संस्करण: 27 जून-2011

हिंदी भाषा को दोयम दर्जे
का मानने की भूल न करें

? सिध्दार्थ शंकर गौतम

               आईआरएस-2011 राउंड फर्स्ट के आंकड़ों के मुताबिक शीर्ष दस भारतीय अखबारों में से केवल टाइम्स ऑफ इंडिया ही 7वे स्थान पर अपनी जगह सुनिश्चित कर पाया है। वहीं शीर्ष दस भारतीय अखबारों में से 5 स्थानों पर हिंदी भाषी अखबारों ने परचम फहराया है तथा चार स्थानों पर क्षेत्रीय अखबारों का दबदबा कायम है। भारत में अंग्रेजी पत्रकारिता को ही सिरमौर मानने वाले जरा ध्यान दें। ये आंकड़े यह साबित करने के लिए काफी हैं कि हिंदी अखबारों और उससे जुड़े पत्रकारों को कैसे एक तय रणनीति के तहत हाशिये पर धकेला जा रहा है? वैसे आईआरएस सर्वेक्षण को लेकर हमेशा ही विवाद रहा है और मैं भी किसी विवाद में न पड़ते हुए सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि जिस तरह से हिंदी भाषी अखबारों ने पत्रकारिता को जिया है उसे उसका श्रेय कभी नहीं मिलाद्य राष्ट्रभाषा होने के बावजूद हिंदी के साथ सौतेलेपन का व्यवहार पत्रकारिता जगत में स्पष्ट द्रष्टिगत होता है। मेरे सभी हिंदी भाषी पत्रकार साथियों की यह पीड़ा रही है कि प्रेस कांफ्रेंस तथा इंटरव्यू वगैरह में अंग्रेजी भाषा से जुड़े पत्रकारों को अतिरिक्त अहमियत दी जाती है।

               बात यदि अंग्रेजी भाषा की करें तो नि:संदेह यह वैश्विक भाषा है मगर भारत में जितनी शिद्दत से इसे आगे बढाया गया है वह हिंदी के लिए आत्मघाती साबित हुआ है। हिंदी भाषा का स्वयं का स्वर्णिम इतिहास रहा है और भारत के 90 प्रतिशत भू-भाग पर इसका प्रतिनिधित्व भी है। यदि हिंदी पत्रकारिता की बात की जाए तो 1826 से 1873 तक के काल को हम हिंदी पत्रकारिता का शैशव  काल कह सकते हैंद्य यह वह दौर था जब अंग्रेजी हुकूमत भारतीय जनता पर अपने जुल्मों का कहर ढा रही थी उस दौर में जनता को अपने आसपास के हालातों से भी अनजान रहना पड़ता था ऐसे दमनकारी दौर में हिंदी का पहला समाचार पत्र उदंत मार्तंड ताजा हवा के झोंके की तरह आया जो 1826 में कलकत्ता से प्रकाशित होता था। इस अखबार को निकालने का मुख्य उद्देश्य दशकों से दबे-कुचले भारतीयों में राष्ट्रीयता का अलख जगाना थाद्य इस दौर में बंगदूत(1826), प्रजामित्र(1834), बनारस अखबार(1845), मालवा अखबार(1848), सुधाकर(1850), प्रजाहित(1861), कविवचन सुधा(1867), हिन्दू प्रकाश(1871) आदि प्रमुख थे। सन 1873 में भारतेंदु हरिश्चंद ने हरिश्चंद्र मैगजीन की स्थापना की। इस पत्र ने हिंदी पत्रकारिता में नई क्रांति का उदघोष किया।

               हिंदी पत्रकारिता का दूसरा चरण 1873-1900 था जिसे भारतेंदु युग भी कहा जा सकता है इस दौर में भारतेंदु हरिश्चंद्र की शैली और राष्ट्रीय विचारधारा से प्रेरित उनके विचारों का समावेश दिखता है। अब तक भारत में हिंदी भाषा के अखबारों ने राष्ट्रीयता में अपना योगदान देना शुरू कर दिया था मगर 1903 में प्रकाशित सरस्वती ने हिंदी पत्रकारिता की दशा-दिशा ही बदल दीद्य हालाँकि मूल रूप से यह एक साहित्यिक पत्र था मगर आने वाले कई वर्षों तक इसने अपनी ओजपूर्ण भाषा शैली से भारतीयों में राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव को काफी बढ़ा दिया था।

               1905 में अभ्युदय, 1913 में प्रताप, 1904-08 में हिंद केसरी तथा कर्मयोगी जैसे पत्रों ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी। 1921 में प्रकाशित आज इस युग का अंतिम समाचार पत्र था। इसके बाद की पत्रकारिता राजनीतिक होती गई है। 1921 में कुछ ऐसे पत्रकार आये जिन्हें हिंदी से प्यार था और जो हिंदी को राष्ट्र के उत्थान में महत्वपूर्ण स्थान देते थे इसी दौर में हिंदी का भाषा के रूप में विश्व-विद्यालयों में प्रवेश हुआ जिससे हिंदी के प्रति चेतना जागृत हुई और इसका व्यापक प्रसार हुआ। इसने हिंदी पत्रकारिता में भी महती भूमिका निभायी। माधुरी, हंस, स्वदेश, कर्मवीर, हिन्दू, लोकवाणी, सन्मार्ग, लोकमत, जागरण, स्वतंत्र भारत, मिलाप, नवयुग, जनवार्ता जैसे हिंदी भाषी पत्रों ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्तमान पत्रकारिता के दौर में गणेश शंकर विद्यार्थी, महावीर प्रसाद, मदन मोहन मालवीय, माखनलाल चतुर्वेदी, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर, राहुल बारपुते जैसे सैकड़ों नाम हिंदी पत्रकारिता में मील का पत्थर साबित हुए हैं जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता को न सिर्फ जिया ही बल्कि दूसरों के समक्ष भी इसके पवित्र उद्देश्य को निरुपित किया किन्तु आज एक विशेष मानसिकता के समूह ने अंग्रेजी पत्रकारिता को ही उच्च दर्जा दे दिया है जो कहीं से भी न्यायसंगत नहीं जान पड़ता। मेरे एक मित्र कहते हैं कि हिंदी पत्रकारिता की इस दुर्दशा का जिम्मेदार भी हिंदी भाषी पत्रकार तथा वे समूह हैं जो दंभ तो हिंदी का भरते हैं मगर अन्दर खाने अंग्रेजियत को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं। बात कितनी सटीक हैद्य हिंदी पत्रकारिता की दुर्दशा तो उसी दिन शुरू हो गई थी जब टाई और सूट-बूटेड धाारी पत्रकारों को हिंदी पत्रकारिता में प्रवेश दे दिया गया था जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता के माहौल को विकृत कर दिया था।

               आज हिंदी पत्रकारिता की लोकप्रियता दिनोदिन बढती जा रही है मगर न जाने क्यूँ उसे हाशिये पर धकेला जा रहा है? सर्वेक्षणों पर तो उंगलियाँ उठाई जा सकती हैं मगर हकीकत से कैसे मुंह मोड़ा जा सकता है? अब यह तो हिंदी पत्रकारिता के मापदंडों को तय करना है कि वे अपना कद ऊँचा कर पाते हैं या फिर अंग्रेजी पत्रकारिता के समक्ष हाशिये पर रहना चाहते हैं? देश के कर्णधारों को भी इस मानसिकता से बचना चाहिए क्यूंकि कई बार वे ही पत्रकारिता में इस तरह का विकृत माहौल बना देते हैं कि हिंदी भाषी पत्रकार अपने आप को ही दोयम दर्जे का समझने लगता हैद्य मेरा हिंदी भाषी पत्रकार साथियों से भी अनुरोध है कि वे अपने आप को तथा हिंदी भाषा को दोयम दर्जे का न समझें और यदि मन में इस प्रकार के भाव आ रहे हों तो हिंदी भाषा के गौरव पूर्ण इतिहास पर नजर डालें, आपकी हताशा और निराशा छू-मंतर हो जाएगी और आपको अपना भी वजूद समझ में आएगा। जय हिंदी, विजय हिंदी।


? सिध्दार्थ शंकर गौतम