग निराश है और अल्पसंख्यक सहमते हुये हैं। इन सब के बीच सरकारी कर्मचारी कुंठित एवं हताश है जिस पर केवल लोगों को भयमुक्त वातावरण देने की जिम्मेदारी है वरन प्रत्येक नागरिक के कल्याण हेतु कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन का भी जिम्मा है। इस वातावरण में आप स्वर्णिम मध्यप्रदेश का नाम कैसे दे सकते है ? ऐसे नारों, असत्य भाषण, एवं उपवास की संस्कृति से हटकर अपराधों एवं भ्रष्टाचार से प्रदेश को मुक्त करने का काम करे। प्रशासन तंत्र को कसे ताकि भविष्य में प्राकृतिक आपदा के समय शासकीय मशीनरी कम से कम समय में किसानों एवं आम जनता को राहत दे सके।

 

शुभकामनाओं सहित

 

आपका             

(दिग्विजय सिंह)                 

 
? दिग्विजय सिंह